कक्षा 7 (हिंदी मीडियम) की विज्ञान पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा (NCERT, NEP 2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी 12 अध्यायों के लिए गतिविधि-आधारित शैली में हल किए गए प्रतिनिधि (representative) प्रश्नोत्तर नीचे दिए गए हैं। नई किताब में पुराने क्रमांकित अभ्यासों की जगह हर टॉपिक पर आधारित चर्चा और गतिविधियाँ दी गई हैं, इसलिए यहाँ हर अध्याय की मुख्य अवधारणा पर आधारित हल दिए गए हैं, जो टेक्स्टबुक की गतिविधियों जैसी शैली में हैं। These Class 7 Science solutions are also useful as quick revision notes before exams.
पाठों की सूची और मुख्य अवधारणा
- अध्याय 1: विज्ञान का निरंतर बढ़ता संसार
- अध्याय 2: पदार्थों का अन्वेषण — अम्लीय, क्षारीय एवं उदासीन
- अध्याय 3: विद्युत — परिपथ एवं उनके घटक
- अध्याय 4: धातुओं और अधातुओं का संसार
- अध्याय 5: हमारे आस-पास के परिवर्तन — भौतिक एवं रासायनिक
- अध्याय 6: किशोरावस्था — वृद्धि एवं परिवर्तन की अवस्था
- अध्याय 7: प्रकृति में ऊष्मा का स्थानांतरण
- अध्याय 8: समय एवं गति का मापन
- अध्याय 9: जंतुओं में जैव प्रक्रम
- अध्याय 10: पादपों में जैव प्रक्रम
- अध्याय 11: प्रकाश — छाया एवं परावर्तन
- अध्याय 12: पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य
अध्याय 1: विज्ञान का निरंतर बढ़ता संसार
यह अध्याय पुस्तक का परिचयात्मक अध्याय है, जो विज्ञान को तथ्यों के संग्रह के बजाय एक निरंतर खोज की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है — जिसमें अवलोकन करना, गूढ़ प्रश्न पूछना, तथा प्रयोगों एवं क्रियाकलापों के माध्यम से उत्तर खोजना शामिल है। यह कक्षा 6 की जिज्ञासा पाठ्यपुस्तक से आगे बढ़ते हुए विद्यार्थियों को बताता है कि इस वर्ष वे भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान तथा भू-विज्ञान जैसे विविध क्षेत्रों से जुड़े विषय पढ़ेंगे, और यह भी कि विज्ञान के ये सभी क्षेत्र आपस में जुड़े हुए हैं। अध्याय में पृथ्वी और चंद्रमा की परछाइयों से जुड़ी परिघटनाओं (जैसे ग्रहण) की झलक भी दी गई है, जिनका विस्तृत अध्ययन आगे के अध्यायों में किया जाएगा।
क्रियाकलाप 1.1 — आनंददायक अन्वेषण: उत्तरों के प्रश्न बनाइए
गतिविधि: यह एक खुली (open-ended) रचनात्मक गतिविधि है — सामान्यतः विद्यार्थियों को प्रश्न दिए जाते हैं और उनसे उत्तर माँगे जाते हैं; यहाँ पाठ्यपुस्तक इस प्रक्रिया को उलट देती है। पाठ्यपुस्तक के अनुसार इस प्रकार के अभ्यास में “कोई भी प्रश्न कभी गलत नहीं होता” — विद्यार्थी को नीचे दिए गए प्रत्येक उत्तर के लिए स्वयं एक उपयुक्त, रचनात्मक प्रश्न बनाना है।
पाठ्यपुस्तक में दिए गए उदाहरण उत्तर:
1. “बस थोड़ा दूध डालें।”
2. “क्योंकि बिल्ली के दाँत टेढ़े थे।”
3. “घबराइए मत, मेरे पास तौलिया है।”
4. “42”
चूँकि यह गतिविधि रचनात्मक एवं बहु-उत्तरीय (एक से अधिक सही प्रश्न संभव) है, इसलिए यहाँ किसी एक “सही” प्रश्न को निश्चित उत्तर के रूप में नहीं दिया जा सकता — विद्यार्थियों को अपनी कल्पनाशीलता से भिन्न-भिन्न वैध प्रश्न बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जो कि इस गतिविधि का वास्तविक उद्देश्य है।
अध्याय 2: पदार्थों का अन्वेषण — अम्लीय, क्षारीय एवं उदासीन
यह अध्याय राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (28 फरवरी) पर आयोजित एक विज्ञान मेले की कहानी से शुरू होता है, जहाँ अश्विन और कीर्ति नामक भाई-बहन को श्वेत कागज दिया जाता है जिस पर एक द्रव छिड़कने से “विज्ञान के अद्भुत जगत में आपका स्वागत है” वाक्य उभर आता है। इस रहस्य को सुलझाते हुए अध्याय अम्ल-क्षार सूचकों (indicators) की अवधारणा सिखाता है।
