कक्षा 8 (हिंदी मीडियम) की विज्ञान पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा (NCERT, NEP 2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी 13 अध्यायों के लिए गतिविधि-आधारित शैली में हल किए गए प्रतिनिधि (representative) प्रश्नोत्तर नीचे दिए गए हैं। नई किताब में पुराने क्रमांकित अभ्यासों की जगह हर टॉपिक पर आधारित चर्चा और गतिविधियाँ दी गई हैं, इसलिए यहाँ हर अध्याय की मुख्य अवधारणा पर आधारित हल दिए गए हैं, जो टेक्स्टबुक की गतिविधियों जैसी शैली में हैं।
पाठों की सूची और मुख्य अवधारणा
- अध्याय 1: विज्ञान के अन्वेषी संसार की खोज यात्रा
- अध्याय 2: अदृश्य जीव-जगत— हमारी आँखों की क्षमता से परे
- अध्याय 3: स्वास्थ्य— एक अमूल्य निधि
- अध्याय 4: विद्युत — चुंबकीय एवं तापीय प्रभाव
- अध्याय 5: बलों को जानें
- अध्याय 6: दाब, पवन, झंझावात एवं चक्रवात
- अध्याय 7: द्रव्य की कणीय प्रकृति
- अध्याय 8: द्रव्य की प्रकृति— तत्व, यौगिक और मिश्रण
- अध्याय 9: विलेयों, विलायकों और विलयनों का अदभुत संसार
- अध्याय 10: प्रकाश— दर्पण एवं लेंस
- अध्याय 11: आकाशीय परिघटनाएँ और काल-निर्धारण
- अध्याय 12: प्रकृति कैसे सामंजस्य में कार्य करती है
- अध्याय 13: हमारा आवास— पृथ्वी एक अद्वितीय जीवनदायी ग्रह
अध्याय 1: विज्ञान के अन्वेषी संसार की खोज यात्रा
यह अध्याय “जिज्ञासा” पाठ्यपुस्तक शृंखला की शुरुआत है और कक्षा 6-7 में सीखी गई अवलोकन व जिज्ञासा-आधारित सीखने की शैली को आगे बढ़ाता है। इसमें कोई क्रमांकित अभ्यास प्रश्न नहीं हैं — बल्कि यह एक प्रेरक अध्याय है जो रोज़मर्रा के उदाहरणों (जैसे पूड़ी का तलना और चंद्रमा की कलाएं) के माध्यम से यह दिखाता है कि एक वैज्ञानिक किस प्रकार सोचता और प्रश्न पूछता है, और साथ ही वर्ष भर पढ़ाए जाने वाले विषयों की झलक भी देता है। यह कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 1 के संपूर्ण हिंदी समाधान/सार परीक्षा से पहले जल्दी दुहराने के लिए भी उपयोगी हैं।
केंद्रीय जिज्ञासा: पूड़ी की एक परत दूसरी से पतली क्यों होती है?
प्रश्न: जब पूड़ी या भटूरा गरम तेल में डाला जाता है तो वह फूलकर गुब्बारे जैसा हो जाता है, लेकिन उसकी एक परत दूसरी से पतली क्यों रह जाती है? इस साधारण रसोई-घटना की जांच एक वैज्ञानिक की भांति कैसे की जा सकती है?
हल: पाठ्यपुस्तक बताती है कि विज्ञान के लिए किसी विशेष प्रयोगशाला की ज़रूरत नहीं—घर की रसोई भी अवलोकन और जिज्ञासा के लिए एक उपयुक्त स्थान है। पूड़ी के फूलने की घटना की वैज्ञानिक जांच के लिए हमें दो बातें तय करनी होती हैं:
- हम क्या बदल (नियंत्रित) कर सकते हैं: बेले हुए आटे की मोटाई, आटे या मैदा का प्रकार, तेल का तापमान (खौलता हुआ, गरम या कम गरम), और पूड़ी को तेल में डालने का तरीका (लंबवत, कोण पर, या धीरे-धीरे)।
- हम क्या अवलोकन/माप सकते हैं: क्या पूड़ी फूली या नहीं (हां/ना), पूड़ी को फूलने में लगने वाला समय (सेकंड में), और क्या बेली हुई मोटी पूड़ी में भी पतली परत बनती है या नहीं।
एसे प्रयोग करते समय एक बार में केवल एक ही परिस्थिति (चर) बदली जाती है और बाकी सब समान रखी जाती हैं — उदाहरण के लिए, तेल के तापमान का प्रभाव जांचने के लिए समान मोटाई की पूड़ियां एक ही तरीके से तेल में डाली जाती हैं। प्रयोग के दौरान जो कुछ भी दिखे या महसूस हो (जैसे तेल के छींटे, गंध, या धुआं) उसे लिखकर रखना भी ज़रूरी माना गया है। पाठ्यपुस्तक स्पष्ट करती है कि पूड़ी के फूलने की यह सामान्य-सी दिखने वाली घटना वैज्ञानिकों द्वारा आज तक पूरी तरह से नहीं समझी गई है — जिससे यह पता चलता है कि क्रमबद्ध जांच (systematic inquiry) ही सरल से जटिल तक सभी वैज्ञानिक प्रयोगों का आधार है।
दूसरा उदाहरण: कैलेंडर और चंद्रमा की कलाएं
प्रश्न: दिनदर्शिका (कैलेंडर) की खोज कैसे हुई, और इसका पृथ्वी पर जीवन से क्या संबंध है?
हल: सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रमा की कलाओं के आवर्ती चक्रों के ध्यानपूर्वक अवलोकन से ही मानव को पहला कालदर्शक बनाना संभव हुआ। पाठ्यपुस्तक में चैत्र मास (22 मार्च–20 अप्रैल) के एक वास्तविक कैलेंडर का चित्र दिया गया है। यह दिखाता है कि पृथ्वी पर हमारी दिनचर्या दूर स्थित खगोलीय पिंडों की गति से किस प्रकार जुड़ी है — ठीक उसी तरह जैसे हर सजीव (छोटे कीट से लेकर विशालकाय व्हेल तक) वायु, जल, सूर्य के प्रकाश और अपने आस-पास के अन्य जीवों पर निर्भर होकर एक पारिस्थितिक तंत्र (ecosystem) बनाता है।
पृथ्वी की विशिष्ट रहने-योग्यता
प्रश्न: पृथ्वी को जीवन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त ग्रह क्यों माना जाता है?
हल: पृथ्वी सूर्य से ठीक उपयुक्त दूरी पर स्थित है, जहां जल द्रव अवस्था में रह सकता है, और इसका वायुमंडल हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन देने के साथ-साथ हानिकारक पराबैंगनी किरणों से भी सुरक्षा प्रदान करता है। पाठ्यपुस्तक यह चेतावनी भी देती है कि पृथ्वी पर मानवीय गतिविधियां वायुमंडल के तापमान में परिवर्तन का कारण बन सकती हैं, जिससे जलवायु के प्रतिरूप बिगड़ सकते हैं और इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। पुस्तक के अंतिम अध्याय में इन अवधारणाओं को फिर से एक साथ जोड़कर पृथ्वी की विशिष्टता और उसके समक्ष मौजूद चुनौतियों पर चर्चा की जाएगी।
इस वर्ष आगे क्या पढ़ेंगे? (झलक)
अध्याय के आरंभ में पूरी पाठ्यपुस्तक “जिज्ञासा” में आगे पढ़ाए जाने वाले विषयों की एक झलक भी दी गई है, जो दिखाती है कि विज्ञान की यह खोज यात्रा वर्ष भर किन दिशाओं में आगे बढ़ेगी:
- सूक्ष्मजीव, स्वास्थ्य और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता (immunity)
- विद्युत के दैनिक उपयोग और उसके प्रभाव
- बल (forces) — झंझावातों और चक्रवातों जैसी परिघटनाओं से जुड़ा हुआ
- द्रव्य की कणीय प्रकृति — लोहे के बुरादे, पानी के भाप बनने और गुब्बारे में गैस के कणों जैसे उदाहरणों से
- तत्व, यौगिक और मिश्रण — पदार्थों के वर्गीकरण का आधार
- विलयन (solutions) — जैसे चाय में चीनी का घुलना और मीठा स्वाद बनना
अध्याय का सार और महत्त्व
यह अध्याय पूरे “जिज्ञासा” पाठ्यक्रम का सुर तय करता है: विज्ञान को तथ्यों को रटने के बजाय अवलोकन, प्रश्न पूछने और खोज करने की एक सतत प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पूड़ी तलने जैसे रोज़मर्रा के उदाहरण से यह सिखाया जाता है कि वैज्ञानिक सोच के लिए किसी विशेष प्रयोगशाला की नहीं, बल्कि सजगता से किए गए अवलोकन और जिज्ञासा की आवश्यकता होती है — और यही सोच आगे के सभी अध्यायों (विद्युत, बल, द्रव्य, पारिस्थितिकी तंत्र) को समझने की नींव बनाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: क्या इस अध्याय में सामान्य अध्यायों की तरह क्रमांकित अभ्यास प्रश्न (exercise questions) दिए गए हैं?
उत्तर: नहीं। यह एक परिचयात्मक (orientation) अध्याय है, जिसमें औपचारिक अभ्यास के बजाय पूड़ी तलने और चंद्रमा-कैलेंडर जैसे उदाहरणों के माध्यम से वैज्ञानिक सोच को समझाया गया है — ठीक जैसे कक्षा 6 और कक्षा 7 के समकक्ष प्रारंभिक अध्यायों में भी किया गया था।
प्रश्न: क्या पूड़ी के फूलने की घटना विज्ञान द्वारा पूरी तरह समझी जा चुकी है?
उत्तर: नहीं, पाठ्यपुस्तक स्पष्ट रूप से बताती है कि यह सामान्य-सी दिखने वाली रोज़मर्रा की घटना वैज्ञानिकों द्वारा आज तक पूर्णतः समझी नहीं जा सकी है — जो यह दर्शाता है कि जिज्ञासा और खोज की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती।
अध्याय 2: अदृश्य जीव-जगत— हमारी आँखों की क्षमता से परे
यह अध्याय लेंस और सूक्ष्मदर्शी की खोज से शुरू होकर कोशिका (cell) और सूक्ष्मजीवों (microorganisms) तक ले जाता है।
लेंस और सूक्ष्मदर्शी की खोज
प्रश्न: मानव नेत्र केवल एक निश्चित आकार से बड़ी वस्तुओं को ही देख सकती हैं। छोटी-छोटी वस्तुओं को देखने के लिए एक विशेष उपकरण की खोज कैसे हुई?
