NCERT Class 6 Science Revision Notes in Hindi (Jigyasa)

कक्षा 6 (हिंदी माध्यम) की NCERT विज्ञान पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा के सभी 12 अध्यायों के रिवीज़न नोट्स। हर अध्याय में मुख्य बिंदु, याद रखने वाली बात और तुरंत अभ्यास के प्रश्न उत्तर सहित दिए गए हैं। सभी तथ्य आधिकारिक पाठ्यपुस्तक (पुनर्मुद्रण 2026-27) के अनुसार हैं। These Class 6 Science notes are ideal for quick revision just before exams.

अध्यायों की सूची

अध्याय 1: विज्ञान का अनूठा संसार — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • विज्ञान सोचने, अवलोकन करने और काम करने का एक तरीका है, जिससे हम अपने आस-पास की दुनिया और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझते हैं।
  • विज्ञान सीखने की सबसे ज़रूरी चीज़ है जिज्ञासा — इसी से पुस्तक का नाम “जिज्ञासा” (Curiosity) रखा गया है।
  • विज्ञान एक कभी न खत्म होने वाली पहेली (jigsaw puzzle) जैसा है — हर नई खोज एक नया टुकड़ा जोड़ती है और नए प्रश्न खड़े करती है। कभी-कभी नई खोजें हमारी पुरानी समझ को बदल भी देती हैं।
  • वैज्ञानिक विधि के चरण: अवलोकन → प्रश्न → संभावित उत्तर का अनुमान → प्रयोग/अवलोकन से अनुमान की जाँच → परिणामों का विश्लेषण।
  • उदाहरण: पेन लिखना बंद कर दे तो हम अनुमान लगाते हैं कि स्याही खत्म हो गई; रिफिल खोलकर जाँचते हैं; अनुमान गलत निकले तो नया अनुमान (स्याही सूख गई) लगाकर फिर जाँचते हैं।
  • जो भी वैज्ञानिक विधि अपनाता है, वह वैज्ञानिक की तरह काम कर रहा है — जैसे साइकिल मिस्त्री पंक्चर ढूँढते समय या बिजली मिस्त्री खराब बल्ब की जाँच करते समय।
  • विज्ञान प्रायः अकेले नहीं, बड़ी टीमों में मिलकर किया जाता है।

याद रखें: समझदार व्यक्ति बनने के लिए “क्यों” पूछने वाला व्यक्ति बनना ज़रूरी है — विज्ञान रटना नहीं, क्रमबद्ध तरीके से उत्तर खोजना है।

तुरंत अभ्यास

  1. विज्ञान सीखने के लिए सबसे पहली और ज़रूरी चीज़ क्या है? उत्तर: जिज्ञासा तथा आस-पास का ध्यान से अवलोकन।
  2. वैज्ञानिक विधि में अनुमान लगाने के बाद अगला चरण क्या है? उत्तर: प्रयोग या और अधिक अवलोकन द्वारा अनुमान की जाँच।
  3. क्या केवल प्रयोगशाला में काम करने वाले ही वैज्ञानिक हैं? उत्तर: नहीं, जो भी प्रश्न पूछकर क्रमबद्ध तरीके से उत्तर खोजता है, वह वैज्ञानिक की तरह काम कर रहा है।

अध्याय 2: सजीव जगत में विविधता — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले पौधों और जंतुओं की विविधता उस क्षेत्र की जैव विविधता कहलाती है। पौधे और जंतु एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
  • समानताओं और भिन्नताओं के आधार पर वस्तुओं को समूहों में व्यवस्थित करना समूहन (grouping) है — इससे अध्ययन आसान होता है।
  • ऊँचाई, तने और शाखाओं के आधार पर पौधे: वृक्ष (लंबे, मोटे-कठोर भूरे तने, शाखाएँ ऊपर से — आम), झाड़ी (कई कठोर तने, शाखाएँ ज़मीन के पास से — गुलाब), शाक (छोटे, कोमल हरे तने — टमाटर)। कमज़ोर तने वाले सहारे से चढ़ने वाले पौधे आरोही (climbers) और ज़मीन पर फैलने वाले विसर्पी (creepers) कहलाते हैं।
  • पत्ती पर शिराओं का पैटर्न शिरा-विन्यास है: जाल जैसा — जालिका रूपी (गुड़हल); समानांतर — समांतर (केला, घास)।
  • जड़ें: एक मुख्य जड़ और उससे निकलती पार्श्व जड़ें — मूसला जड़ (सरसों, गुड़हल); तने के आधार से निकलती एक-सी पतली जड़ों का गुच्छा — झकड़ा (रेशेदार) जड़ (घास)।
  • दो बीजपत्र वाले बीज (चना) — द्विबीजपत्री: जालिका रूपी शिरा-विन्यास + मूसला जड़। एक बीजपत्र (मक्का) — एकबीजपत्री: समांतर शिरा-विन्यास + झकड़ा जड़ (जैसे गेहूँ, लेमनग्रास)।
  • जंतु चलने, उड़ने, रेंगने, तैरने, कूदने में पंख, पैर, पख (fins) जैसे अलग-अलग अंगों का उपयोग करते हैं।
  • किसी क्षेत्र में जीवित रहने में मदद करने वाले विशेष लक्षण अनुकूलन हैं: कैक्टस का मांसल तना जल संग्रह करता है; देवदार का शंकु आकार और झुकी शाखाएँ बर्फ़ फिसलने देती हैं।
  • राजस्थान (गर्म मरुस्थल) के ऊँट: लंबी टाँगें, चौड़े खुर, एक कूबड़। लद्दाख (ठंडा मरुस्थल) के ऊँट: छोटी टाँगें, दो कूबड़, सिर से गर्दन तक लंबे बाल।
  • जीव जहाँ रहते हैं वह उनका आवास है — स्थलीय (वन, मरुस्थल, घास के मैदान, पर्वत) और जलीय (तालाब, झील, नदी, महासागर)। जल और स्थल दोनों में रहने वाले जंतु (मेंढक) उभयचर हैं।
  • आवास नष्ट होने से जैव विविधता घटती है। संरक्षण: बाघ परियोजना (1973), चीता पुनर्वास परियोजना (2022), गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) के आवास संरक्षित क्षेत्र घोषित; पवित्र उपवन (sacred groves) समुदाय द्वारा संरक्षित वन हैं।
  • वैज्ञानिक: जानकी अम्माल (वनस्पति विज्ञानी, ‘साइलेंट वैली बचाओ’ आंदोलन में भूमिका) और सालिम अली (‘बर्डमैन ऑफ इंडिया’, 1976 में पद्म विभूषण)। साइलेंट वैली केरल के पलक्कड़ ज़िले में है।