2.1 प्रकृति — हमारी विज्ञान प्रयोगशाला (लिटमस, गुलाब एवं हल्दी सूचक)
क्रियाकलाप 2.1: नींबू का रस, साबुन का विलयन, आँवले का रस, इमली का पानी, सिरका, बेकिंग सोडा का विलयन, चूने का पानी, नल का पानी, कपड़े धोने के पाउडर का विलयन, चीनी और नमक के विलयन — इन दस प्रतिदर्शों की एक-एक बूँद नीले व लाल लिटमस पत्र पर डालकर तालिका 2.1 में रंग-परिवर्तन दर्ज किया जाता है। जो प्रतिदर्श नीले लिटमस को लाल करते हैं वे अम्लीय (समूह ‘क’ — जैसे नींबू, आँवला, इमली, सिरका), जो लाल लिटमस को नीला करते हैं वे क्षारीय (समूह ‘ख’ — जैसे साबुन, बेकिंग सोडा, चूने का पानी) और जो दोनों को अप्रभावित छोड़ते हैं वे उदासीन (समूह ‘ग’ — जैसे शुद्ध जल, चीनी/नमक का विलयन) कहलाते हैं। लिटमस लाइकेन से प्राप्त एक प्राकृतिक अम्ल-क्षार सूचक है।
क्रियाकलाप 2.2 व 2.3 (गुलाब व हल्दी सूचक): लाल गुलाब की पंखुड़ियों को कूटकर गरम पानी में घोलने से बना अर्क अम्ल (जैसे नींबू का रस) से गुलाबी-लाल तथा क्षार (जैसे साबुन) से हरा हो जाता है। इसी प्रकार हल्दी-रंजित कागज (हल्दी-पत्र) क्षारीय पदार्थों के संपर्क में आने पर पीले से लाल-भूरे रंग में बदल जाता है, जबकि अम्लों से इसका रंग नहीं बदलता — यही कारण है कि हल्दी के दाग पर साबुन (क्षारीय) लगाने से दाग गहरा भूरा दिखने लगता है। “रोचक तथ्य” बॉक्स के अनुसार हाइड्रेंजिया के पुष्पों का रंग भी मृदा की प्रकृति पर निर्भर करता है — अम्लीय मृदा में नीले तथा क्षारीय मृदा में गुलाबी/लाल पुष्प खिलते हैं।
2.2 एवं 2.3 उदासीनीकरण तथा दैनिक जीवन में इसके उपयोग
जब अम्ल के विलयन को क्षार के विलयन में पर्याप्त मात्रा में मिलाया जाता है तो परिणामी विलयन न तो अम्लीय रहता है न क्षारीय — इसे उदासीनीकरण अभिक्रिया कहते हैं, जिसमें ऊष्मा के साथ लवण व जल भी बनते हैं:
अम्ल + क्षार → लवण + जल + ऊष्मा
पाठ्यपुस्तक तीन वास्तविक जीवन स्थितियों से इसे समझाती है — (1) लाल चींटी के काटने पर त्वचा में अम्लीय (फॉर्मिक अम्ल) प्रभाव होता है, जिस पर नम बेकिंग सोडा (क्षारीय) लगाने से आराम मिलता है; (2) अम्लीय मृदा में कार्बनिक खाद (compost) मिलाने से उसकी क्षारीय प्रकृति उदासीन होती है; (3) कारखानों से निकलने वाला अम्लीय अपशिष्ट झील में छोड़ने से पहले क्षारीय पदार्थ मिलाकर उदासीन किया जाता है, जिससे झील की मछलियाँ सुरक्षित रहती हैं। “वैज्ञानिक से परिचय” बॉक्स में आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रे (पी.सी.रे) को ‘आधुनिक भारतीय रसायन विज्ञान के जनक’ के रूप में स्मरण किया गया है, जिन्होंने 1901 में भारत की प्रथम फार्मास्युटिकल कंपनी स्थापित की थी।
अभ्यास प्रश्न (चयनित, तर्क सहित हल)
प्रश्न 1: एक विलयन लाल लिटमस पत्र को नीला कर देता है। निम्नलिखित में से कौन-सा विलयन अत्यधिक मात्रा में मिलाने पर इस परिवर्तन को उत्क्रमित (reverse) कर देगा — (i) चूने का पानी (ii) बेकिंग सोडा (iii) सिरका (iv) साधारण नमक का विलयन?
हल: लाल लिटमस का नीला होना क्षारीय प्रभाव दर्शाता है; इसे उलटने के लिए एक अम्लीय पदार्थ चाहिए। दिए गए विकल्पों में केवल सिरका (vinegar) अम्लीय है — शेष दो क्षारीय (चूने का पानी, बेकिंग सोडा) और एक उदासीन (नमक का विलयन) हैं। अतः सही उत्तर (iii) सिरका है।
प्रश्न 2: तीन अज्ञात विलयन ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ हैं। ‘क’ में लाल लिटमस डालने पर वह नीला हो जाता है; ‘ख’ में हल्दी-विलयन डालने पर वह लाल हो जाता है; ‘ग’ में गुलाब के अर्क की बूँदें डालने पर वह हरा हो जाता है। इनकी प्रकृति का सही क्रम क्या है?