हल: बहुत समय पूर्व लोगों ने पाया कि काँच का एक वक्रित टुकड़ा (मसूर की दाल/लेंटिल के दाने जैसा, बीच से मोटा और किनारों पर पतला) छोटी वस्तुओं को बड़ा दिखा सकता है। इसीलिए इसे लेंस कहा गया। समय के साथ लेंसों की गुणवत्ता में सुधार हुआ और साधारण आवर्धक लेंस से लेकर सूक्ष्मदर्शी (microscope) तक प्रत्येक नए उपकरण ने मनुष्यों को वह देखने में सहायता की जिसे नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता था। सूक्ष्मदर्शी के आविष्कार ने छोटे-छोटे जीवों से भरे एक अद्भुत और अदृश्य संसार का मार्ग प्रशस्त किया।
क्रियाकलाप: प्याज और गाल की कोशिकाओं का अवलोकन
प्रश्न: प्याज की झिल्ली और मानव कपोल (गाल) की कोशिकाओं को सूक्ष्मदर्शी से कैसे देखा जाता है, और इसके लिए नमूने को रंगना क्यों ज़रूरी है?
हल: पाठ्यपुस्तक में दो व्यावहारिक क्रियाकलाप दिए गए हैं: क्रियाकलाप 2.2 (प्याज की कोशिका का अध्ययन) में प्याज को टुकड़ों में काटकर चिमटी से उसकी भीतरी पारदर्शी झिल्ली निकाली जाती है, उसे 30 सेकंड के लिए सैफ्रेनीन (लाल रंग का अभिरंजक) में डुबोया जाता है ताकि कोशिकाएँ गुलाबी रंग की होकर स्पष्ट दिखें, फिर ग्लिसरीन की बूंद डालकर कॉवरस्लिप से ढककर सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है। क्रियाकलाप 2.3 (अन्वेषण करें) में एक स्वच्छ टूथपिक से गाल (कपोल) के भीतरी भाग को धीरे से खुरचकर पदार्थ लिया जाता है, मेथिलीन ब्लू (नीले रंग का अभिरंजक) से रंगा जाता है और सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है। दोनों गतिविधियों में अभिरंजक का उपयोग इसलिए ज़रूरी है क्योंकि सामान्य कोशिकाएँ लगभग पारदर्शी होती हैं और बिना रंगे स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देतीं। दोनों अवलोकनों में कोशिका भित्ति (कोशिका 2.4 आकृति), कोशिकाद्रव्य और केंद्रक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
सूक्ष्मजीव क्या हैं? मृदा निलंबन की खोज
प्रश्न: सूक्ष्मजीव (microorganism) किसे कहते हैं, और मिट्टी में इन्हें कैसे खोजा जा सकता है?
हल: “सूक्ष्म” का अर्थ है बहुत छोटा एवं “जीव” का अर्थ है जीवित प्राणी — अर्थात् ऐसे छोटे जीव जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता। क्रियाकलाप 2.6 में मिट्टी को पानी में मिलाकर हिलाया जाता है, इसे कुछ देर तक बीकर की तली में बैठने दिया जाता है — इस घोल तरल पानी को मृदा निलंबन कहते हैं। इसकी एक बूंद स्लाइड पर रखकर सूक्ष्मदर्शी से देखने पर उसमें भी कई प्रकार के छोटे गतिशील जीव दिखाई देते हैं — यह दर्शाता है कि मिट्टी में भी अनेक प्रकार के सूक्ष्मजीव मौजूद होते हैं।
जीवाणु की कोशिका पौधे/जंतुओं से कैसे अलग है?
प्रश्न: जीवाणु (bacteria), मसीर (यीस्ट), प्रोटोजोआ और शैवाल जैसे सूक्ष्मजीवों की कोशिका पौधों और जंतुओं की कोशिका से किस मुख्य रूप से अलग होती है?
हल: शैवाल को छोड़कर जीवाणुओं, यीस्ट (खमीर), प्रोटोजोआ और कवक जैसे जीवों में हरित लवक (chlorophyll) नहीं होते, इसलिए वे प्रकाश-संश्लेषण द्वारा स्वयं अपना भोजन नहीं बना सकते। जीवाणुओं में एक सुस्पष्ट केंद्र और केंद्रीय झिल्ली नहीं होती, उसके स्थान पर एक केंद्रकाभ (nucleoid) होता है — यही विशेषता उन्हें यीस्ट, प्रोटोजोआ, शैवाल, कवक, पौधों और जंतुओं की कोशिकाओं से अलग करती है। सभी जीव — सूक्ष्मजीवों सहित — एक या एक से अधिक कोशिकाओं से बने होते हैं।
खमीर से आटा फूलना: लाभकारी सूक्ष्मजीव का एक उदाहरण
प्रश्न: चीनी और गरम पानी मिलाकर गूँथे गए आटे में खमीर (यीस्ट) मिलाने से आटा कुछ घंटों बाद उपर क्यों उठ जाता है और उसकी गंध बदल जाती है?
हल: खमीर एक प्रकार का सूक्ष्मजीव है जो कवक (फंजाई) वर्ग का सदस्य है। आटे में मिलाया गया चीनी और गरम पानी खमीर की वृद्धि के लिए अनुकूल स्थितियां देते हैं। अन्य जीवों की भाँति खमीर भी श्वसन (respiration) करता है और भोजन (चीनी) को विघटित करके ऊर्जा प्राप्त करता है। इस प्रक्रिया के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड गैस निर्मुक्त होती है जिससे बुलबुले बनते हैं जो आटे को नरम और फूला हुआ बनाते हैं। इसी दौरान खमीर थोड़ी मात्रा में एल्कोहल भी बनाता है जिससे आटे से थोड़ी अलग गंध आती है। खमीर के इस गुण का उपयोग पावरोटी (ब्रेड), केक आदि बनाने में किया जाता है।
खाद (कंपोस्ट): सूक्ष्मजीवों द्वारा पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण
प्रश्न: फलों और सब्जियों के छिलके और पादप अपशिष्ट समय के साथ खाद में कैसे बदल जाते हैं?
हल: मिट्टी में मौजूद कुछ सूक्ष्मजीव, जैसे कवक (फंजाई) और जीवाणु, पादप अपशिष्ट पर क्रिया करके उसे धीरे-धीरे सरल पोषक तत्वों में बदल देते हैं। इस प्रक्रिया से बनी पोषक तत्वों से भरपूर सामग्री को खाद कहते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होती है। यही कारण है कि घरों और खेतों में सूखे पत्तों और पादप अपशिष्ट को एकत्र करके गड्ढों में डाला जाता है ताकि सूक्ष्मजीव उसे प्राकृतिक खाद में बदल दें।
अध्याय का दायरा
इस अध्याय में मुख्य रूप से लाभकारी सूक्ष्मजीवों (खाद बनाना, ब्रेड/केक में खमीर का उपयोग) को समझाया गया है। पाठ्यपुस्तक यह भी स्पष्ट करती है कि कुछ सूक्ष्मजीव पौधों और मनुष्यों सहित जंतुओं में रोग का कारण भी बनते हैं — इस विषय को अगले अध्याय (“स्वास्थ्य— एक अमूल्य निधि”) में विस्तार से लिया गया है।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 9 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1: कोशिका के विभिन्न भाग (केंद्रक, कोशिकाद्रव्य, हरितलवक, कोशिका भित्ति, कोशिका झिल्ली, न्यूक्लियॉइड) को उपयुक्त स्थान पर लिखिए — कौन-सा भाग किस प्रकार की कोशिका (पादप/जंतु/जीवाणु) में पाया जाता है?
हल: केवल पादप कोशिका में — हरितलवक (chloroplast); केवल जीवाणु कोशिका में — न्यूक्लियॉइड; पादप व जंतु दोनों में — केंद्रक (nucleus); पादप व जीवाणु दोनों में — कोशिका भित्ति; तीनों प्रकार की कोशिकाओं (पादप, जंतु, जीवाणु) में — कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) व कोशिका झिल्ली (cell membrane)।
प्र. 2: आनंदी ने दो परखनलियों (A व B) में शर्करा-घोल भरकर परखनली B में यीस्ट (खमीर) मिलाया और मुँह पर गुब्बारा बाँध दिया। (i) 3-4 दिन बाद क्या होगा और क्यों? (ii) एक अन्य परखनली में चूने का पानी लेकर वह क्या जाँचना चाहती है?
हल: (i) परखनली B में यीस्ट किण्वन (fermentation) द्वारा शर्करा को तोड़कर कार्बन डाइऑक्साइड गैस उत्पन्न करता है, जिससे गुब्बारा फूल जाता है। (ii) वह यह जाँचना चाहती है कि उत्पन्न गैस वास्तव में कार्बन डाइऑक्साइड ही है या नहीं — यदि गैस को चूने के पानी में प्रवाहित करने पर पानी दूधिया हो जाए, तो यह पुष्टि होती है कि गैस CO₂ है।
प्र. 3: एक किसान गेहूँ के खेत में नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक डालता है, जबकि पड़ोस के खेत में सेम (बीन्स) उगाने वाली किसान महिला उर्वरक नहीं डालतीं, फिर भी अच्छी उपज पाती हैं — क्यों?
हल: सेम जैसे फलीदार (leguminous) पौधों की जड़ों में जड़-ग्रंथिकाएँ (root nodules) होती हैं, जिनमें राइज़ोबियम जीवाणु रहते हैं। ये जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करके पौधों के उपयोग योग्य रूप में बदल देते हैं, इसलिए अतिरिक्त उर्वरक की आवश्यकता नहीं पड़ती।
प्र. 4: स्नेहल ने बगीचे में दो गड्ढे (A व B) खोदे — गड्ढे A में फल-सब्ज़ी के छिलकों को सूखी पत्तियों के साथ मिलाया, गड्ढे B में वही अपशिष्ट बिना सूखी पत्तियों के डाला। वह क्या जाँचना चाहती है?