याद रखें: द्विबीजपत्री = 2 बीजपत्र + जालिका शिरा-विन्यास + मूसला जड़; एकबीजपत्री = 1 बीजपत्र + समांतर शिरा-विन्यास + झकड़ा जड़।

तुरंत अभ्यास

  1. मूली किस प्रकार की जड़ है और उसकी पत्तियों में कैसा शिरा-विन्यास होगा? उत्तर: मूली मूसला जड़ है, इसलिए पत्तियों में जालिका रूपी शिरा-विन्यास होगा।
  2. देवदार के वृक्ष का शंकु आकार किस प्रकार का अनुकूलन है? उत्तर: बर्फ़ आसानी से फिसल जाए, ताकि अधिक बर्फ़बारी वाले ठंडे पर्वतों में वृक्ष जीवित रह सके।
  3. मेंढक को उभयचर क्यों कहते हैं? उत्तर: क्योंकि वह जल और स्थल दोनों में रह सकता है।
  4. बाघ परियोजना कब शुरू हुई? उत्तर: 1973 में, बंगाल टाइगर की घटती संख्या को बचाने के लिए।

अध्याय 3: उचित आहार—स्वस्थ शरीर का आधार — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • भोजन ऊर्जा देता है, वृद्धि और शरीर की मरम्मत में मदद करता है और रोगों से बचाता है। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में भोजन फसल, स्वाद, संस्कृति और परंपरा के अनुसार अलग होता है।
  • मुख्य पोषक तत्व: कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन और खनिज। इनके अलावा आहारीय रेशे (रुक्षांश) और जल भी ज़रूरी हैं।
  • कार्बोहाइड्रेट और वसा मुख्य ऊर्जा स्रोत हैं; प्रोटीन शरीर-वर्धक पोषक हैं; विटामिन और खनिज रक्षात्मक पोषक हैं।
  • स्टार्च परीक्षण: आयोडीन विलयन की 2–3 बूँदें डालने पर नीला-काला रंग = स्टार्च उपस्थित।
  • वसा परीक्षण: भोजन को कागज़ में लपेटकर दबाएँ; तेलीय धब्बा बने जिससे प्रकाश हल्का-सा पार हो = वसा उपस्थित।
  • प्रोटीन परीक्षण: कॉपर सल्फेट विलयन की 2 बूँदें और कास्टिक सोडा विलयन की 10 बूँदें डालने पर बैंगनी रंग = प्रोटीन उपस्थित। (यह गतिविधि शिक्षक की देखरेख में करें।)
  • सभी पोषक तत्व, रुक्षांश और जल सही मात्रा में देने वाला भोजन संतुलित आहार है। लंबे समय तक किसी पोषक की कमी से अभावजन्य रोग होते हैं।
  • जंक फूड (चिप्स, कैंडी, कार्बोनेटेड पेय) में शर्करा और वसा अधिक, पर प्रोटीन, खनिज, विटामिन और रेशे कम होते हैं — इससे मोटापा हो सकता है।
  • ज्वार, बाजरा, रागी, सावाँ जैसे मिलेट (मोटा अनाज/पोषक अनाज) भारत की देशी फसलें हैं; इनमें विटामिन, आयरन-कैल्शियम जैसे खनिज और रेशे होते हैं।
  • प्रसंस्करण के दौरान अतिरिक्त पोषक मिलाना फोर्टिफिकेशन है (जैसे आयोडीन युक्त नमक)। भारत में खाद्य गुणवत्ता का नियमन FSSAI करता है।
  • खेत से उपभोक्ता तक भोजन द्वारा तय की गई कुल दूरी खाद्य मील (food miles) है — स्थानीय भोजन खाने से खाद्य मील, लागत और प्रदूषण घटते हैं।