हल: तीनों प्रेक्षण क्षारीय प्रकृति के संकेतक हैं — लाल लिटमस का नीला होना, हल्दी का लाल होना, और गुलाब के अर्क का हरा होना (जैसा क्रियाकलाप 2.1-2.3 में देखा गया) — तीनों ही क्षारीय पदार्थों के लक्षण हैं। अतः ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ तीनों क्षारीय, क्षारीय, क्षारीय हैं।
अध्याय 3: विद्युत — परिपथ एवं उनके घटक
यह अध्याय निहाल और उसके सहपाठियों की भाखड़ा नंगल बाँध (पंजाब-हिमाचल प्रदेश सीमा पर, सतलुज नदी पर स्थित) भ्रमण यात्रा की कहानी से शुरू होता है, जहाँ गिरते हुए जल के बल से विद्युत उत्पन्न की जाती है। यात्रा से पहले विद्यार्थियों ने घर, पड़ोस और नगर में विद्युत के उपयोगों की सूची बनाई (पाक-क्रिया, प्रकाश-व्यवस्था, परिवहन, ऊष्मन-शीतलन जैसी श्रेणियों में) — जिससे यह समझ में आई कि विद्युत हमारे दैनिक जीवन में कितनी व्यापक रूप से उपयोग होती है।
3.2 एक सरल विद्युत परिपथ — विद्युत सेल, एल.ई.डी. लैंप तथा विद्युत परिपथ
क्रियाकलाप 3.2 (विद्युत सेल): प्रत्येक विद्युत सेल में दो सिरे होते हैं — एक उभरी हुई धातु की टोपी (धनात्मक सिरा) और एक चकती धातु की डिस्क (ीणात्मक सिरा)। आजकल कई टॉर्चों में परंपरागत तापदीप्त लैंप के स्थान पर प्रकाश उत्सर्जक डायोड (एल.ई.डी.) लगाए जा रहे हैं — ये कम विद्युत में अधिक चमकीली से जलते हैं।
3.2.5 विद्युत परिपथ: लैंप तभी दीप्तिमान होता है जब इसका एक सिरा विद्युत सेल के एक टर्मिनल से और दूसरा सिरा सेल के दूसरे टर्मिनल से जुड़ा जाता है, जिससे एक संपूर्ण पथ बनता है जिसे विद्युत परिपथ कहते हैं। परिपथ में विद्युत-धारा की दिशा सदैव विद्युत सेल के धनात्मक टर्मिनल से ओर ओर होती है।
3.3 परिपथ आरेख — घटकों के प्रतीक
विद्युत परिपथ के घटकों (विद्युत सेल, बैटरी, विद्युत लैंप आदि) को निर्धारित प्रतीकों द्वारा दर्शाया जाता है, ताकि परिपथ को सरल रेखाचित्र (परिपथ आरेख) के रूप में दर्शाया जा सके। पाठ्यपुस्तक की तालिका 3.2 में विद्युत सेल (—| |—), बैटरी (दो या अधिक सेलों का समूह, —||| |—) और विद्युत लैंप (वृत्त में X) के मानक प्रतीक दिए गए हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: टॉर्च में लैंप कब दीप्तिमान होता है?
हल: टॉर्च का लैंप केवल तभी दीप्तिमान होता है जब स्विच ऑन करने पर विद्युत सेल, तार और लैंप से मिलकर एक संपूर्ण, अविच्छिन्न परिपथ बनता है जिसमें सेल के धनात्मक टर्मिनल से लेकर ीणात्मक टर्मिनल तक लगातार रास्ता बना रहता है; यदि रास्ते में कहीं भी डिस्कनेक्ट (टूट-फूट) हो, जैसे स्विच ऑफ स्थिति में, तो परिपथ अधूरा रह जाता है और लैंप बुझ जाता है।
अध्याय 4: धातुओं और अधातुओं का संसार
यह अध्याय राजस्थान के एक गाँव में रहने वाले यशवंत और आनंदी की कहानी से शुरू होता है, जिन्हें विद्यालय परियोजना में धातु का कार्य करने वाले शिल्पकारों के बारे में जानना था। वे अपने दादा जी के साथ स्थानीय लोहार सुदर्शन चाचा से मिलते हैं, जो तवा, बाल्टी, चिमटा एवं फावड़ा-कुल्हाड़ी-खुर्पी जैसे कृषि उपकरण बनाते हैं। चाचा लोहे के तपते टुकड़े को हथौड़े से पीटकर आकार देते हुए दिखाते हैं, जिससे यह प्रश्न जन्म लेता है कि बाकी सामग्रियों में भी क्या ऐसे गुण पाए जाते हैं।
4.1 सामग्रियों के गुण — आघातवर्धनीयता
तालिका 4.1 (हथौड़े से पीटने का प्रभाव): ताँबे, एलुमिनियम एवं लोहे की कील जैसी धातुओं के टुकड़े हथौड़े से पीटने पर चपटे हो जाते हैं, टूटते नहीं — इस गुण को आघातवर्धनीयता कहते हैं। इसके विपरीत, कोयले और सल्फर (गंधक) के टुकड़े हथौड़े से पीटने पर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाते हैं — ये भंगुर कहलाते हैं। लकड़ी न तो चपटी है और न ही टूटती है — अत: वह न आघातवर्धनीय है और न ही भंगुर।
समग्र दृष्टि — भारत की सभ्यता में लोहे का प्रभाव: हड़प्पा सभ्यता के लोग ताँबे और सोने जैसी धातुओं का उपयोग करना जानते थे, लेकिन लोहे के उपयोग का प्रमाण संभवत: नहीं मिला है, क्योंकि लोहे को उपयोगी बनाने में अधिक समय लगा। बाद में जब लोहे का उपयोग बढ़ा तो इसने भारतीय सभ्यता की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया — जैसे लोहे से बने कृषि उपकरण पहले के उपकरणों से अधिक मजबूत थे।
4.1 भाग 2 — ध्वानिकता (सोनोरिटी)
धातु का चम्मच और धातु का सिक्का टकराने पर निनाद (रिंगिंग) ध्वनि उत्पन्न करते हैं, जबकि कोयला और लकड़ी हल्की मंद ध्वनि उत्पन्न करते हैं। धातुओं के इस गुण को जिसके कारण वे निनाद ध्वनि उत्पन्न करते हैं, ध्वानिकता कहते हैं। पाठ्यपुस्तक इसे दो परिचित उदाहरणों से जोड़ती है — नर्तकों के घुंघरूओं की झंकार और विद्यालय में बजने वाली घंटी की ध्वनि — दोनों धातुओं की ध्वानिकता के कारण ही सुनाई देती हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: सल्फर का टुकड़ा हथौड़े से पीटने पर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाता है। यह किस गुण को दर्शाता है और सल्फर धातु है या अधातु?