हल: वह यह जाँचना चाहती है कि सूखी पत्तियों की उपस्थिति अपघटन (decomposition) की प्रक्रिया को किस प्रकार प्रभावित करती है। सूखी पत्तियाँ नमी के स्तर को संतुलित रखकर अपघटन को तेज़ करती हैं, जबकि बिना सूखी पत्तियों वाला गीला अपशिष्ट धीमी गति से अपघटित होता है।
प्र. 5: निम्नलिखित सूक्ष्मजीवों को पहचानिए — (i) मैं हर प्रकार के पर्यावरण में और आपकी आँत में भी रहता हूँ। (ii) मैं ब्रेड और केक को मुलायम व फूला हुआ बनाता हूँ। (iii) मैं दलहनी फसलों की जड़ों में रहकर उनके विकास हेतु पोषक तत्व देता हूँ।
हल: (i) जीवाणु (Bacteria); (ii) यीस्ट (खमीर); (iii) राइज़ोबियम।
प्र. 6: यह जाँचने के लिए एक प्रयोग तैयार कीजिए कि सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए उपयुक्त तापमान, वायु और नमी आवश्यक हैं।
हल: पके हुए चावल को तीन जारों में रखें — जार A: सूखा व गरम स्थान (नमी न होने से वृद्धि नहीं); जार B: नम व गरम स्थान (उपयुक्त परिस्थितियों में तेज़ वृद्धि); जार C: नम पर ठंडा स्थान (कम तापमान के कारण बहुत धीमी वृद्धि)। तीनों की तुलना से सिद्ध होता है कि सूक्ष्मजीवों की वृद्धि हेतु नमी व उपयुक्त तापमान दोनों आवश्यक हैं।
प्र. 7: ब्रेड के दो टुकड़े लीजिए — एक को सिंक के पास खुला रखें, दूसरे को फ्रिज में रखें। तीन दिन बाद तुलना कर अवलोकन व कारण लिखिए।
हल: सिंक के पास रखी ब्रेड पर फफूँद (mould) उग आती है, जबकि फ्रिज वाली ब्रेड ताज़ा बनी रहती है — क्योंकि फफूँद जैसे सूक्ष्मजीव गरम व नम परिस्थितियों में तेज़ी से बढ़ते हैं, जबकि फ्रिज के कम तापमान पर उनकी वृद्धि बहुत धीमी हो जाती है।
प्र. 8: एक विद्यार्थी ने देखा कि दही को एक दिन बाहर रखने पर वह अधिक खट्टा हो जाता है। इसके दो संभावित कारण बताइए।
हल: (1) दही में लैक्टोबैसिलस सहित कई प्रकार के जीवाणु होते हैं; बाहर रखने पर ये जीवाणु लगातार बढ़ते रहते हैं और अधिक लैक्टिक अम्ल बनाते हैं, जिससे खटास बढ़ जाती है। (2) लैक्टोबैसिलस जीवाणु गरम परिस्थितियों में तेज़ी से पनपते हैं, जिससे कमरे के तापमान पर अधिक अम्ल बनता है।
प्र. 9: दिए गए चित्र में फ्लास्क A में शर्करा-घोल व यीस्ट है, जो एक नली द्वारा परखनली B (चूने के पानी सहित) से जुड़ा है। (i) फ्लास्क A में शर्करा-घोल का क्या होता है? (ii) चार घंटे बाद परखनली B में क्या दिखेगा और क्यों? (iii) यदि फ्लास्क A में यीस्ट न डाला जाए तो क्या होगा?
हल: (i) यीस्ट किण्वन प्रक्रिया द्वारा शर्करा के अणुओं को तोड़ता है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड गैस और थोड़ी मात्रा में ऐल्कोहॉल बनता है। (ii) परखनली B का चूने का पानी दूधिया हो जाता है, क्योंकि फ्लास्क A से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड गैस उसमें प्रवाहित होती है। (iii) यदि यीस्ट न डाला जाए तो किण्वन नहीं होगा, कार्बन डाइऑक्साइड नहीं बनेगी और परखनली B का चूने का पानी दूधिया नहीं होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: क्या अध्याय 2 में रोगकारक (हानिकारक) सूक्ष्मजीवों के बारे में बताया गया है?
उत्तर: नहीं। यह अध्याय मुख्य रूप से कोशिका, सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन और लाभकारी (उपयोगी) सूक्ष्मजीवों पर केंद्रित है। पाठ्यपुस्तक स्वयं बताती है कि रोगकारक सूक्ष्मजीवों की विस्तृत चर्चा अगले अध्याय में की जाएगी।
प्रश्न: खमीर को जीवाणु माना जाए या कवक?
उत्तर: खमीर एक कवक (फंजाई) है, जीवाणु नहीं। यह अंतर छोटी-छोटी बातों (जैसे केंद्रकाभ वाली संरचना) में जीवाणु से मिलता-जुलता है — यही अंतर पाठ्यपुस्तक में स्पष्ट रूप से समझाया गया है।
अध्याय 3: स्वास्थ्य— एक अमूल्य निधि
पाठ्यपुस्तक इस अध्याय की शुरुआत एक वास्तविक “सूचना पट्ट” (notice board) से करती है जिसमें स्वास्थ्य से जुड़े वास्तविक आंकड़े दिखाए गए हैं।
सूचना पट्ट: स्वास्थ्य से जुड़े वास्तविक आंकड़े
प्रश्न: पाठ्यपुस्तक के अध्याय 3 की शुरुआत में दिए गए “सूचना पट्ट” में स्वास्थ्य से जुड़े कौन-कौन से तथ्य दिए गए हैं?
हल: यह सूचना पट्ट समाचार-पत्र की कतरनों से बना है, जिसमें निम्नलिखित तथ्य शामिल हैं: भारत की 11.4% जनसंख्या मधुमेह (डायअबिटीज़) से ग्रस्त है — आई.सी.एम.आर की रिपोर्ट के अनुसार; 28.6% भारतीय स्थूलकाय (मोटापा) हैं; नियमित रूप से हाथ धोने से संक्रमण 50% तक कम हो जाता है; मानसून के आने पर मलेरिया और डेंगू ज्वर के मामलों में वृद्धि होती है; स्क्रीन को अधिक समय तक देखने से बच्चों में शुष्क नेत्र रोग होता है तथा स्थूलता, निद्रा संबंधी विकार और व्यग्रता बढ़ती है; और सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने से एकाकीपन में वृद्धि होती है। इसके साथ ही “मन, शरीर और आत्मा के लिए योग” और “फिट इंडिया मूवमेंट” जैसे सकारात्मक संदेश भी दिए गए हैं।
3.1 स्वास्थ्य— क्या रोग का नहीं होना ही मात्र स्वास्थ्य है?
प्रश्न: क्या स्वस्थ रहने का अर्थ केवल रोग का नहीं होना ही है?
हल: नहीं। पाठ्यपुस्तक स्पष्ट करती है कि स्वास्थ्य में शारीरिक रूप से अच्छा अनुभव करना, सकारात्मक बने रहना और पारस्परिक संबंधों को दृढ़ बनाए रखना भी सम्मिलित है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपने शरीर की देखभाल करता है, मानसिक दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाए रखता है और सामाजिक जीवन का आनंद लेता है।
क्रियाकलाप 3.1 — एकाकीपन और स्क्रीन टाइम की कहानी
प्रश्न: पाठ्यपुस्तक में दी गई एक कहानी में कक्षा 8 का एक विद्यार्थी नए शहर के नए विद्यालय में प्रवेश लेता है। उसे आगे क्या समस्या होती है, और पाठ्यपुस्तक इससे स्वास्थ्य के बारे में क्या सिखाती है?
हल: कहानी के अनुसार, नए परिवेश में कोई मित्र न होने और माता-पिता के व्यस्त होने के कारण वह विद्यार्थी एकाकीपन का अनुभव करता था। एकाकीपन दूर करने के लिए वह अपना अधिक समय मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर बिताने लगा, परंतु इससे उसका एकाकीपन घटने की बजाय और अधिक बढ़ गया। यह कहानी दर्शाती है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया का उपयोग वास्तव में एकाकीपन (मानसिक स्वास्थ्य) को घटाने की बजाय बढ़ा भी सकता है।
3.2 हम स्वस्थ कैसे रह सकते हैं?
प्रश्न: स्वस्थ रहने के लिए हमें अपनी दिनचर्या में क्या-क्या आदतें अपनानी चाहिए?
हल: पाठ्यपुस्तक में दिखाई गई मुख्य आदतें हैं: पौष्टिक आहार लेना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना, धूम्रपान, मद्यपान और नशीले पदार्थों को “ना” कहना, और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना। क्रियाकलाप 3.2 — आइए, सूची बनाएं में विद्यार्थियों से अपनी दैनिक आदतों की एक सूची बनाने को कहा गया है — जैसे सोने का समय, खाने-पीने की आदतें, शारीरिक गतिविधियों में बिताया गया समय, और स्क्रीन के सामने बिताया गया समय।
संक्रामक रोग: कारक, प्रभावित अंग, लक्षण और बचाव
प्रश्न: खसरा (मीज़ल्स) और क्षय रोग (टीबी) का कारक, प्रभावित अंग, लक्षण और बचाव बताइए।
हल: पाठ्यपुस्तक में दी गई सारणी के अनुसार:
| रोग | कारक | प्रभावित अंग | लक्षण | बचाव |
|---|---|---|---|---|
| खसरा (मीज़ल्स) | विषाणु (virus) | त्वचा, श्वसन तंत्र | ज्वर, गले में खराश, गर्दन-कान-त्वचा पर लाल चकत्ते | रोगी को अलग रखें, मुंह-नाक ढकें, स्वच्छता रखें, टीकाकरण करवाएँ |
| क्षय रोग (टीबी) | जीवाणु (bacteria) | फेफड़े | खाँसी, ज्वर, थकान, भूख न लगना, रात में पसीना | टीबी संक्रमित से निकट संपर्क से बचें, मुंह-नाक ढकें, टीकाकरण |
| यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए | विषाणु (virus) | यकृत (liver) | थकान, ज्वर, भूख न लगना, मतली, वमन, पीलिया, पेट के दाहिने भाग में दर्द | उबला हुआ पानी पिएँ, टीकाकरण करवाएँ |
पाठ्यपुस्तक यह वर्गीकरण भी देती है: खसरा और टीबी संपर्क से फैलने वाले रोग हैं, जबकि यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए जैसे रोग दूषित जल और भोजन से फैलते हैं।
संक्रामक (communicable) और असंक्रामक (non-communicable) रोगों में अंतर
प्रश्न: संक्रामक और असंक्रामक रोगों में क्या अंतर है, और सूचना पट्ट पर दिखाई गई मधुमेह और स्थूलता जैसी समस्याएँ किस श्रेणी में आती हैं?