विटामिन और खनिज — एक नज़र में

पोषककुछ स्रोतकमी से रोग/विकार
विटामिन Aपपीता, गाजर, आम, दूधदृष्टि हानि (रतौंधी)
विटामिन B1दालें, मेवे, साबुत अनाज, बीजबेरी-बेरी
विटामिन Cआँवला, अमरूद, हरी मिर्च, संतरा, नींबूस्कर्वी
विटामिन Dधूप, दूध, मक्खन, मछली, अंडेरिकेट्स (नरम, मुड़ी हड्डियाँ)
कैल्शियमदूध, दही, पनीरकमज़ोर हड्डियाँ, दाँतों की सड़न
आयोडीनसमुद्री शैवाल, सिंघाड़ा, आयोडीन युक्त नमकघेंघा (गॉयटर)
आयरनहरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, चुकंदर, अनारएनीमिया (रक्ताल्पता)

याद रखें: भोजन व्यर्थ न करें — थाली में उतना ही लें जितना खा सकें। “स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।”

तुरंत अभ्यास

  1. आयोडीन डालने पर कौन-सा रंग स्टार्च की उपस्थिति बताता है? उत्तर: नीला-काला।
  2. मसूड़ों से खून आना किस रोग का लक्षण है और किसकी कमी से होता है? उत्तर: स्कर्वी; विटामिन C की कमी से।
  3. मिलेट को पोषक अनाज क्यों कहते हैं? उत्तर: क्योंकि इनमें विटामिन, आयरन-कैल्शियम जैसे खनिज और आहारीय रेशे भरपूर होते हैं।
  4. स्थानीय भोजन खाने से खाद्य मील पर क्या असर पड़ता है? उत्तर: खाद्य मील कम होते हैं, जिससे परिवहन लागत और प्रदूषण घटता है और स्थानीय किसानों को सहायता मिलती है।

अध्याय 4: चुंबकों को जानें — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • पुराने समय में नाविक प्राकृतिक चुंबक लोडस्टोन (lodestone) का उपयोग करते थे। आज के अधिकांश चुंबक (पेंसिल बॉक्स, स्टिकर, खिलौने) कृत्रिम चुंबक हैं — छड़, U-आकार, वलय (रिंग) आदि आकारों में।
  • चुंबक की ओर आकर्षित होने वाले पदार्थ चुंबकीय पदार्थ (जैसे लोहा) और आकर्षित न होने वाले अचुंबकीय पदार्थ (लकड़ी, प्लास्टिक, काँच, कागज़) कहलाते हैं।
  • छड़ चुंबक पर लोहे की रेतन सबसे अधिक सिरों के पास चिपकती है — यही चुंबक के ध्रुव हैं: उत्तरी ध्रुव (N) और दक्षिणी ध्रुव (S)।
  • ध्रुव सदैव जोड़े में होते हैं — चुंबक को तोड़ने पर भी अकेला N या अकेला S ध्रुव नहीं मिलता।
  • स्वतंत्रतापूर्वक लटका चुंबक सदा उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरता है, क्योंकि पृथ्वी स्वयं एक विशाल चुंबक की तरह व्यवहार करती है। उत्तर की ओर इशारा करने वाला सिरा उत्तरी ध्रुव है।
  • चुंबकीय दिक्सूचक (कम्पास) की सुई एक छोटा चुंबक है जो उत्तर-दक्षिण दिशा बताती है — नाविकों और यात्रियों के लिए उपयोगी।
  • समान ध्रुव (N-N, S-S) एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं, असमान ध्रुव (N-S) आकर्षित करते हैं।
  • चुंबक का प्रभाव लकड़ी, गत्ता, प्लास्टिक और काँच जैसे अचुंबकीय पदार्थों के आर-पार भी काम करता है — बिना छुए वस्तुएँ खिसका सकता है।
  • चुंबकों की देखभाल: गर्म न करें, गिराएँ या हथौड़े से न पीटें, मोबाइल/रिमोट के पास न रखें; जोड़े में असमान ध्रुव एक ओर रखकर, बीच में लकड़ी और सिरों पर नरम लोहे के टुकड़े रखकर संभालें।

याद रखें: चुंबकत्व की सबसे पक्की पहचान प्रतिकर्षण है — आकर्षण तो लोहे के टुकड़े और चुंबक के बीच भी होता है, पर प्रतिकर्षण केवल दो चुंबकों के समान ध्रुवों के बीच।