हल: यह भंगुरता (brittleness) गुण है। चूँकि भंगुर पदार्थ आघात पर टूट जाते हैं न कि चपटते (आघातवर्धनीय नहीं होते), अत: सल्फर एक अधातु है।
अध्याय 5: हमारे आस-पास के परिवर्तन — भौतिक एवं रासायनिक
यह अध्याय दो विद्यार्थियों के रोजमर्रा के अवलोकनों से शुरू होता है — एक कहता है “आधे घंटे पूर्व मैंने यहाँ बर्फ का एक टुकड़ा रखा था, अब यह जल बन गया है” (भौतिक परिवर्तन का उदाहरण), दूसरी कहती है “मैंने कल गुलाब के पौधे पर जो कली देखी थी वह आज फूल बन गई है” (जैव वृद्धि का उदाहरण)। इन दैनों जैसे दैनंदिन के उदाहरणों से परिवर्तनों को समझना इस अध्याय का आधार है।
तालिका 5.1 (आस-पास के परिवर्तन का अवलोकन): बर्फ का पिघलना, सब्जियों का कटना, जल का उबलना, मक्का से पॉपकॉर्न बनना, कागज का टुकड़ों में कटना, चुकंदर के रस का जल में मिलना, लकड़ी का जलना — इन सभी परिवर्तनों को देखकर विद्यार्थी पहचानते हैं कि कुछ परिवर्तनों में पदार्थ का स्वरूप बदलता है पर मूल प्रकृति वही रहती है (भौतिक परिवर्तन), जबकि कुछ में एक बिल्कुल नया पदार्थ बनता है जिसे वापस पहले वाले रूप में नहीं लाया जा सकता (रासायनिक परिवर्तन, जैसे जलना)।
5.1 पदार्थ के स्वरूप में परिवर्तन — मूल रूप समान रहता है
क्रियाकलाप 5.2 (कागज और गुब्बारे): कागज की शीट से मोड़कर पक्षी, नाव जैसी आकृतियां (ओरिगामी) बनाई जाती हैं — तहों खोलकर पुनः वही सपाट कागज प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार गुब्बारे को फुलाकर फिर पकड़ ढीली करके हवा निकालो — वह मूल स्थिति में आ जाता है। ये दोनों — कागज मोड़ना और गुब्बारा फुलाना — प्रतिवर्तनीय (reversible) भौतिक परिवर्तन हैं।
दहन एक रासायनिक परिवर्तन है — मोमबत्ती का गिलास से ढकना
जिस मोमबत्ती को ढका नहीं जाता, वह जलती रहती है; जिसे काँच के गिलास से ढका जाता है, वह कुछ समय बाद बुझ जाती है — क्योंकि दहन के लिए आवश्यक वायु की निरंतर आपूर्ति रुक जाती है। पलटे रखे गिलास के अंदर चूने का पानी डालकर परीक्षण किया जा सकता है कि मोम से प्राप्त कार्बन और वायु के ऑक्सीजन की अभिक्रिया से कार्बन डाइऑक्साइड बनी है या नहीं — चूने का पानी दूधिया हो जाता है, जिससे CO₂ की पुष्टि होती है — यह प्रमाणित करता है कि दहन के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है और यह एक नया (रासायनिक रूप से भिन्न) पदार्थ बनाता है।
विज्ञान एवं समाज (सुरक्षा संबंधी तथ्य): यदि किसी व्यक्ति के वस्त्रों में आग लग जाए तो उसे कंबल या किसी कपड़े में लपेट देना चाहिए — इससे वायु (ऑक्सीजन) की आपूर्ति बंद हो जाती है और आग बुझ जाती है; परंतु संश्लेषित (synthetic) रेशों से बने कपड़े का उपयोग इसके लिए नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे पिघलकर त्वचा से चिपक सकते हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: गुब्बारे में वायु भरकर उसे फुलाना भौतिक परिवर्तन है या रासायनिक? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
हल: यह एक भौतिक परिवर्तन है, क्योंकि गुब्बारे की रबड़ का पदार्थ (रबड़) नहीं बदलता — केवल उसका आकार बदलता है, जैसे कागज मोड़कर आकृति बनाने में होता है। जबकि जलने जैसे रासायनिक परिवर्तन में एक बिल्कुल नया पदार्थ (जैसे CO₂) बनता है।
अध्याय 6: किशोरावस्था — वृद्धि एवं परिवर्तन की अवस्था
यह अध्याय पादप के बीज से लेकर तरुण पादप बनने तक की यात्रा की तुलना से शुरू होता है, जिसमें उचाई, पत्तियों, फूलों और नए बीजों का विकास होता है। इसी प्रकार मनुष्य की जीवन-यात्रा शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, वयस्क-अवस्था और वृद्धावस्था में बटी है। 10 से 19 वर्ष की आयु की अवधि को किशोरावस्था कहते हैं — यह बाल्यावस्था और वयस्क-अवस्था के मध्य विकास की अवस्था है, जिसमें शरीर वयस्क होने के लिए तैयार होने लगता है।
6.1 आयु के साथ वृद्धि — किशोरवय के वर्ष
तालिका 6.1 (वृद्धि के दौरान होने वाले परिवर्तन): लंबाई/कद, भार और बल, स्वरूप — इन तीन शीर्षकों पर विद्यार्थी अपने स्वयं के वृद्धि-संबंधी अवलोकन दर्ज करते हैं। यह अवस्था सामान्यतः 10 से 19 वर्ष की आयु तक बनी रहती है, हालांकि प्रत्येक व्यक्ति में इसकी समयावधि अलग-अलग हो सकती है।
6.2 जनन क्षमता को इंगित करने वाले परिवर्तन — द्वितीयक लैंगिक विशेषताएँ
किशोरावस्था में कुछ परिवर्तन सरलता से दिखाई देते हैं — जैसे आवाज में परिवर्तन, लड़कों में चेहरे और सीने पर बालों का उगना, और लड़कियों में स्तनों का विकास। ये जनन की प्रक्रिया में प्रत्यक्षत: शामिल नहीं होते परंतु स्त्री-पुरुषों में अंतर करने में सहायक होते हैं, इसी कारण इन्हें द्वितीयक लैंगिक विशेषताएँ कहते हैं — ये प्राकृतिक संकेत हैं जो यौवनारंभ (puberty) को चिह्नित करते हैं। आंतरिक रूप से, लड़कियों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आर्तव चक्र (माहवारी/पीरियड्स) का आरंभ है, जो सामान्यत: प्रति 28–30 दिन में होता है।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: द्वितीयक लैंगिक विशेषताओं और जनन-संबंधी आंतरिक परिपक्वता में क्या अंतर है?