हल: संक्रामक रोग रोगजनक सूक्ष्मजीवों (जीवाणु, विषाणु) के कारण होते हैं और एक व्यक्ति से दूसरे में फैल सकते हैं, जैसे खसरा, टीबी, हेपेटाइटिस ए; असंक्रामक रोग सूक्ष्मजीवों से नहीं फैलते, जैसे मधुमेह और स्थूलता — ये मुख्यतः जीवनशैली (जैसे आहार में अधिक तेल-चीनी, शारीरिक गतिविधि की कमी) के कारण होते हैं — बिलकुल वैसे ही जैसे सूचना पट्ट पर मधुमेह और फास्टफूड से जुड़े आंकड़े दर्शाए गए हैं।
अध्याय 3: बिंदु से परे एक दृष्टि
अंतिम प्रश्नावली — सभी प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
खंड: सौवां भाग (पृष्ठ 58)
प्र. 1: जोड़ और घटाव करें: (a) 3/10 + 3 4/100 (b) 9 5/10 7/100 + 2 1/10 3/100 (c) 15 6/10 4/100 + 14 3/10 6/100 (d) 7 7/100 − 4 4/100 (e) 8 6/100 − 5 3/100 (f) 12 6/10 2/100 − 9 9/10 9/100
हल:
(a) 0.30 + 3.04 = 3.34
(b) 9.57 + 2.13 = 11.70
(c) 15.64 + 14.36 = 30.00
(d) 7.07 − 4.04 = 3.03
(e) 8.06 − 5.03 = 3.03
(f) 12.62 − 9.99 = 2.63
खंड: दशमलव संख्याओं का जोड़-घटाव (पृष्ठ 75)
प्र. 2 (योग): (a) 5.3+2.6 (b) 18+8.8 (c) 2.15+5.26 (d) 9.01+9.10 (e) 29.19+9.91 (f) 6.236+0.487 (g) 0.75+0.03
हल: (a) 7.9 (b) 26.8 (c) 7.41 (d) 18.11 (e) 39.10 (f) 6.723 (g) 0.78
प्र. 3 (अंतर): (a) 5.6−2.3 (b) 18−8.8 (c) 10.4−4.5 (d) 17−16.198 (e) 17−0.05 (f) 34.505−18.1 (g) 9.9−9.09 (h) 6.236−0.487
हल: (a) 3.3 (b) 9.2 (c) 5.9 (d) 0.802 (e) 16.95 (f) 16.405 (g) 0.81 (h) 5.749
खंड: दशमलव प्रणाली पर और अधिक (पृष्ठ 78-80)
प्र. 4: भिन्नों को दशमलव में बदलें: (a) 5/100 (b) 16/1000 (c) 12/10 (d) 254/1000
हल: (a) 0.05 (b) 0.016 (c) 1.2 (d) 0.254
प्र. 5: दशमलव को दहाई, सैकड़ा, हज़ारवें भाग के योग के रूप में लिखें: (a) 0.34 (b) 1.02 (c) 0.8 (d) 0.362
हल: (a) 0.34 = 3×(1/10) + 4×(1/100)। (b) 1.02 = 1×1 + 0×(1/10) + 2×(1/100)। (c) 0.8 = 8×(1/10)। (d) 0.362 = 3×(1/10) + 6×(1/100) + 2×(1/1000)।
प्र. 6: संख्या रेखा (6.4 से 6.6 के बीच) पर दिखाए गए बिंदुओं a, b, c के दशमलव मान बताएँ।
हल: (यह प्रश्न मूल पाठ्यपुस्तक की संख्या-रेखा आकृति पर पूर्णतः निर्भर करता है — विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग मान दिए गए हैं (जैसे a=6.48/b=6.59/c=6.42 या a=6.45/b=6.55/c=6.525), इसलिए सटीक उत्तर मूल पाठ्यपुस्तक की आकृति से मिलान करके ही दिया जा सकता है।)
प्र. 7: अवरोही क्रम में लिखें: (a) 11.01, 1.011, 1.101, 11.10, 1.01 (b) 2.567, 2.675, 2.768, 2.499, 2.698 (c) 4.678 g, 4.595 g, 4.600 g, 4.656 g, 4.666 g (d) 33.13 m, 33.31 m, 33.133 m, 33.331 m, 33.313 m
हल:
(a) 11.10 > 11.01 > 1.101 > 1.011 > 1.01
(b) 2.768 > 2.698 > 2.675 > 2.567 > 2.499
(c) 4.678g > 4.666g > 4.656g > 4.600g > 4.595g
(d) 33.331m > 33.313m > 33.31m > 33.133m > 33.13m
प्र. 8: अंक 1, 4, 0, 8, 6 का उपयोग कर: (a) 30 के निकटतम दशमलव संख्या बनाएँ (b) 100 और 1000 के बीच सबसे छोटी दशमलव संख्या बनाएँ
हल: (a) 40.168 (30 के सबसे निकट संभावित संयोजन)। (b) 104.68 — सबसे छोटा 3-अंकों का पूर्णांक भाग बनाने के लिए सबसे छोटे अंकों (1,0,4) को क्रम से रखा गया, फिर शेष अंकों (6,8) को बढ़ते क्रम में दशमलव भाग में रखा गया।
प्र. 9: क्या अधिक अंकों वाली दशमलव संख्या हमेशा बड़ी होती है?
हल: नहीं, यह ज़रूरी नहीं। उदाहरण: 0.9 > 0.123456789, क्योंकि तुलना अंकों की संख्या से नहीं बल्कि स्थानीय मान (place value) से होती है — 0.9 के दहाई स्थान पर 9 है जबकि दूसरी संख्या के दहाई स्थान पर केवल 1 है।
प्र. 10: सब्ज़ियों का कुल वज़न ज्ञात करें: सेम 0.25 किग्रा, गाजर 0.3 किग्रा, आलू 0.5 किग्रा, शिमला मिर्च 0.2 किग्रा, अदरक 0.05 किग्रा।
हल: 0.25+0.30+0.50+0.20+0.05 = 1.30 किग्रा।
प्र. 11: पिंटो पहले 3 दिनों में क्रमशः 3.79 L, 4.2 L, 4.25 L दूध सप्लाई करता है। 6 दिनों में कुल 25 L सप्लाई करनी है। अंतिम 3 दिनों में कितना दूध सप्लाई करना होगा?
हल: पहले 3 दिन = 3.79+4.20+4.25 = 12.24 L; अंतिम 3 दिन = 25.00 − 12.24 = 12.76 L।
प्र. 12: टिंकू का वज़न जनवरी में 35.75 किग्रा और फरवरी में 34.50 किग्रा था। वज़न में क्या परिवर्तन हुआ?
हल: 35.75 − 34.50 = 1.25 किग्रा कम हुआ (वज़न घटा)।
प्र. 13: पैटर्न को आगे बढ़ाएँ: 5.5, 6.4, 6.39, 7.29, 7.28, 6.18, 6.17…
हल: (यह एक खोजपूर्ण पैटर्न-आधारित प्रश्न है — विभिन्न स्रोतों में पैटर्न की व्याख्या अलग-अलग है, इसलिए निश्चित संख्यात्मक उत्तर देना उचित नहीं है। सामान्य प्रवृत्ति: क्रम में बारी-बारी +0.9 और −0.01 जैसा प्रतिरूप दिखाई देता है — विद्यार्थियों को स्वयं प्रतिरूप पहचानकर आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।)
प्र. 14: 1 किलोमीटर में कितने मिलीमीटर होते हैं?
हल: 1 किमी = 1000 मीटर = 1000×1000 मिमी = 10,00,000 मिमी (एक मिलियन मिमी)।
प्र. 15: रेलवे बीमा प्रति यात्री 45 पैसे है। यदि 1 लाख लोग इसे लेते हैं, तो कुल राशि कितनी होगी?
हल: 1,00,000 × 45 पैसे = 45,00,000 पैसे = ₹45,000।
प्र. 16: कौन बड़ा है? (a) 10/1000 या 1/10 (b) एक-सौवाँ भाग या 90 हज़ारवाँ भाग (c) एक-हज़ारवाँ भाग या 90 सौवाँ भाग
हल: (a) 1/10 = 0.1, 10/1000 = 0.01, अतः 1/10 बड़ा है। (b) 90 हज़ारवाँ = 0.090, एक-सौवाँ = 0.010, अतः 90 हज़ारवाँ भाग बड़ा है। (c) 90 सौवाँ = 0.90, एक-हज़ारवाँ = 0.001, अतः 90 सौवाँ भाग बड़ा है।
प्र. 17: दशमलव रूप में लिखें: (b) 12 दहाई और 12 दहाई-अंश (tenths) (c) 10 दहाई, 10 इकाई, 10 दहाई-अंश, 10 सौवाँ-अंश (d) 25 दहाई, 25 इकाई, 25 दहाई-अंश, 25 सौवाँ-अंश
हल:
(b) (12×10) + (12×0.1) = 120 + 1.2 = 121.2
(c) (10×10) + (10×1) + (10×0.1) + (10×0.01) = 100+10+1+0.1 = 111.1
(d) (25×10) + (25×1) + (25×0.1) + (25×0.01) = 250+25+2.5+0.25 = 277.75
प्र. 18: 0-9 तक के अंकों का उपयोग करके 10.5 के निकटतम योग प्राप्त करें।
हल: (यह प्रश्न पाठ्यपुस्तक में दिए गए विशिष्ट बॉक्स-प्रारूप पर निर्भर करता है, जो आकृति के बिना स्पष्ट नहीं है। सामान्य रणनीति: दो दशमलव संख्याएँ इस प्रकार बनाएँ कि उनका योग 10.5 के यथासंभव निकट हो, प्रत्येक अंक का उपयोग केवल एक बार करते हुए। एक उदाहरण संभावित हल: 6.92 + 3.58 = 10.50।)
प्र. 19: भिन्नों को दशमलव में बदलें: (a) 1/2 (b) 3/2 (c) 1/4 (d) 3/4 (e) 1/5 (f) 3/5 अथवा 4/5
हल: (a) 0.5 (b) 1.5 (c) 0.25 (d) 0.75 (e) 0.2 (f) 3/5 = 0.6; (यदि प्रश्न 4/5 है तो) 4/5 = 0.8
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: क्या अध्याय 3 में रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों की पूरी जानकारी दी गई है?
उत्तर: अध्याय 3 में पाठ्यपुस्तक खसरा, टीबी और यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए जैसे कुछ प्रमुख रोगों की सारणी देती है (कारक, अंग, लक्षण और बचाव सहित)। अध्याय 2 में पहले बताया जा चुका था कि सूक्ष्मजीवों से फैलने वाली बीमारियों की विस्तृत चर्चा यहीं अध्याय में की जाएगी।
प्रश्न: क्या स्वास्थ्य में मानसिक स्वास्थ्य भी शामिल है?
उत्तर: हां, पाठ्यपुस्तक स्पष्ट रूप से बताती है कि स्वास्थ्य में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य भी शामिल हैं — एकाकीपन, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग इसे प्रभावित कर सकता है।
अध्याय 4: विद्युत — चुंबकीय एवं तापीय प्रभाव
विद्यालय में विज्ञान प्रदर्शनी लगी थी। मोहिनी और आकर्ष अपनी वरिष्ठ विद्यार्थी सुमना द्वारा प्रदर्शित एक प्रदर्श से बहुत आकर्षित हुए — इसमें किसी क्रेन की तरह एक कील के ऊपर तार लपेटकर उसे बैटरी से संयोजित किया गया था। जब सुमना ने परिपथ बंद किया तो कील ने लोहे से बनी कागज़-क्लिपों को चुंबक की भाँति ऊपर उठा लिया, और जैसे ही परिपथ खोला गया, क्लिपें कील से पृथक हो गईं। यहाँ कोई चुंबक नहीं लगा था अपितु एक विद्युत-परिपथ था। इसी रोचक अवलोकन से अध्याय 4 की यात्रा शुरू होती है, जो विद्युत धारा के दो महत्त्वपूर्ण प्रभावों — चुंबकीय प्रभाव और तापीय प्रभाव — तथा बैटरियों के कार्यसिद्धांत की पड़ताल करता है।
4.1 क्या विद्युत धारा का कोई चुंबकीय प्रभाव होता है? — क्रियाकलाप 4.1
प्रश्न: क्रियाकलाप 4.1 में दिक्सूचक (कंपास) की सुई का प्रयोग कर यह किस प्रकार दर्शाया गया है कि विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव होता है?