तुरंत अभ्यास

  1. क्या चुंबक को तोड़कर एकल ध्रुव प्राप्त किया जा सकता है? उत्तर: नहीं (असत्य) — हर टुकड़े में फिर से दो ध्रुव बन जाते हैं।
  2. लोहे की रेतन छड़ चुंबक के किस भाग पर सबसे अधिक चिपकती है? उत्तर: दोनों सिरों (ध्रुवों) के पास, बीच में नहीं।
  3. कम्पास की सुई किस दिशा में ठहरती है? उत्तर: उत्तर-दक्षिण दिशा में।

अध्याय 5: लंबाई एवं गति का मापन — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • पहले लोग शरीर के अंगों से मापते थे — चार अंगुल (चार उँगलियों की चौड़ाई), बालिश्त (हथेली का फैलाव), हाथ की लंबाई, कदम। पर इनसे हर व्यक्ति की माप अलग आती है।
  • इसलिए मानक मात्रक ज़रूरी हैं। देशों ने मात्रकों की अंतरराष्ट्रीय प्रणाली (SI मात्रक) अपनाई है।
  • लंबाई का SI मात्रक मीटर (m) है। 1 km = 1000 m, 1 m = 100 cm, 1 cm = 10 mm।
  • स्केल से सही माप: स्केल को वस्तु की लंबाई के साथ सटाकर रखें; आँख ठीक उस बिंदु के ऊपर हो जहाँ पढ़ाई लेनी है।
  • टूटे सिरे वाला स्केल: किसी पूरे निशान (जैसे 1.0 cm) से मापें और दूसरे सिरे की पढ़ाई में से इस निशान की पढ़ाई घटा दें।
  • किसी निश्चित वस्तु या बिंदु के सापेक्ष दूरी बताई जाए तो उस बिंदु को संदर्भ बिंदु कहते हैं। समय के साथ संदर्भ बिंदु से स्थिति बदले तो वस्तु गति में है।
  • सरल रेखीय गति — सीधी रेखा में (सीधी सड़क पर कार); वृत्तीय गति — वृत्तीय पथ पर (झूला चक्र/मेरी-गो-राउंड); दोलन गति — किसी नियत स्थिति के इधर-उधर (झूला, धागे से लटका रबड़)।
  • जो गति निश्चित समय बाद अपना पथ दोहराए, वह आवर्ती गति है — वृत्तीय और दोलन दोनों गतियाँ आवर्ती हैं।

याद रखें: बालिश्त, हाथ, कदम लंबाई के मानक मात्रक नहीं हैं; मिलीमीटर, सेंटीमीटर, मीटर, किलोमीटर मानक हैं।

तुरंत अभ्यास

  1. 1.5 km को मीटर में बदलिए। उत्तर: 1.5 × 1000 = 1500 m
  2. टूटे स्केल में एक सिरा 1.0 cm पर और दूसरा 14.3 cm पर है — लंबाई? उत्तर: 14.3 − 1.0 = 13.3 cm
  3. सिलाई मशीन की सुई की ऊपर-नीचे गति किस प्रकार की है? उत्तर: दोलन गति (नियत स्थिति के इधर-उधर)।
  4. 1 km = 100 cm — सत्य या असत्य? उत्तर: असत्य; 1 km = 1000 m = 1,00,000 cm।

अध्याय 6: हमारे आस-पास की सामग्री — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • वस्तुएँ बनाने में प्रयुक्त पदार्थ के प्रकार सामग्री (material) हैं। एक वस्तु एक या अनेक सामग्रियों से बन सकती है, और एक ही काम की वस्तुएँ अलग सामग्रियों से बन सकती हैं।
  • वस्तुओं को समूहों में व्यवस्थित करना वर्गीकरण है — सामग्रियों के गुण ही उनका उपयोग तय करते हैं।
  • दिखावट से: चमकीली (lustrous) — जैसे लोहा, तांबा; और अचमकीली (non-lustrous) — जैसे लकड़ी। स्पर्श से: कठोर और नरम।
  • देखने के आधार पर: पारदर्शक (साफ़ दिखे — काँच), पारभासी (धुंधला दिखे — बटर पेपर, फ्रॉस्टेड काँच), अपारदर्शक (बिलकुल न दिखे — लकड़ी, गत्ता, धातुएँ)।
  • जल में पूरी तरह घुल जाएँ — घुलनशील (नमक, चीनी); न घुलें — अघुलनशील (रेत)।
  • जो स्थान घेरे और जिसमें द्रव्यमान हो, वह द्रव्य (matter) है — वायु भी द्रव्य है। द्रव्य द्वारा घेरा स्थान आयतन है; वस्तु में द्रव्य की मात्रा द्रव्यमान है।
  • आयुर्वेद (अष्टांग हृदय) में भी द्रव्य का वर्णन 20 गुणों (10 विपरीत जोड़े) से किया गया है — जैसे गुरु (भारी)–लघु (हल्का), मृदु (नरम)–कठिन (कठोर)।

याद रखें: वस्तु (object) और सामग्री (material) में अंतर याद रखें: कुर्सी वस्तु है, लकड़ी उसकी सामग्री है।