हल: द्वितीयक लैंगिक विशेषताएँ (जैसे आवाज में बदलाव, चेहरे/शरीर पर बाल) वे बाह्य, दृष्टिगोचर परिवर्तन हैं जो जनन प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होते, जबकि जनन-संबंधी परिपक्वता (जैसे आर्तव चक्र का आरंभ) आंतरिक, दिखाई नहीं देने वाला परिवर्तन है जो सीधे शरीर के वयस्क होकर जनन के लिए सक्षम बनने से जुड़ा है।
अध्याय 7: प्रकृति में ऊष्मा का स्थानांतरण
यह अध्याय गंगटॉक (सिक्किम) में रहने वाले भाई-बहन पेमा और पालदेन की कहानी से शुरू होता है। एक ठंडी शाम आग के पास बैठे, पालदेन अपनी शीतकालीन केरल-यात्रा का अनुभव साझा करता है — केरल सर्दियों में गंगटॉक की तुलना में अत्यंत उष्ण एवं आर्द्र था। दादा जी (एक सेवानिवृत्त विज्ञान अध्यापक) समझाते हैं कि केरल भूमध्य रेखा के अधिक समीप है और लंबी समुद्र-तटीय रेखा रखता है, जबकि गंगटॉक को सूर्य का प्रकाश सीधा नहीं मिलता। आगे पेमा अपनी दादी माँ को सिक्किम के पारंपरिक व्यंजन ‘थुक्पा’ धातु के बर्तन में बनाते देखती है — इससे यह प्रश्न उठता है कि भोजन पकाने के लिए धातु के बर्तन का ही उपयोग क्यों होता है, जिसका जवाब इसी अध्याय में मिलता है।
क्रियाकलाप 7.1 — धातु की पट्टी पर मोम-चिपकी पिनों का प्रयोग
धातु की एक पट्टी पर मोम से चार पिनें चिपकाई जाती हैं और पट्टी के एक सिरे को मोमबत्ती से गरम किया जाता है। अवलोकन: सबसे निकटतम पिन (पिन 1) सर्वप्रथम गिरता है, उसके बाद पिन 2, फिर पिन 3 और अंत में पिन 4 — ये सभी एक साथ नहीं गिरते। इससे पता चलता है कि ऊष्मा का स्थानांतरण पट्टी के गरम छोर से ठंडे छोर की ओर होता है। वह प्रक्रिया जिसमें किसी वस्तु के गरम भाग से ठंडे भाग में ऊष्मा का स्थानांतरण होता है, उसे चालन (conduction) कहते हैं।
जो पदार्थ ऊष्मा को अपने में से सरलता से संचरित होने देते हैं, वे ऊष्मा के सुचालक कहलाते हैं — धातुएँ ऊष्मा की सुचालक होती हैं, इसीलिए भोजन बनाने के बर्तन धातु के बने होते हैं। यदि धातु की पट्टी के स्थान पर लकड़ी अथवा काँच जैसे पदार्थों से बनी पट्टी ली जाए तो क्रियाकलाप 7.1 में पिनें नीचे नहीं गिरेंगी, क्योंकि लकड़ी और काँच ऊष्मा के कुचालक (अधातु) होते हैं — ‘धातुओं और अधातुओं का संसार’ नामक अध्याय में पढ़ी गई इसी समझ से।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: ओस (बर्तन) बनाने के लिए मिट्टी के बर्तन की बजाय धातु के बर्तन क्यों पसंद किए जाते हैं?
हल: मिट्टी ऊष्मा की कुचालक (मंद चालक) होती है, जबकि धातु ऊष्मा की सुचालक होती है। इसी लिए मिट्टी के बर्तन से बनी थुक्पा जैसी डिश का मूठा पकड़ने पर हाथ नहीं जलाता, जबकि धातु के बर्तन से गरम भोजन पकड़ने पर हाथ जल जाता है।
अध्याय 8: समय एवं गति का मापन
यह अध्याय प्रेरणा नामक एक लड़की की कहानी से शुरू होता है, जिसे दौड़-प्रतियोगिताएँ देखने और उनमें भाग लेने में आनंद आता है। उसने जनपद स्तर की अंतर्विद्यालयी प्रतियोगिता में 100 मीटर की तीव्र दौड़ जीती है और अब राज्य-स्तर की प्रतियोगिता के लिए प्रशिक्षण ले रही है। उसके विद्यालय का खेल-शिक्षक समय-मापन के लिए ‘विराम घड़ी’ (स्टॉपवॉच) का उपयोग करते हैं। प्रेरणा ने घर में समय देखने के विविध साधन देखे हैं — माता जी की कलाई पर बंधी घड़ी, बहन का मोबाइल फोन, और दृष्टिबाधित चाचा जी की ब्रेल-अंकित घड़ी — जिसे वे स्पर्श करके समय जानते हैं। हाल ही में चाचा जी ने एक बोलने वाली घड़ी भी खरीदी है जो बटन दबाने पर समय की घोषणा करती है — ये सभी दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए स्वतंत्र रूप से समय जानने में सहायक साधन हैं।
8.1 समय का मापन — घड़ियों से पहले
प्रश्न: जब घड़ियाँ नहीं थीं तो लोग समय का मापन किस प्रकार करते थे? पाठ्यपुस्तक इसका जवाब देती है: मनुष्य ने प्रकृति में नियमित रूप से दोहराने वाली घटनाओं को समय जानने के लिए उपयोग किया — जैसे सूर्य का उदय एवं अस्त होना, प्रतिदिन बदलती चंद्रमा की कलाएँ, तथा बदलती हुई ऋतुएँ। समय-निर्धारण के लिए उन्होंने पंचांग (कैलेंडर) बनाए— सूर्य के उदय एवं अस्त होने के चक्र द्वारा एक दिन को परिभाषित किया गया।