हल: एक विद्युत-परिपथ (बैटरी, स्विच, तार) बनाकर उसके पास एक दिक्सूचक रखा जाता है। जब स्विच ‘ऑफ’ रहता है तो सुई अपनी सामान्य उत्तर-दक्षिण दिशा में रहती है। जैसे ही स्विच ‘ऑन’ किया जाता है और तार में विद्युत धारा प्रवाहित होती है, दिक्सूचक की सुई अपनी प्रारंभिक दिशा से विक्षेपित (deflect) हो जाती है। स्विच को बार-बार ऑन-ऑफ करने पर यह देखा जाता है कि धारा प्रवाहित होते ही सुई विक्षेपित होती है और धारा रुकते ही वह अपनी मूल दिशा में लौट आती है। कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा के अध्याय ‘चुंबकों को जानें’ से हम जानते हैं कि दिक्सूचक की सुई स्वयं एक छोटा चुंबक होती है, और वह किसी चुंबकीय क्षेत्र में ही विक्षेपित होती है। चूँकि परिपथ के पास कोई चुंबक नहीं है, अतः यह विक्षेपण दर्शाता है कि धारावाही तार के चारों ओर स्वयं एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। इसी को विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहते हैं।
4.1.2 उत्थापक विद्युत-चुंबक (Lifting Electromagnet)
प्रश्न: उत्थापक विद्युत-चुंबक क्या है और इसका औद्योगिक उपयोग कहाँ होता है?
हल: उत्थापक विद्युत-चुंबक प्रबल विद्युत-चुंबक होते हैं जिन्हें क्रेनों से लटकाया जा सकता है। क्रेन-प्रचालक विद्युत-चुंबक में धारा को ऑन और ऑफ करके इसके चुंबकत्व को नियंत्रित कर सकता है — धारा ऑन करने पर विद्युत-चुंबक लोहे या स्टील की वस्तुओं को उठा लेता है, और धारा ऑफ करने पर चुंबकीय क्षेत्र समाप्त हो जाता है जिससे वस्तुएँ मुक्त हो जाती हैं। इनका कारखानों और कचरा (स्क्रैप) स्थलों में धातु की भारी वस्तुओं को कुशलतापूर्वक स्थानांतरित करने, उठाने और छाँटने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। जिस प्रकार धारावाही तार चुंबकत्व उत्पन्न कर सकता है, उसी प्रकार एक गतिमान चुंबक विद्युत धारा भी उत्पन्न कर सकता है — विद्युत और चुंबकत्व के मध्य यह गहन संबंध विद्युत मोटर से लेकर विद्युत जनित्र तक अनेक युक्तियों की निर्मिति का आधार है।
4.2 क्या एक धारावाही तार गरम होता है? — क्रियाकलाप 4.5
प्रश्न: क्रियाकलाप 4.5 में निक्रोम तार के प्रयोग से विद्युत धारा के तापीय प्रभाव को किस प्रकार दर्शाया गया है?
हल: एक परिपथ में निक्रोम तार को बैटरी से जोड़कर लगभग 30 सेकंड के लिए स्विच ‘ऑन’ रखा जाता है और फिर उसे वापस ‘ऑफ’ कर, क्षणभर के लिए निक्रोम तार को (बिना पकड़े) स्पर्श किया जाता है। ऐसा करने पर तार गरम प्रतीत होता है। सुरक्षा हेतु निर्देश दिया जाता है कि किसी भी प्रकार की क्षति से बचने के लिए तार को अधिक समय तक स्पर्श न करें। इस अवलोकन की पुष्टि के लिए चरणों को दोहराने पर भी वही परिणाम मिलता है — जब निक्रोम के तार से धारा प्रवाहित की जाती है तो यह गरम हो जाता है।
प्रश्न: तार के गरम होने का वैज्ञानिक कारण क्या है, और सभी चालक इस दृष्टि से एक-समान क्यों नहीं होते?
हल: जब किसी चालक से विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उसे धारा-प्रवाह में कुछ विरोध अथवा प्रतिरोध (resistance) का सामना करना पड़ता है। भिन्न-भिन्न चालक धारा-प्रवाह में भिन्न-भिन्न स्तरों का प्रतिरोध उत्पन्न करते हैं — उदाहरणार्थ, समान आमाप एवं लंबाई के ताँबे के तार की तुलना में निक्रोम का तार अधिक प्रतिरोध उत्पन्न करता है। इसी प्रतिरोध के कारण विद्युत ऊर्जा का कुछ भाग तापीय ऊर्जा (ऊष्मा) में परिवर्तित हो जाता है, जिससे चालक गरम हो जाता है। इसी को विद्युत धारा का तापीय प्रभाव कहते हैं।
तापीय प्रभाव पर आधारित दैनिक जीवन के उपकरण
प्रश्न: विद्युत धारा के तापीय प्रभाव पर आधारित घरेलू उपकरणों के कुछ उदाहरण दीजिए।
हल: तापीय प्रभाव अनेक दैनिक उपयोग के उपकरणों का आधार है, जैसे — रूम हीटर (कमरा गरम करने वाला यंत्र), विद्युत हॉट प्लेट/स्टोव, इलेक्ट्रिक केतली, विद्युत इस्तरी (प्रेस), जल हीटर/इमर्शन रॉड (पानी गरम करने की छड़), और हेयर ड्रायर। इन सभी उपकरणों में एक उच्च-प्रतिरोध वाले तार (प्रायः निक्रोम) से धारा प्रवाहित कराई जाती है, जिससे उत्पन्न ऊष्मा का उपयोग गरम करने के प्रयोजन हेतु किया जाता है।
4.3 बैटरी से विद्युत धारा कैसे उत्पन्न होती है? — वोल्टीय सेल
प्रश्न: वोल्टीय (गैल्वेनी) सेल की संरचना और कार्यसिद्धांत समझाइए।
हल: वोल्टीय सेल में दो भिन्न-भिन्न धातुओं के इलेक्ट्रोड (इलेक्ट्रोड 1 और इलेक्ट्रोड 2) एक विद्युत-अपघट्य (electrolyte) द्रव से भरे काँच के पात्र में डुबोए जाते हैं। जब इन इलेक्ट्रोडों को संयोजी तार तथा किसी युक्ति (जैसे विद्युत लैंप) से जोड़कर परिपथ पूर्ण किया जाता है, तो इलेक्ट्रोड और विद्युत-अपघट्य के मध्य रासायनिक अभिक्रिया के फलस्वरूप बाह्य परिपथ में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। यही सिद्धांत सर्वप्रथम आविष्कृत वोल्टीय सेलों का आधार था।
प्रश्न: क्रियाकलाप 4.6 में सरलता से उपलब्ध पदार्थों से स्वयं का वोल्टीय सेल किस प्रकार बनाया जा सकता है?
हल: पाँच अथवा छह रसीले नींबू, ताँबे के तार/पट्टियाँ, लोहे की कीलें, एक प्रकाश-उत्सर्जक डायोड (एल.ई.डी.) और कुछ संयोजी तार लेकर प्रत्येक नींबू में एक ताँबे का तार और एक लोहे की कील एक-दूसरे से कुछ दूरी पर लगाई जाती है। फिर एक नींबू के ताँबे के तार को अगले नींबू की लोहे की कील से तार द्वारा जोड़ा जाता है, और यह क्रम शेष सभी नींबुओं के लिए दोहराया जाता है (एक श्रेणी क्रम बनता है)। अंत में पहले नींबू के ताँबे के तार और अंतिम नींबू की लोहे की कील को संयोजी तारों की सहायता से एल.ई.डी. से जोड़ा जाता है। ऐसा करने पर एल.ई.डी. दीप्त हो जाती है (यदि पहली बार दीप्त न हो तो एल.ई.डी. के सिरों को उलट देने पर वह दीप्त हो जाती है), जो सिद्ध करता है कि नींबू में उपस्थित अम्लीय रस विद्युत-अपघट्य की तरह कार्य कर, ताँबे व लोहे के इलेक्ट्रोडों के साथ मिलकर एक क्रियाशील वोल्टीय सेल बनाता है।
4.3.2 शुष्क सेल (Dry Cell)
प्रश्न: शुष्क सेल की संरचना क्या है और इसे ‘शुष्क’ क्यों कहा जाता है?
हल: वोल्टीय सेल दैनिक उपयोग हेतु सुविधाजनक नहीं होते, इसलिए आज शुष्क सेल व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले विद्युत सेलों में से एक हैं। इन्हें ‘शुष्क’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें विद्युत-अपघट्य द्रव रूप में नहीं, बल्कि गाढ़ी नम लेई (paste) के रूप में होता है। शुष्क सेल में एक जस्ते (जिंक) का पात्र होता है जो ऋणात्मक सिरे की भाँति कार्य करता है, और केंद्र में धातु की टोपी से ढकी कार्बन की छड़ धनात्मक सिरे की भाँति कार्य करती है — यह कार्बन छड़ लेई जैसे विद्युत-अपघट्य से घिरी होती है। शुष्क सेल केवल एक बार उपयोग में लाया जाने वाला सेल है, अर्थात एक बार प्रयोग करने के पश्चात इसका निस्तारण करना होता है।
4.3.3 पुनः आवेशनीय बैटरियाँ (Rechargeable Batteries)
प्रश्न: पुनः आवेशनीय बैटरियाँ शुष्क सेल से किस प्रकार भिन्न हैं, और भविष्य में इनकी क्या संभावनाएँ हैं?