तुरंत अभ्यास

  1. बटर पेपर किस श्रेणी में आता है? उत्तर: पारभासी — इससे वस्तुएँ धुंधली दिखती हैं।
  2. क्या वायु द्रव्य है? उत्तर: हाँ, क्योंकि वह स्थान घेरती है और उसमें द्रव्यमान है।
  3. चीनी और रेत में से कौन जल में घुलनशील है? उत्तर: चीनी; रेत अघुलनशील है।

अध्याय 7: ताप एवं उसका मापन — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • किसी वस्तु का ताप बताता है कि वह कितनी गर्म या ठंडी है। स्पर्श से इसका सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता, इसलिए थर्मामीटर (तापमापी) का उपयोग होता है।
  • ताप के तीन प्रमुख पैमाने: सेल्सियस (°C), फ़ारेनहाइट (°F) और केल्विन (K)। ताप का SI मात्रक केल्विन है।
  • डिजिटल क्लिनिकल थर्मामीटर शरीर का ताप मापता है और बैटरी से चलता है। पहले पारे (mercury) वाले थर्मामीटर थे, पर पारा अत्यंत विषैला है और टूटने पर इसका निपटान कठिन है।
  • स्वस्थ वयस्क का सामान्य ताप 37.0 °C = 98.6 °F माना जाता है।
  • प्रयोगशाला थर्मामीटर का परास सामान्यतः −10 °C से 110 °C होता है — इससे शरीर का ताप नहीं मापा जाता। पढ़ते समय आँख तरल स्तंभ के सिरे के सीध में होनी चाहिए।
  • उबलते समय पानी का ताप और पिघलते समय बर्फ़ का ताप स्थिर रहता है।
  • मौसम रिपोर्ट में दिन का अधिकतम और न्यूनतम वायु ताप बताया जाता है; यह रोज़ बदलता है और मौसम पूर्वानुमान में उपयोगी है।
  • अन्ना मणि (1918–2001) — ‘भारत की मौसम महिला’; उन्होंने अनेक मौसम मापक उपकरण बनाए और पवन व सौर ऊर्जा की संभावनाओं पर काम किया।

याद रखें: क्लिनिकल थर्मामीटर = शरीर का ताप; प्रयोगशाला थर्मामीटर = अन्य वस्तुओं का ताप (−10 °C से 110 °C)। 37 °C = 98.6 °F (98.6 °C नहीं!)।

तुरंत अभ्यास

  1. ताप का SI मात्रक क्या है? उत्तर: केल्विन (K)।
  2. 37 °C कितने °F के बराबर है? उत्तर: 98.6 °F
  3. पारे वाले थर्मामीटर की जगह डिजिटल थर्मामीटर क्यों बेहतर है? उत्तर: पारा विषैला है और टूटने पर खतरा होता है; डिजिटल थर्मामीटर सुरक्षित है और पढ़ना आसान है।

अध्याय 8: जल की विविध अवस्थाओं की यात्रा — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • जल तीन अवस्थाओं में पाया जाता है — ठोस (बर्फ़), द्रव (पानी) और गैस (जलवाष्प)। गर्म या ठंडा करने पर जल अपनी अवस्था बदलता है (पिघलना, जमना)।
  • जल का अपनी वाष्प अवस्था में बदलना वाष्पीकरण है; जलवाष्प का वापस द्रव में बदलना संघनन है (ठंडे गिलास के बाहर बूँदें)।
  • वाष्पीकरण की दर पर असर डालने वाले कारक: खुला क्षेत्रफल (अधिक → तेज़), आर्द्रता (हवा में नमी अधिक → धीमा) और वायु का बहाव (हवा चले → तेज़)।
  • वाष्पीकरण से ठंडक होती है — इसीलिए पॉट-इन-पॉट कूलर (गीली रेत और गीले बोरे से ढका घड़े के अंदर घड़ा) सामान को ठंडा रखता है।
  • बादल बनने में धूल के कण मदद करते हैं — जलवाष्प इन सूक्ष्म कणों पर संघनित होकर बादल बनाती है। बादलों से जल वर्षा, ओले या हिम (बर्फ़) के रूप में गिरता है।
  • महासागरों और पृथ्वी की सतह से जल का वाष्पीकरण → संघनन से बादल → वर्षा/हिम → नदियों से वापस महासागर। जल का यह संचरण जल चक्र है।
  • पृथ्वी का अधिकांश जल महासागरों में है और सीधे उपयोग नहीं हो सकता; केवल थोड़ा-सा जल ही उपयोग योग्य है — इसलिए जल का सोच-समझकर उपयोग करें और जलाशयों को प्रदूषण से बचाएँ।

याद रखें: वाष्पीकरण (द्रव → वाष्प) और संघनन (वाष्प → द्रव) एक-दूसरे के उलटे हैं — परीक्षा में इन्हें उलझाएँ नहीं।

तुरंत अभ्यास

  1. संघनन का सही अर्थ क्या है? उत्तर: जलवाष्प का द्रव अवस्था में बदलना।
  2. गीले कपड़े पंखे के नीचे जल्दी क्यों सूखते हैं? उत्तर: वायु का बहाव वाष्पीकरण की दर बढ़ाता है।
  3. आर्द्र (नम) मौसम में कपड़े देर से क्यों सूखते हैं? उत्तर: हवा में पहले से अधिक जलवाष्प होती है, इसलिए वाष्पीकरण धीमा होता है।