अध्याय 9: जंतुओं में जैव प्रक्रम
यह अध्याय तमिल नीति-ग्रंथ ‘थिरुकुरल’ के एक सूक्त (थिरुकुरल 942) से शुरू होता है, जिसका भावार्थ है: “यदि आपके द्वारा किया गया भोजन आपके पुन: भोजन करने से पहले पूरी तरह पच गया है तो आपको पीड़ा के लिए औषधि की आवश्यकता नहीं होगी।” कक्षा 6 के ‘सजीव — विशेषताओं का अन्वेषण’ अध्याय में पोषण, श्वसन, उत्सर्जन और जनन जैसे जीव प्रक्रमों के बारे में सीखा था; इस अध्याय में पोषण एवं श्वसन पर विस्तार से चर्चा की जाती है।
क्रियाकलाप 9.1 — लार और पाचन — रोटी/चावल को चबाने का प्रयोग
रोटी अथवा उबले चावल का एक ग्रास लेकर जब 30-60 सेकंड तक अच्छी तरह चबाया जाए तो उसके स्वाद में मीठास आने लगती है। रोटी/चावल में मंड (एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट) होता है; हमारी लार में पाचक रस होता है जो मंड को शर्करा में विघटित करने में सहायता करता है — इसीलिए ज्यादा देर चबाने पर मीठा स्वाद महसूस होता है। भोजन के घटकों को सरल रूपों में विघटित करने में लार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
विज्ञान एवं समाज — मुख का स्वास्थ्य: मुख का स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए दिन में दो बार दाँतों पर मंजन करना, जीभ साफ रखना, और हर भोजन के बाद कुल्ला करना चाहिए — इससे दंतक्षय और मुख की दुर्गंध से बचा जा सकता है।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: रोटी को जितना अधिक देर तक चबाया जाए, उसका स्वाद उतना ही मीठा होता जाता है, ऐसा क्यों होता है?
हल: रोटी में मंड (स्टार्च) होता है, जो एक जटिल कार्बोहाइड्रेट है और मूलतः मीठा नहीं होता। जैसे-जैसे हम चबाते हैं, लार में मौजूद पाचक रस इस मंड को धीरे-धीरे सरल शर्करा में विघटित करता जाता है — इसीलिए जितना अधिक चबाएंगे, उतनी ही शर्करा बनेगी और स्वाद मीठा होता जाएगा।
अध्याय 10: पादपों में जैव प्रक्रम
यह अध्याय कक्षा 6 में सीखे गए इस तथ्य से जुड़कर शुरू होता है कि सभी सजीवों में वृद्धि होती है और उन्हें वृद्धि के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। पिछले अध्याय में जंतु पोषण के बारे में चर्चा हुई; यहाँ प्रश्न उठता है — जंतुओं की भाँति पादप भोजन ग्रहण करते दिखाई नहीं देते, फिर वे अपनी वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक — कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन एवं खनिज — कहाँ से प्राप्त करते हैं?
तालिका 10.1 — पौधों की वृद्धि पर सूर्य के प्रकाश और जल का प्रभाव
एक नियंत्रित प्रयोग में तीन गमलों (क, ख, ग) को अलग-अलग स्थितियों में रखा जाता है — गमला ‘क’ सीधे सूर्य प्रकाश में रखकर जलयुक्त रखा जाता है, और गमला ‘ग’ अंधेरे स्थान में रखकर भी जलयुक्त रखा जाता है। दो सप्ताह तक पौधों की ऊँचाई, पत्तियों की संख्या और पत्तियों के रंग की तुलना तालिका 10.1 में दर्ज की जाती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रकाश की उपलब्धता से वंचित पौधों की वृद्धि रुक जाती है।
क्रियाकलाप — पत्ती में मंड (स्टार्च) की जाँच (आयोडीन परीक्षण)
वर्णविहीन (अल्कोहॉल में उबालकर हरीत रंगरहित की गई) पत्ती पर बिंदुपाती (ड्रॉपर) से आयोडीन के तनुकृत विलयन की कुछ बूँदें डाली जाती हैं। यदि पत्ती का वर्ण परिवर्तित होकर नीला-काला हो जाए तो यह पत्ती में मंड की उपस्थिति को इंगित करता है — यह पुष्टि करता है कि प्रकाश पाई हुई पत्ती ने भोजन (मंड) बनाया है। सावधानी: एल्कोहॉल को ऊष्मा के स्रोत के पास कदापि न रखें, क्योंकि यह अत्यधिक ज्वलनशील होता है और सरलता से आग पकड़ सकता है।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: आयोडीन परीक्षण से पहले पत्ती को वर्णविहीन क्यों किया जाता है?