हल: पुनः आवेशनीय बैटरियों को अनेक बार पुनः आवेशित (रीचार्ज) करके पुनः उपयोग में लाया जा सकता है, जिससे यह अपव्यय को रोकती हैं और समय के साथ धन की बचत भी करती हैं — इसी कारण अब कई उपकरणों में इनका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान में सर्वाधिक प्रयुक्त पुनः आवेशनीय बैटरी लीथियम-आयन (Li-आयन) बैटरी है, जो लगभग उन सभी युक्तियों में पाई जाती है जिनमें बैटरी लगानी पड़ती है। इन बैटरियों में लीथियम और कोबाल्ट जैसी विशेष धातुएँ उपयोग में लाई जाती हैं, जिनका खनन सीमित क्षेत्रों में ही होता है — इसी कारण विभिन्न देश सुरक्षित आपूर्ति हेतु पुरानी बैटरियों के पुनर्चक्रण और नई प्रौद्योगिकियों को विकसित करने की प्रतिस्पर्धा में लगे हैं। अगली बड़ी छलाँग के रूप में वैज्ञानिक ठोस-अवस्था बैटरियों पर कार्य कर रहे हैं, जिसमें द्रव अथवा लेई जैसे विद्युत-अपघट्य को ठोस पदार्थों से प्रतिस्थापित कर दिया जाएगा — भविष्य की ये बैटरियाँ अधिक सुरक्षित, शीघ्रता से आवेशित होने वाली और लंबे समय तक चलने वाली होंगी।
अध्याय का सार और महत्त्व
अध्याय 4 दर्शाता है कि विद्युत धारा केवल परिपथ में प्रवाहित नहीं होती, बल्कि अपने चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है (विद्युत-चुंबक, क्रेन, विद्युत मोटर की नींव) और प्रतिरोध के कारण ऊष्मा भी उत्पन्न करती है (हीटर, इस्तरी, केतली जैसे उपकरणों की नींव)। साथ ही, बैटरियों और सेलों के कार्यसिद्धांत — वोल्टीय सेल से लेकर शुष्क सेल और आधुनिक पुनः आवेशनीय Li-आयन बैटरी तक — यह समझने में सहायक हैं कि रासायनिक ऊर्जा किस प्रकार विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित होती है।
अध्याय 4: अक्षर-संख्याओं के उपयोगी व्यंजक
अंतिम प्रश्नावली — सभी प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
खंड: सूत्र और व्यंजक (पृष्ठ 84-85)
प्र. 1: परिमाप के सूत्र लिखें: (a) समबाहु त्रिभुज (b) सम पंचभुज (c) सम षट्भुज
हल: (a) यदि भुजा = s, तो परिमाप = 3s। (b) यदि भुजा = p, तो परिमाप = 5p। (c) यदि भुजा = h, तो परिमाप = 6h।
प्र. 2: मुनिरत्न के पास 20 मीटर लंबा पाइप है। वह k मीटर लंबा एक और पाइप जोड़ता है। कुल लंबाई का व्यंजक लिखें।
हल: कुल लंबाई = (20 + k) मीटर।
प्र. 3: कृतिका के पास ₹100, ₹20 और ₹5 के नोटों की कुछ संख्या है — कुल राशि के लिए तालिका पूर्ण करें।
हल: यदि ₹100 के a नोट, ₹20 के b नोट और ₹5 के c नोट हों, तो कुल राशि = 100a + 20b + 5c रुपये।
प्र. 4: वेंकटलक्ष्मी की चक्की को शुरू होने में 10 सेकंड लगते हैं; फिर प्रति किग्रा अनाज पीसने में 8 सेकंड लगते हैं। y किग्रा अनाज पीसने में लगने वाले समय का सही व्यंजक कौन-सा है?
हल: कुल समय = आरंभिक समय + पिसाई समय = 10 + 8y सेकंड।
प्र. 5: व्यंजक लिखें: (a) किसी संख्या से 5 अधिक (b) किसी संख्या से 4 कम (c) किसी संख्या के 13 गुने से 2 कम (d) किसी संख्या के 2 गुने से 13 कम
हल: मान लीजिए संख्या = n। (a) n + 5 (b) n − 4 (c) 13n − 2 (d) 2n − 13
प्र. 6: व्यंजक 8x + 3y और 15j − 2k के अनुरूप वास्तविक स्थितियाँ बताएँ।
हल: (a) 8x+3y: ₹8 प्रति नोटबुक की दर से x नोटबुक और ₹3 प्रति पेन की दर से y पेन खरीदने की कुल लागत। (b) 15j−2k: j लीटर वाले 15 जग जूस में से k लीटर वाली 2 केतली जूस निकाल लेने पर शेष जूस की मात्रा।
प्र. 7: कैलेंडर में किसी भी महीने के 2×3 ग्रिड (दो पंक्ति, तीन स्तंभ) की तारीखों में, यदि नीचे की मध्य कोशिका में तारीख w है, तो शेष कोशिकाओं के लिए व्यंजक लिखें।
हल: चूँकि कैलेंडर में एक स्तंभ का अगला सप्ताह (ऊपर/नीचे) 7 दिन के अंतर पर होता है: नीचे की पंक्ति: w−1, w, w+1; ऊपर की पंक्ति (7 कम): w−8, w−7, w−6।
खंड: पदों को सरल करना (पृष्ठ 93-94)
प्र. 8: चित्रों में दी गई संख्याओं को जोड़ें, उनके व्यंजक लिखें और सरल करें (पंक्तिवार और स्तंभवार दोनों तरीके से जोड़ने पर परिणाम समान आता है, जो जोड़ के क्रमविनिमेय व साहचर्य गुण को दर्शाता है)।
हल: (यह प्रश्न मूल पाठ्यपुस्तक के विशिष्ट चित्रों पर निर्भर करता है — सिद्धांत यह प्रदर्शित करना है कि जोड़ का क्रम बदलने पर भी योग नहीं बदलता।)
प्र. 9: सरल करें: (a) p+p+p+p, p+p+p+q, p+q+p−q (b) p−q+p−q, p+q−p+q (c) p+q−(p+q), p−q−p−q (d) 2d−d−d−d, 2d−d−d−c (e) 2d−d−(d−c), 2d−(d−d)−c (f) 2d−d−c−c
हल:
(a) 4p; 3p+q; 2p
(b) 2p−2q; 2q
(c) 0; −2q
(d) −d; −c
(e) c; 2d−c
(f) d−2c
खंड: वास्तविक स्थितियों में व्यंजक (पृष्ठ 102-105)
प्र. 10: ज्वार रोटी की एक प्लेट ₹30 और पुलाव की एक प्लेट ₹20 की है। यदि एक दिन में x प्लेट रोटी और y प्लेट पुलाव ऑर्डर हुए, तो कुल कमाई का सही व्यंजक चुनें।
हल: सही व्यंजक: 30x + 20y।
प्र. 11: पुष्पिता स्वतंत्रता दिवस पर दो प्रकार के फूल बेचती है: p ग्राहकों ने केवल चंपक, q ने केवल गेंदा और r ने दोनों खरीदे। हर ग्राहक को एक छोटा राष्ट्रीय झंडा दिया गया। कुल कितने झंडे बाँटे गए?
हल: सही व्यंजक: p + q + r (क्योंकि हर ग्राहक — चाहे उसने कुछ भी खरीदा हो — को केवल एक झंडा मिला)।
प्र. 12: एक घोंघा एक गहरे कुएँ की दीवार पर चढ़ने की कोशिश करता है। दिन में वह u सेमी चढ़ता है और रात में d सेमी फिसल जाता है। यह 10 दिन-रात तक चलता है।
(a) घोंघे की आरंभिक स्थिति से दूरी का व्यंजक लिखें।
(b) यदि d > u हो तो क्या होगा?
हल: (a) 10(u − d) सेमी। (b) यदि d > u, तो व्यंजक का मान ऋणात्मक हो जाएगा — अर्थात् घोंघा वास्तव में हर दिन-रात चक्र में शुद्ध रूप से नीचे की ओर खिसक रहा है और वह कभी ऊपर (कुएँ के मुहाने तक) नहीं पहुँच पाएगा।
प्र. 13: राधा साइकिल दौड़ की तैयारी कर रही है। पहले सप्ताह वह प्रतिदिन 5 किमी चलाती है। हर अगले सप्ताह वह प्रतिदिन की दूरी z किमी बढ़ा देती है। 3 सप्ताह बाद उसने कुल कितनी दूरी तय की होगी?
हल: सप्ताह 1: 5×7=35 किमी। सप्ताह 2: (5+z)×7=35+7z। सप्ताह 3: (5+2z)×7=35+14z। कुल = 35+(35+7z)+(35+14z) = 105 + 21z किमी।
प्र. 14: चित्र में दिखाया गया है कि व्यंजक w+2, एक मार्ग पर चलते हुए 4w+20 कैसे बनता है। शेष मार्गों की रिक्त जगहें भरें।
हल: (यह प्रश्न मूल पाठ्यपुस्तक की विशिष्ट फ़्लो-चार्ट आकृति पर निर्भर करता है, जिसमें प्रत्येक चरण पर एक निश्चित संक्रिया (जैसे ×2, +6 आदि) लागू होती है। सिद्धांत: प्रत्येक चरण के परिणाम में पिछले चरण के व्यंजक पर संक्रिया लागू करते हुए सरल करें — जैसे w+2 पर ×2 करने से 2w+4, फिर ×2 करने से 4w+8, फिर +12 करने से 4w+20 प्राप्त हो सकता है, यह मूल आकृति के अनुसार भिन्न हो सकता है।)
प्र. 15: याहापुर से वाहापुर तक एक लोकल ट्रेन बराबर दूरी पर तीन स्टेशनों पर रुकती है। एक स्टेशन से अगले तक जाने में t मिनट लगते हैं, और हर स्टेशन पर 2 मिनट रुकती है।
(a) यदि t=4 हो तो याहापुर से वाहापुर तक कुल समय कितना लगेगा?
(b) सामान्य व्यंजक क्या होगा?
हल: कुल यात्रा में 4 खंड (segments) हैं (आरंभ से स्टेशन1, स्टेशन1 से 2, स्टेशन2 से 3, स्टेशन3 से अंत) और 3 पड़ाव। सामान्य व्यंजक = 4t + 6। (a) t=4 पर: 4(4)+6 = 22 मिनट।
प्र. 16: निम्नलिखित व्यंजकों को सरल करें (छह उप-प्रश्न):
हल: (a) 4a + 5b + 10 (b) a − 13b − 16 (c) 12x + 6 (d) 6x + 15 (e) h + 4 (f) 21m − 20n + 5
प्र. 17: निम्नलिखित व्यंजकों को जोड़ें (छह उप-प्रश्न):
हल: (a) 13d + c − 2 (b) 7f + 4s − 4 (c) 2c − d − 2 (d) −7f − 4s + 3 (e) 0 (f) 0
प्र. 18: निम्नलिखित व्यंजकों को घटाएँ (छह उप-प्रश्न):
हल: (a) −3a + 15b − 32 (b) 18x + 16y − 23 (c) −27g + 10h + 2 (d) −3a − 3b − 32 (e) −13x − 13y + 6 (f) −16g + 3h + 30
प्र. 19: व्यंजक 8x+3y और 15x−2x के अनुरूप स्थितियाँ बताएँ।
हल: (a) 8x+3y: ₹8 प्रति वस्तु की दर से x वस्तुएँ और ₹3 प्रति वस्तु की दर से y वस्तुएँ खरीदने की कुल लागत। (b) 15x−2x=13x: 15 थैलों में प्रत्येक में x सेब हों, उनमें से 2 थैले खराब होकर हटा दिए जाएँ, तो शेष सेबों की संख्या।
प्र. 20: एक सीधी रस्सी को एक बार काटने पर 2 टुकड़े मिलते हैं। एक बार मोड़कर काटने पर 3 टुकड़े मिलते हैं। यदि रस्सी को 10 बार मोड़कर काटा जाए तो कितने टुकड़े मिलेंगे? r बार मोड़ने पर सामान्य व्यंजक क्या होगा?