अध्याय 9: दैनिक जीवन में पृथक्करण विधियाँ — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • हम पदार्थों को दो कारणों से अलग करते हैं — दो अलग-अलग उपयोगी घटक पाने के लिए, या अनुपयोगी/हानिकारक घटक हटाने के लिए। (मल्ली और वल्ली की ‘भारत की यात्रा’ के माध्यम से)
  • हस्त चयन (handpicking) — आकार, रंग और आकृति के अंतर से ठोस को हाथ से चुनना (दाल में से कंकड़)।
  • थ्रेशिंग (गहाई) — डंठलों को पीटकर दाने अलग करना। ओसाना/फटकना (winnowing) — हवा की मदद से हल्की भूसी को भारी दानों से अलग करना (सूप से)।
  • छलनी से छानना (sieving) — कणों के आकार के अंतर से ठोस अलग करना (रेत से कंकड़, आटे से चोकर)।
  • अवसादन — भारी अघुलनशील घटक का द्रव की तली में बैठ जाना; फिर बर्तन झुकाकर ऊपर का द्रव निकालना निस्तारण (decantation) है — चावल और दालें धोने में भी यही होता है।
  • निस्यंदन (filtration) — द्रव से अघुलनशील ठोस को छानकर अलग करना (चाय से चायपत्ती अलग करना)।
  • वाष्पन — द्रव में घुले ठोस को अलग करना (नमक के विलयन से नमक)। मथना (churning) — दही से मक्खन निकालना, छाछ बच जाती है।
  • चुंबकीय पृथक्करण — चुंबक से चुंबकीय और अचुंबकीय पदार्थ अलग करना (बुरादे से लोहे की कीलें); उद्योगों में क्रेन पर लगे चुंबक से लोहे का कबाड़ अलग करके पुनर्चक्रण किया जाता है।
  • दो से अधिक घटकों वाले मिश्रण में प्रायः कई विधियों को क्रम से मिलाना पड़ता है।

याद रखें: विधि का चुनाव घटकों के गुण से होता है — आकार (छानना), भार (ओसाना, अवसादन), घुलनशीलता (वाष्पन, निस्यंदन), चुंबकत्व (चुंबकीय पृथक्करण)।

तुरंत अभ्यास

  1. बुरादे में गिरी लोहे की कीलें किस विधि से निकालेंगे? उत्तर: चुंबकीय पृथक्करण।
  2. नमक के विलयन से नमक कैसे प्राप्त करेंगे? उत्तर: वाष्पन द्वारा।
  3. अवसादन और निस्तारण में क्या अंतर है? उत्तर: अवसादन में भारी कण तली में बैठते हैं; निस्तारण में बर्तन झुकाकर ऊपर का द्रव अलग किया जाता है।

अध्याय 10: सजीव—विशेषताओं का अन्वेषण — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • आस-पास की वस्तुएँ दो प्रकार की हैं — सजीव और निर्जीव।
  • सजीवों के मूल लक्षण: गति करते हैं, भोजन लेते हैं, वृद्धि करते हैं, श्वास लेते हैं, उत्सर्जन करते हैं, उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया करते हैं, जनन करते हैं और मरते हैं। इनमें से किसी लक्षण का न होना बताता है कि वह सजीव नहीं है।
  • जिस चीज़ या घटना के प्रति सजीव प्रतिक्रिया करे, वह उद्दीपन है (काँटा चुभना, गर्म कप छूना)। पौधे भी अनुक्रिया करते हैं — छुई-मुई की पत्तियाँ छूने पर मुड़ती हैं; आँवले की पत्तियाँ सूर्यास्त के बाद मुड़ जाती हैं।
  • बीजों का अंकुरण जल, वायु और उपयुक्त प्रकाश/अंधकार पर निर्भर करता है। अंकुरण में जड़ें सामान्यतः नीचे और प्ररोह ऊपर की ओर बढ़ते हैं।
  • पौधे का जीवन-चक्र: बीज का अंकुरण → वृद्धि और विकास → पुष्पन → बीज उत्पादन → नए बीज से नया पौधा; यह चक्र चलता रहता है।
  • मच्छर: अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क। लार्वा और प्यूपा ठहरे हुए पानी (कूलर, गमले, खुले बर्तन) में पनपते हैं और बार-बार सतह पर आते हैं।
  • मेंढक: अंडे (स्पॉन, दिन 1) → भ्रूण (दिन 3–4) → पूँछ वाला टैडपोल (दिन 7–10) → टाँगों वाला टैडपोल (8–10 सप्ताह) → मंडूकक/फ्रॉगलेट (12 सप्ताह) → वयस्क मेंढक (14 सप्ताह)।
  • मच्छर और मेंढक के जीवन-चक्र में शरीर के आकार, संरचना और कभी-कभी आवास में भी बड़े परिवर्तन होते हैं। जनन से जीव की निरंतरता बनी रहती है।