हल: पत्ती के हरे रंग (क्लोरोफ़िल) को हटाने से आयोडीन डालने पर होने वाला रंग-परिवर्तन (नीला-काला होना, जो मंड की उपस्थिति दर्शाता है) स्पष्ट रूप से दिखाई दे — हरा रंग इस परीक्षण में बाधा डालता है।
अध्याय 11: प्रकाश — छाया एवं परावर्तन
यह अध्याय केशव और उसके मित्र जतिन की कहानी से शुरू होता है, जो ग्रीष्मावकाश में महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्र में जतिन के नाना जी के गाँव में बिताते हैं। रात्रि में चमकते सैकड़ों जुगनूओं का नृत्य केशव को सर्वाधिक आकर्षक लगता है। जतिन के नाना-नानी बताते हैं कि जुगनू मौसमी कीट हैं जो परस्पर संप्रेषण हेतु प्रकाश का उपयोग करते हैं (जैव-प्रकाश), परंतु प्रकाश-प्रदूषण और सिकुड़ते वनावरण के कारण उनकी संख्या घट रही है। लौटते समय रात की बस यात्रा में चाँदनी देखकर केशव सोचता है कि क्या चंद्रमा स्वयं अपना प्रकाश उत्पन्न करता है? उसे याद आता है कि कक्षा 6 की जिज्ञासा पाठ्यपुस्तक के ‘पृथ्वी से परे’ अध्याय में यह बताया गया था कि हमारे सौर-परिवार में केवल सूर्य ही स्वयं का प्रकाश उत्पन्न करता है; चंद्रमा सहित अन्य सभी पिंड सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके ही चमकते हैं।
11.2 क्या प्रकाश सरल रेखा में गमन करता है?
क्रियाकलाप 11.1 (माचिस की डिब्बियों से जाँच): माचिस की तीन डिब्बियों की ट्रे में एक समान स्थिति पर एक-एक छिद्र बनाकर डिब्बियों को खड़ा किया जाता है ताकि तीनों के छिद्र एक समान ऊँचाई पर एक सीध में रहें। टॉर्च की रोशनी इन तीनों छिद्रों से होते हुए दूसरी ओर रखे गए पर्दे पर चमकदार बिंदु के रूप में प्राप्त होती है। यदि किसी एक डिब्बी को थोड़ा सा खिसका दिया जाए (छिद्र सीध में न रहें) तो पर्दे पर प्रकाश का बिंदु प्राप्त नहीं होता। इससे पुष्टि होती है कि प्रकाश सरल रेखा में गमन करता है।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: चंद्रमा रात में चमकता हुआ क्यों दिखाई देता है, जबकि वह स्वयं प्रकाश उत्पन्न नहीं करता?
हल: चंद्रमा स्वयं प्रकाश उत्पन्न नहीं करता; हमारे सौर-परिवार में केवल सूर्य स्वयं प्रकाश उत्पन्न करने वाला पिंड है। चंद्रमा की चमक वास्तव में उसकी सतह से परावर्तित सूर्यप्रकाश है।
अध्याय 12: पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य
कन्याकुमारी, तमिलनाडु की 12 वर्षीय छात्रा रश्मिका रोज़ साइकिल से विद्यालय जाती थी। उसकी विज्ञान शिक्षिका ने कक्षा में विद्यार्थियों को अपने रोचक अवलोकन साझा करने और उनकी व्याख्या करने के लिए प्रोत्साहित किया था। रश्मिका ने देखा कि नारियल के पेड़ों की छाया दोपहर के समय सुबह की तुलना में छोटी होती है, और उसे लगा कि इसका संबंध आकाश में सूर्य की बदलती स्थिति से है। उसे याद आया कि कक्षा 6 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा के अध्याय पृथ्वी से परे में उसने पढ़ा था कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है। इससे उसके मन में एक संशय उठा कि क्या आकाश में गति करता हुआ सूर्य दिखाई देता है, या वास्तव में गति करने वाली पृथ्वी है?
12.1 पृथ्वी का घूर्णन
पृथ्वी अपने स्थान पर घूर्णन करती है, ठीक वैसे ही जैसे अपनी धुरी पर घूर्णन करता हुआ लट्टू, घूमता हुआ पंखा, या घूर्णन कराई गई गेंद। पृथ्वी भी अंतरिक्ष में अपनी धुरी पर घूर्णन करती है। पृथ्वी का घूर्णन अक्ष उसके भौगोलिक उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव से होकर गुजरता है, और पृथ्वी लगभग 24 घंटे में एक घूर्णन पूरा करती है। जब उत्तरी ध्रुव के ऊपर से देखा जाए तो पृथ्वी वामावर्त दिशा में, अर्थात पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही होती है। यदि हम पृथ्वी की विषुवत रेखा पर खड़े होकर आकाश का अवलोकन करें, तो पृथ्वी के पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन के कारण सूर्य हमें पूर्व दिशा में उदय होता, मध्याह्न के समय सिर के ऊपर आता, और संध्या के समय पश्चिम दिशा में अस्त होता हुआ प्रतीत होता है।
पृथ्वी के घूर्णन का प्रभाव रात्रि-आकाश में तारों पर भी दिखाई देता है — तारे भी सूर्य की भांति आकाश में घूमते हुए प्रतीत होते हैं। कक्षा 6 में अपनाई गई विधि से मार्च और मई के मध्य किसी संध्या को सप्तर्षि (बिग डिपर) और ध्रुव तारे का अवलोकन करने पर यह देखा जा सकता है कि रात्रि के विभिन्न समयों पर सप्तर्षि की स्थिति ध्रुव तारे के सापेक्ष बदलती रहती है, जबकि ध्रुव तारा लगभग स्थिर दिखाई देता है — यह पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूर्णन के कारण होता है। रोचक तथ्य यह है कि प्राचीन भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलविद आर्यभट ने अपने ग्रंथ आर्यभटीय में यह व्याख्या दी थी कि जिस प्रकार नाव में बैठा यात्री तट पर स्थिर वस्तुओं को विपरीत दिशा में गतिमान अनुभव करता है, उसी प्रकार पृथ्वी के घूर्णन के कारण स्थिर तारे भी हमें विपरीत दिशा में गतिमान प्रतीत होते हैं।
12.2 पृथ्वी का परिक्रमण