हल: प्रतिरूप: मोड़ों की संख्या + 2 = टुकड़ों की संख्या। 10 मोड़ों पर = 12 टुकड़े। सामान्य व्यंजक: (r + 2) टुकड़े।
प्र. 21: दी गई माचिस की तीलियों के पैटर्न में 10 वर्ग बनाने के लिए कितनी तीलियाँ चाहिए? w वर्गों के लिए सामान्य व्यंजक क्या होगा?
हल: पहले वर्ग के लिए 4 तीलियाँ, प्रत्येक अगले वर्ग के लिए 3 अतिरिक्त तीलियाँ (एक भुजा साझा होने से): कुल = 4+3(w−1) = 3w+1। 10 वर्गों के लिए: 3(10)+1 = 31 तीलियाँ।
प्र. 22: ट्रैफ़िक सिग्नल में रंगों का क्रम (लाल, पीला, हरा दोहराते हुए) दिया गया है। स्थिति 90, 190 और 343 पर कौन-सा रंग होगा? प्रत्येक रंग की स्थिति के लिए व्यंजक लिखें।
हल: यदि क्रम लाल(1)→पीला(2)→हरा(3)→लाल(4)… इस प्रकार दोहराता है, तो लाल की स्थिति = 3n−2, पीले की स्थिति = 3n−1, हरे की स्थिति = 3n (n=1,2,3…)। जाँच: 90÷3=30 शेष 0 → स्थिति 90, हरे रंग (3n रूप, n=30) से मेल खाती है — हरा। 190: 190=3(63)+1 → 3n−2 रूप (n=64: 3×64−2=190) से मेल खाती है — लाल। 343: 343=3(114)+1 → 3n−2 रूप (n=115: 3×115−2=343) से मेल खाती है — लाल।
प्र. 23: दिए गए वर्ग-पैटर्न में चरण 4, 10 और 50 पर कितने वर्ग होंगे? सामान्य सूत्र लिखें। यदि सभी वर्गों के शीर्ष बिंदुओं (vertices) की संख्या गिननी हो तो सूत्र कैसे बदलेगा?
हल: सामान्य सूत्र: 4n + 1 (जहाँ n = चरण संख्या)। जाँच: n=4 → 4(4)+1=17 वर्ग; n=10 → 4(10)+1=41 वर्ग; n=50 → 4(50)+1=201 वर्ग। शीर्ष बिंदुओं की संख्या (प्रत्येक वर्ग के 4 शीर्ष मानकर, ओवरलैप अनदेखा करते हुए सरल गणना): 4(4n+1) = 16n+4।
प्र. 24: दिए गए 4-स्तंभ वाले ग्रिड में संख्याएँ क्रमिक रूप से भरी गई हैं (पंक्ति r, स्तंभ c)।
(a) प्रत्येक स्तंभ (1,2,3,4) में आने वाली सभी संख्याओं के लिए व्यंजक लिखें।
(b) 124, 147, 201 किस पंक्ति और स्तंभ में आएँगी?
(c) पंक्ति r और स्तंभ c में कौन-सी संख्या आएगी, इसका सामान्य सूत्र लिखें।
(d) 3 के गुणजों की स्थिति में कोई प्रतिरूप दिखता है क्या? अन्य कौन-से प्रतिरूप दिखते हैं?
हल:
(a) स्तंभ 1: 4r−3; स्तंभ 2: 4r−2; स्तंभ 3: 4r−1; स्तंभ 4: 4r (r = पंक्ति संख्या)
(b) 124=4×31 → स्तंभ 4, पंक्ति 31। 147: 4r−1=147⇒r=37 → स्तंभ 3, पंक्ति 37। 201: 4r−3=201⇒r=51 → स्तंभ 1, पंक्ति 51।
(c) सामान्य सूत्र: 4(r−1) + c
(d) 3 के गुणज स्तंभों में एक चक्रीय प्रतिरूप (हर 4 पंक्तियों के बाद दोहराव) में दिखाई देते हैं। अन्य प्रतिरूप: स्तंभ 4 में सभी संख्याएँ 4 के गुणज हैं; स्तंभ 1 और 3 में विषम संख्याएँ हैं; स्तंभ 2 और 4 में सम संख्याएँ हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव की खोज सबसे पहले किस अवलोकन से जुड़ी दर्शाई गई है?
उत्तर: दिक्सूचक (कंपास) की सुई का धारावाही तार के पास विक्षेपित होना और धारा रुकते ही सुई का अपनी मूल दिशा में लौट आना — यह विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव को दर्शाता है (क्रियाकलाप 4.1)।
प्रश्न 2: तार में तापीय प्रभाव उत्पन्न होने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: चालक द्वारा धारा-प्रवाह के मार्ग में उत्पन्न प्रतिरोध, जिसके कारण विद्युत ऊर्जा का एक भाग तापीय ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है — भिन्न-भिन्न चालकों (जैसे ताँबा और निक्रोम) का प्रतिरोध भिन्न-भिन्न होता है।
प्रश्न 3: घर पर नींबू से बैटरी कैसे बनाई जा सकती है?
उत्तर: नींबुओं में ताँबे का तार और लोहे की कील डालकर उन्हें श्रेणी क्रम में तार से जोड़ा जाता है; पहले नींबू के ताँबे के तार और अंतिम नींबू की कील को एल.ई.डी. से जोड़ने पर एल.ई.डी. दीप्त हो जाती है (क्रियाकलाप 4.6)।
प्रश्न 4: शुष्क सेल और पुनः आवेशनीय बैटरी में क्या अंतर है?
उत्तर: शुष्क सेल केवल एक बार उपयोग में लाया जा सकता है और फिर उसका निस्तारण करना पड़ता है, जबकि पुनः आवेशनीय बैटरी (जैसे Li-आयन बैटरी) को बार-बार आवेशित कर पुनः उपयोग में लाया जा सकता है।
अध्याय 5: बलों को जानें
सोनाली और रागिनी की गर्मी की छुट्टियां आरंभ हो गई थीं। अपने गाँव के निकट के भू-दृश्यों की संरचनाओं को देखने निकल पड़ीं सोनाली और रागिनी। तीव्र हवा चलने पर सोनाली ने महसूस किया कि हवा उसे प्रबलता से पीछे की ओर धकेल रहा था, इसीलिए तेज चलने के लिए उन्हें हवा की विपरीत दिशा में साइकिल चलाने के लिए अधिक जोर लगानी पड़ी। पहाड़ी की च्योटी पर चढ़ते समय रास्ते का कुछ भाग ऊबड़-खाबड़ था जहाँ पैडल मारने में कठिनाई हो रही थी जबकि कुछ भाग सपाट थे जहाँ साइकिल सरलता से चल पाती थी। नीचे उतरते समय उन्हें बिना पैडल मारे ही साइकिलें तीव्र गति से चलती महसूस हुईं, मानो कोई उन्हें नीचे की ओर खींच रहा हो। इसी रोचक अनुभव से अध्याय 5 बल (force), इसके प्रकारों और प्रभावों की खोज शुरू करता है।
5.1 बल क्या है? — क्रियाकलाप 5.1
प्रश्न: क्रियाकलाप 5.1 में गत्ते (बड़े डिब्बे) को स्थानांतरित करने के प्रयोग से बल की अवधारणा कैसे बनती है?
हल: एक बड़ा गत्ते का डिब्बा लेकर, उसका स्थान परिवर्तित करने के लिए जितनी भी युक्तियाँ अपनाई जाएँ (चित्रों में लोगों को डिब्बा धकेलते या खींचते दिखाया गया है), उन सभी में डिब्बे को या तो अपकर्षित (खींचकर) किया जाता है या अभिकर्षित (धकेलकर)। सामान्यत: किसी वस्तु पर लगाए गए अपकर्षण या अभिकर्षण को विज्ञान में बल कहा जाता है।
5.2 बल का प्रभाव — क्रियाकलाप 5.2 और तालिका 5.1
प्रश्न: तालिका 5.1 में दिई गई क्रियाओं और उनके प्रभाव के कुछ उदाहरण दीजिए।
हल: रुकती हुई साइकिल को मित्र द्वारा पीछे से पकड़ना (अभिकर्षण) — प्रभाव: साइकिल का रुकना या इसकी चाल का कम होना; गतिशील गेंद को बल्ले से मारना (अपकर्षण) — प्रभाव: गेंद की गति की दिशा में परिवर्तन; एक फूले हुए गुब्बारे को दबाना (अपकर्षण) — प्रभाव: गुब्बारे के आकार में परिवर्तन। इन उदाहरणों से निष्कर्ष: निकालते हैं कि किसी वस्तु पर लगाया गया बल — विरामावस्था में रखी वस्तु को गति प्रदान कर सकता है, पहले से गतिमान वस्तु की चाल परिवर्तित कर सकता है, गति की दिशा परिवर्तित कर सकता है, वस्तु के आकार में परिवर्तन ला सकता है, या इनमें से कुछ या सभी प्रभाव एक साथ उत्पन्न कर सकता है।
5.3 क्या बल दो वस्तुओं के बीच की पारस्परिक क्रिया है?
प्रश्न: मेज को धक्का देने के उदाहरण से यह कैसे स्पष्ट होता है कि बल दो वस्तुओं के बीच की पारस्परिक क्रिया है?
हल: जब आप किसी मेज को धक्का देते हैं तो आपका हाथ एक वस्तु है और दूसरी वस्तु वह मेज है जिस पर आपका हाथ बल लगा रहा है — यहाँ हम कहते हैं कि आपका हाथ और मेज दो वस्तुएं हैं जो एक-दूसरे के साथ परस्पर क्रिया कर रही हैं। जब भी दो वस्तुएँ परस्पर क्रिया करती हैं तो प्रत्येक वस्तु पर दूसरी वस्तु के कारण बल लगता है; जैसे ही यह पारस्परिक क्रिया बंद होती है, वैसे ही उन वस्तुओं पर इस परस्पर क्रिया के कारण लगने वाला बल भी समाप्त हो जाता है।
5.4.1 संपर्क बल और पेशीय बल (मांसपेशीय बल)
प्रश्न: संपर्क बल किसे कहते हैं, और पेशीय बल इसका एक उदाहरण क्यों है?