याद रखें: सजीव होने के लिए सभी लक्षण ज़रूरी हैं — कार चलती है पर वृद्धि या जनन नहीं करती, इसलिए निर्जीव है।

तुरंत अभ्यास

  1. मच्छर के जीवन-चक्र की अवस्थाएँ क्रम से लिखिए। उत्तर: अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क।
  2. छुई-मुई की पत्तियाँ छूने पर मुड़ना किस लक्षण को दिखाता है? उत्तर: उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया।
  3. बीज के अंकुरण के लिए क्या चाहिए? उत्तर: जल, वायु और उपयुक्त प्रकाश/अंधकार।

अध्याय 11: प्रकृति की अमूल्य संपदा — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • प्रकृति द्वारा दिए गए संसाधन प्राकृतिक संसाधन हैं — वायु, जल, सूर्य से ऊर्जा, वन, मृदा, चट्टानें, खनिज और जीवाश्म ईंधन। मनुष्य द्वारा बनाए गए संसाधन मानव-निर्मित संसाधन हैं।
  • साँस की हवा में ऑक्सीजन होती है — हम भोजन-पानी के बिना कुछ दिन रह सकते हैं, पर ऑक्सीजन के बिना कुछ मिनट भी नहीं। चलती हुई वायु पवन कहलाती है।
  • बरसात के पानी को एकत्र करके बाद में उपयोग के लिए संग्रह करना वर्षा जल संचयन है — यह भारत की पुरानी प्रथा है: बावड़ी (राजस्थान), वाव (गुजरात); उदाहरण — तूरजी का झालरा, जोधपुर।
  • सूर्य की ऊर्जा जल चक्र में वाष्पीकरण कराती है और घरों में अचार के लिए कच्चे आम सुखाने जैसे कामों में काम आती है।
  • उचित अवधि में प्राकृतिक प्रक्रियाओं से पुनः भर जाने वाले संसाधन नवीकरणीय हैं (वायु, जल, वन, सौर ऊर्जा)।
  • सीमित मात्रा वाले और उचित अवधि में न भरने वाले संसाधन अनवीकरणीय हैं — खनिज, मृदा, चट्टानें, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस।
  • वाहनों में जीवाश्म ईंधन जलने से वायु प्रदूषण होता है; इलेक्ट्रिक वाहन धुआँ नहीं छोड़ते — यह एक विकल्प है।
  • सभी सजीव प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं, इसलिए इनका विवेकपूर्ण उपयोग करें — गांधीजी: पृथ्वी हर मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लालच नहीं।

याद रखें: नवीकरणीय = प्रकृति उचित समय में भर देती है; अनवीकरणीय = सीमित भंडार। वन नवीकरणीय हैं, पर काटने के बाद इन्हें दोबारा उगाने में बहुत समय लगता है।

तुरंत अभ्यास

  1. पेट्रोलियम को अनवीकरणीय संसाधन क्यों कहते हैं? उत्तर: इसका भंडार सीमित है और यह उचित अवधि में प्राकृतिक रूप से पुनः नहीं बनता।
  2. कोयला, जल, प्राकृतिक गैस, पेट्रोल — इनमें नवीकरणीय कौन-सा है? उत्तर: जल।
  3. बावड़ी किस उद्देश्य से बनाई जाती थी? उत्तर: जल की कमी वाले क्षेत्रों में वर्षा जल (और आस-पास से रिसकर आने वाले जल) के संचयन के लिए।

अध्याय 12: पृथ्वी से परे — रिवीज़न नोट्स

मुख्य बिंदु

  • आकाश को तारामंडलों में बाँटा गया है — तारों के ऐसे समूह जो किसी आकृति जैसे दिखते हैं। ओरायन (शिकारी, बीच में तीन तारे कमरबंद), कैनिस मेजर (इसमें सिरियस), टॉरस।
  • भारतीय खगोलशास्त्र में नक्षत्र — आर्द्रा (ओरायन का बेटल्ज्यूज़), कृत्तिका (टॉरस का प्लीयडीज़)। बिग डिपर को भारत में सप्तर्षि कहते हैं।
  • ध्रुव तारा (Pole Star/Polaris, लिटिल डिपर का भाग) उत्तर दिशा में लगभग स्थिर दिखता है — उत्तरी गोलार्ध में उत्तर दिशा खोजने में सहायक।
  • सूर्य एक तारा है जो ऊष्मा और प्रकाश देता है — सौरमंडल का सबसे बड़ा और भारी पिंड; बाकी पिंड सूर्य का प्रकाश परावर्तित करके चमकते हैं।
  • ग्रह सूर्य की परिक्रमा करने वाला बड़ा, लगभग गोलाकार पिंड है। सूर्य से दूरी के क्रम में: बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण (यूरेनस), वरुण (नेपच्यून)। पृथ्वी लगभग 1 वर्ष में सूर्य की परिक्रमा करती है।
  • ग्रहों की परिक्रमा करने वाले पिंड उपग्रह हैं। चंद्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है और लगभग 27 दिन में पृथ्वी की परिक्रमा करता है; वहाँ वायुमंडल, जल या जीवन नहीं है। भारत ने तीन चंद्रयान मिशन भेजे हैं।
  • क्षुद्रग्रह का आकार 10 m से लगभग 500 km तक। धूमकेतु (कॉमेट) बर्फीले-चट्टानी पिंड हैं; सूर्य के पास आने पर इनका जमा पदार्थ वाष्पित होकर पूँछ बनाता है। हेली धूमकेतु हर 76 वर्ष में दिखता है (पिछली बार 1986)।
  • सौरमंडल = सूर्य + 8 ग्रह + उनके उपग्रह + क्षुद्रग्रह, धूमकेतु जैसे छोटे पिंड। सौरमंडल मिल्की वे आकाशगंगा (आकाश गंगा) का भाग है; एक आकाशगंगा में लाखों से अरबों तारे होते हैं।
  • अन्य तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रह (exoplanets) पर जीवन की खोज जारी है — अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिला।
  • हानले (लद्दाख) की भारतीय खगोलीय वेधशाला माउंट सरस्वती पर है; इसमें सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर के नाम पर हिमालयन चंद्र टेलीस्कोप है। तारे देखने के लिए प्रकाश प्रदूषण से दूर अंधेरी जगह चाहिए।