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूर्णन करने के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर परिक्रमण भी करती है, और यह गति घूर्णन से भिन्न है। कोई पिंड किसी अन्य पिंड के परितः जिस बंद पथ पर गमन करता है, वह उसकी कक्षा कहलाती है। ऊपर से देखने पर सूर्य के परितः पृथ्वी की कक्षा लगभग वृत्ताकार है, और पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा लगभग 365 दिन और 6 घंटे में पूरी करती है। चूंकि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर सतत परिक्रमा करती रहती है, इसलिए वर्ष भर में अलग-अलग समय पर रात्रि-आकाश में तारों के अलग-अलग समूह दिखाई देते हैं, जिससे रात्रि-आकाश का दृश्य क्रमशः बदलता रहता है। रोचक तथ्य यह है कि पश्चिम भारत की तापी घाटी में रहने वाले भील और पावरा जैसे स्थानीय समुदाय आकाश में कुछ तारों के पैटर्न की उपस्थिति का उपयोग मानसून वर्षा के आगमन के संकेत के रूप में परंपरागत रूप से करते रहे हैं।
12.2.2 पृथ्वी पर ऋतुएँ
पृथ्वी पर प्रत्येक वर्ष ऋतुएँ एक निश्चित चक्रीय क्रम में आती हैं, और यह पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर परिक्रमण से संबंधित है। साथ ही यह भी देखा गया है कि ग्रीष्मकाल में दिन शीतकाल के दिनों की तुलना में लंबे होते हैं। इसका कारण यह है कि पृथ्वी का घूर्णन अक्ष उसकी कक्षा के तल के सापेक्ष अभिलंबवत नहीं है, बल्कि झुका हुआ है। इस झुकाव के कारण जून महीने में उत्तरी गोलार्ध 12 घंटे से अधिक समय तक सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है, और सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में केंद्रित होकर अधिक तीव्रता से पड़ती हैं, जिस कारण वहां ग्रीष्म ऋतु होती है। दिसंबर महीने में उत्तरी गोलार्ध में स्थिति इसके विपरीत होती है — यहां सूर्य का प्रकाश कम समय के लिए और अपेक्षाकृत अधिक फैले हुए क्षेत्र में कम तीव्रता से प्राप्त होता है, जिस कारण वहां शीत ऋतु होती है।
12.3 सूर्य-ग्रहण एवं चंद्र-ग्रहण
कक्षा 6 में पढ़ा गया था कि चंद्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है, और यह पृथ्वी के चारों ओर वैसे ही परिक्रमण करता है जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर करती है। बुध एवं शुक्र जैसे ग्रह आकार में अत्यंत छोटे दिखने के कारण सूर्य के प्रकाश को हमारे तक पहुंचने से पूर्णतः नहीं रोक पाते, किंतु चंद्रमा ऐसा कर सकता है।
सूर्य-ग्रहण: जब किसी निश्चित समय पर सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा इस प्रकार आ जाता है कि वह सूर्य के प्रकाश को हमारे तक पहुंचने से रोक देता है, तो यह स्थिति सूर्य-ग्रहण कहलाती है। सूर्य-ग्रहण के अवलोकन के लिए विशिष्टीकृत नेत्र-सुरक्षा उपकरणों या दर्पण द्वारा प्रतिबिंब को दीवार पर प्रक्षेपित करने जैसी सुरक्षित परोक्ष विधियों का उपयोग किया जाना चाहिए, और यह क्रियाकलाप सदैव शिक्षक के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए — सूर्य को सीधे कभी नहीं देखना चाहिए। प्राचीनकाल से ही लोग सूर्य-ग्रहण एवं चंद्र-ग्रहण का अवलोकन एवं अभिलेखन करते आए हैं।
चंद्र-ग्रहण: कभी-कभी पूर्णिमा के दिन हम पृथ्वी की छाया चंद्रमा के पटल पर पड़ते हुए देखते हैं, जिसे चंद्र-ग्रहण कहा जाता है। जब चंद्रमा पूर्णतया पृथ्वी की छाया में होता है, तो इस परिघटना को पूर्ण चंद्र-ग्रहण कहा जाता है, और जब चंद्रमा का केवल कुछ भाग ही पृथ्वी की छाया में होता है, तो उसे आंशिक चंद्र-ग्रहण कहा जाता है।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: पृथ्वी की गति के दो प्रकार बताइए और इनके प्रभाव लिखिए।
हल: (1) घूर्णन — पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन-रात होते हैं (लगभग 24 घंटे में एक घूर्णन); (2) परिक्रमण — पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, जिससे ऋतु-परिवर्तन होता है (लगभग 365 दिन 6 घंटे में एक परिक्रमा)।
प्रश्न: पृथ्वी पर ऋतु-परिवर्तन क्यों होता है?
हल: पृथ्वी का घूर्णन अक्ष उसकी कक्षा के तल के सापेक्ष झुका हुआ है। इस झुकाव के कारण वर्ष के अलग-अलग समय पर पृथ्वी के अलग-अलग गोलार्ध सूर्य के प्रकाश को अधिक या कम समय तक और अधिक या कम तीव्रता से प्राप्त करते हैं, जिससे ऋतुएं बदलती हैं।
प्रश्न: सूर्य-ग्रहण और चंद्र-ग्रहण में क्या अंतर है?
हल: सूर्य-ग्रहण में चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है और सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकता है। चंद्र-ग्रहण में पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है।
प्रश्न: रात्रि-आकाश में तारों की स्थिति समय के साथ बदलती हुई क्यों प्रतीत होती है?
हल: यह पृथ्वी के अपनी धुरी पर होने वाले घूर्णन के कारण होता है। रात भर में स्थिति बदलती दिखती है, जबकि महीनों में तारामंडलों का समूह बदलना पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के कारण होता है।
Class 7 Science – Notes and Extra Questions
Along with these NCERT Solutions, students can also use the Class 7 Science Extra Questions and Class 7 Science Revision Notes for quick revision and extra practice.