याद रखें: ग्रहों का क्रम याद रखें — बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण। सूर्य तारा है, चंद्रमा उपग्रह है।

तुरंत अभ्यास

  1. उत्तर दिशा खोजने में कौन-सा तारा मदद करता है? उत्तर: ध्रुव तारा (Pole Star)।
  2. सूर्य से दूरी के क्रम में चौथा ग्रह कौन-सा है? उत्तर: मंगल।
  3. चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा लगभग कितने दिन में करता है? उत्तर: लगभग 27 दिन।
  4. हेली धूमकेतु कितने वर्षों में दिखाई देता है? उत्तर: हर 76 वर्ष में (पिछली बार 1986)।

रिवीज़न कैसे करें

पहले हर अध्याय के मुख्य बिंदु पढ़ें, फिर तुरंत अभ्यास के प्रश्न बिना उत्तर देखे हल करें। जो प्रश्न गलत हो, उस अध्याय के पूरे हल के लिए हमारा कक्षा 6 विज्ञान (जिज्ञासा) हल पेज देखें और और अधिक अभ्यास के लिए अतिरिक्त प्रश्न हल करें। परीक्षा से ठीक पहले की परिभाषाएँ और आँकड़े दोहराने के लिए की फैक्ट्स हैंडबुक उपयोगी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्र. कक्षा 6 विज्ञान जिज्ञासा में कितने अध्याय हैं?
उ. कुल 12 अध्याय — पहला “विज्ञान का अनूठा संसार” और अंतिम “पृथ्वी से परे”।

प्र. जिज्ञासा का अंग्रेज़ी संस्करण कौन-सा है?
उ. अंग्रेज़ी माध्यम में यही पुस्तक Curiosity नाम से है; दोनों में अध्याय एक जैसे हैं।

प्र. क्या ये नोट्स नई NCERT पुस्तक पर आधारित हैं?
उ. हाँ, ये नोट्स नई जिज्ञासा पुस्तक (पुनर्मुद्रण 2026-27) के अध्यायों और सारांश के आधार पर बनाए गए हैं।

प्र. क्या यह पुस्तक निःशुल्क डाउनलोड की जा सकती है?
उ. हाँ, NCERT की सभी पाठ्यपुस्तकें आधिकारिक रूप से निःशुल्क उपलब्ध हैं।

पूरी पुस्तक डाउनलोड करें

कक्षा 6 (हिंदी माध्यम) जिज्ञासा के अध्यायवार PDF के लिए हमारा कक्षा 6 विज्ञान जिज्ञासा पेज देखें।

Book Quiz — Chapter-wise Practice

Question 1 of 0 · Score: 0

Recommended: NCERT Textbooks for This Topic

Contains Amazon affiliate links.

Printed NCERT textbooks are the best companion for this topic. Verified copies on Amazon:

Jigyasa Textbook of Science For Class 6
Check the latest price on Amazon

Buy on Amazon →

NCERT Curiosity – Science Textbook for Class 6
Check the latest price on Amazon

Buy on Amazon →

Price and availability may change on Amazon. As an Amazon Associate, ncertbooks.org earns from qualifying purchases.

Written by Satish

NCERTBooks.org is an independent educational resource run by a small team focused on making official NCERT textbooks easy to find, read, and download for students, parents, and teachers across India. We are not affiliated with NCERT or the Ministry of Education -- we organise publicly available NCERT content by class and subject, verify links against official sources, and build tools (like our in-browser reader) that make studying more convenient. Every guide we publish is written and reviewed by our team based on the actual NCERT curriculum and syllabus.

📄 Want this offline? Download the free PDF of this page.Download PDF
Advertisement

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top