हल: कई स्थितियों में किसी वस्तु पर बल लगाने के लिए हमारे शरीर और वस्तु के बीच भौतिक संपर्क आवश्यक होता है — यह संपर्क प्रत्यक्ष (हाथों से स्पर्श करके) या अप्रत्यक्ष (छड़ी या रस्सी के माध्यम से) हो सकता है। इस प्रकार के बल जो वस्तुओं के बीच भौतिक संपर्क होने पर ही उत्पन्न होते हैं, संपर्क बल कहलाते हैं। संपर्क बल का एक उदाहरण पेशीय बल है — जब हम चलने, दौड़ने, उठाने, धक्का देने, कूदने या खींचने जैसी कोई भी शारीरिक गतिविधि करते हैं, तो यह बल हमारे शरीर की माँसपेशियों की क्रिया के कारण उत्पन्न होता है, जिसे पेशीय बल कहते हैं। पशु, पक्षी, मछली और कीट गति करने एवं जीवित बने रहने की क्रियाओं हेतु पेशीय बलों का उपयोग करते हैं। मानव लंबे समय से खेती जोतने या सामान ढोने जैसे कार्यों के लिए बैलों और घोड़े-गाड़ी जैसे पशुओं के पेशीय बल का उपयोग करता आया है। पेशीय बल हमारे शरीर के आंतरिक कार्यों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है — यह हमें भोजन चबाने और पाचन प्रक्रिया के दौरान उसे आहारनाल में आगे बढ़ाने में सहायता करता है, और हृदय की माँसपेशियों का संकुचन और शिथिलन हमारे शरीर में रक्त को संचारित करता है।
घर्षण (Friction) — क्रियाकलाप 5.3 और 5.4
प्रश्न: समतल भूमि पर लुड़कती हुई एक गेंद कुछ समय पश्चात स्वयं विरामावस्था में आ जाती है, भले ही उस पर कोई बल लगता हुआ नज़र न आए। यह कैसे संभव है जबकि गति में परिवर्तन के लिए बल आवश्यक होता है?
हल: क्रियाकलाप 5.3 में एक समतल सतह वाली वस्तु (जैसे खाली टिफिन या ज्यामिती बॉक्स) को मेज पर रखकर धक्का देने पर वह कुछ दूरी चलकर स्वयं विरामावस्था में आ जाती है। जब कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु की सतह पर गति करती है या गति करने का प्रयास करती है, तो जो बल उसकी सतह और उसके संपर्क की दूसरी सतह के बीच लगता है, उसे घर्षण बल या घर्षण कहते हैं। घर्षण उस दिशा के विपरीत दिशा में कार्य करता है जिसमें वस्तु गति कर रही हो रही होती है, इसलिए यह एक संपर्क बल होता है। घर्षण दो संपर्क में आने वाली सतहों में अनियमितताओं के कारण उत्पन्न होता है — यहाँ तक कि चिकनी दिखाई देने वाली सतहों में भी बड़ी संख्या में सूक्ष्म अनियमितताएँ होती हैं, जो संपर्क में आने पर एक-दूसरे के पाश में फंस जाती हैं और एक सतह को दूसरी सतह पर फिसलने के किसी भी प्रयास का विरोध करती हैं।
प्रश्न: क्रियाकलाप 5.4 में विभिन्न सतहों पर घर्षण की तुलना करने से क्या निष्कर्ष मिलता है?
हल: क्रियाकलाप 5.3 को उसी वस्तु को काँच, कपड़ा, लकड़ी, सिरेमिक टाइल और रेत जैसी अलग-अलग सतहों पर रखकर दोहराने पर, वस्तु हर सतह पर अलग-अलग दूरी तय करके विरामावस्था में आती है। इससे पता चलता है कि घर्षण बल संपर्क में आने वाली सतहों की प्रकृति पर निर्भर करता है — खुरदरी सतहों के बीच घर्षण अधिक होता है।
5.4.2 असंपर्क बल — चुंबकीय बल (क्रियाकलाप 5.5)
प्रश्न: क्रियाकलाप 5.5 में दो वलय चुंबकों और एक लकड़ी की छड़ी से यह कैसे दर्शाया जाता है कि चुंबक संपर्क में आए बिना भी बल लगा सकता है?
हल: लकड़ी की छड़ी को मेज पर खड़ा कर उस पर एक वलय चुंबक पिरोया जाता है; जब दूसरा वलय चुंबक इस प्रकार फंसाया जाता है कि दोनों के समान ध्रुव एक-दूसरे के सामने हों, तो दूसरा चुंबक पहले चुंबक के ऊपर कुछ दूरी पर ही तैरता रहता है — बिना किसी संपर्क के ही! दूसरे चुंबक को धीरे से नीचे धकेलने पर उस पर लगने वाले बल का स्पष्ट अनुभव होता है। इसी से सिद्ध होता है कि एक चुंबक दूसरे चुंबक पर उसके संपर्क में आए बिना भी बल लगा सकता है, इसीलिए चुंबकीय बल एक असंपर्क बल है।
स्थिरवैद्युत बल — क्रियाकलाप 5.6 और 5.7
प्रश्न: क्रियाकलाप 5.6 में प्लास्टिक मापक को पॉलीथीन से रगड़कर कागड़ के टुकड़ों के निकट लाए जाने पर क्या होता है, और इसका क्या कारण है?
हल: प्लास्टिक मापक या नलिका (स्ट्रॉ) को पॉलीथीन से अच्छी तरह रगड़कर, जब उसे स्पर्श किए बिना कागड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों के निकट लाया जाता है, तो कागड़ के टुकड़े उससे चिपक जाते हैं। एसा इसलिए होता है क्योंकि जब कुछ निश्चित पदार्थों से बनी दो वस्तुओं को आपस में रगड़ा जाता है तो उनकी सतहों पर विद्युत आवेश उत्पन्न होते हैं। इन आवेशों को स्थैतिक आवेश कहा जाता है, और जिस वस्तु पर यह आवेश आ जाता है उसे आवेशित वस्तु कहते हैं। आवेशित वस्तु कागड़ के छोटे टुकड़ों जैसी अनावेशित वस्तुओं को आकर्षित करती है अर्थात उन पर बल लगाती है, और यह बल संपर्क में आए बिना ही लगता है।
प्रश्न: क्रियाकलाप 5.7 में घर्षणक (ऊनी) कपड़े से रगड़े गए दो गुब्बारे एक-दूसरे के निकट लाने पर क्या होता है, और इससे आवेश के प्रकार के बारे में क्या पता चलता है?
हल: दो गुब्बारों को फुलाकर इस प्रकार लटकाया जाता है कि वे एक-दूसरे को स्पर्श न करें; दोनों गुब्बारों को ऊनी कपड़े से रगड़कर छोड़ने पर वे एक-दूसरे से दूर जाते हैं मानो एक-दूसरे को अपकर्षित (प्रतिकर्षित) कर रहे हों। जबकि एक आवेशित गुब्बारा और जिस ऊनी कपड़े से उसे रगड़ा गया था, वह एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। इससे पता चलता है कि स्थैतिक आवेश दो प्रकार के होते हैं — धनात्मक आवेश और ओणात्मक आवेश। समान (एक जैसे) आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं, जबकि विपरीत प्रकार के आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। आवेशित पिंड द्वारा दूसरे आवेशित अथवा अनावेशित पिंड पर लगाया गया बल स्थिरवैद्युत बल कहलाता है — यह भी एक असंपर्क बल है।
गुरुत्वाकर्षण बल — क्रियाकलाप 5.8
प्रश्न: जब किसी गेंद को ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर फेंका जाए, चाहे वह कितने भी बल से ज्यों न फेंका जाए, वह वापस धरती पर ही क्यों गिरती है?
हल: चूँकि सभी वस्तुएँ पृथ्वी की ओर गिरती हैं, इसका अर्थ है कि पृथ्वी उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती है (अपनी ओर खींचती है)। जिस बल से पृथ्वी वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है वह गुरुत्वाकर्षण बल कहलाता है; पृथ्वी द्वारा लगाया गया गुरुत्वाकर्षण बल गुरुत्वीय बल या केवल गुरुत्व भी कहलाता है। चूँकि गुरुत्वीय बल किसी वस्तु के संपर्क में आए बिना उसे आकर्षित करता है, अतः यह एक असंपर्क बल होता है। गुरुत्वीय बल सदैव आकर्षी बल होता है जबकि चुंबकीय या स्थिरवैद्युत बल आकर्षी या प्रतिकर्षी दोनों में से कोई भी हो सकता है। जब किसी वस्तु को ऊंचाई से गिराया जाता है तो वह नीचे की ओर एक ऊर्ध्वाधर सरलरेखीय पथ पर गिरती है; जब उसे ऊर्ध्वाधर: ऊपर की ओर फेंका जाता है तो वह सीधी ऊपर जाती है, उसकी चाल धीमी होती है, तत्पश्चात वह शिखर पर क्षणभर के लिए रुकती है एवं अंतत: वह एक सरलरेखीय पथ पर ऊर्ध्वाधर: नीचे की ओर गिरती है।
5.5 भार और उसका मापन — क्रियाकलाप 5.9
प्रश्न: क्रियाकलाप 5.9 में स्प्रिंग से लटकाए गए अलग-अलग द्रव्यमान की वस्तुओं से यह कैसे पता चलता है कि पृथ्वी सभी वस्तुओं को समान बल से नहीं खींचती?
हल: एक पेंसिल बॉक्स, एक टिफिन बॉक्स और एक छोटा पथ्थर जैसी अलग-अलग द्रव्यमान की वस्तुओं को एक स्प्रिंग के एक सिरे से, जिसका दूसरा सिरा एक कील से टिका हो, एक-एक करके लटकाने पर यह पाया जाता है कि हर वस्तु के लिए स्प्रिंग की लंबाई में वृद्धि अलग-अलग होती है। जब किसी वस्तु को स्प्रिंग से लटकाया जाता है तो पृथ्वी द्वारा उस पर लगाए गए गुरुत्वाकर्षण बल के कारण स्प्रिंग की लंबाई में वृद्धि होती है; अलग-अलग वस्तुओं के लिए यह वृद्धि भिन्न-भिन्न होती है, जिससे पता चलता है कि पृथ्वी अलग-अलग वस्तुओं को अलग-अलग बल से आकर्षित करती है। इसी सिद्धांत का उपयोग कर कमानीदार तुला (स्प्रिंग बैलेंस) वस्तु का भार (बल) मापती है — इसका माप सामान्यत: न्यूटन (N) इकाई में दिया जाता है।
अध्याय का सार और महत्त्व
अध्याय 5 दर्शाता है कि बल अपकर्षण या अभिकर्षण हो सकता है और किसी वस्तु की गति, चाल की दिशा या आकार बदल सकता है। बल दो प्रकार के होते हैं — संपर्क बल (पेशीय बल, घर्षण) और असंपर्क बल (चुंबकीय बल, स्थिरवैद्युत बल, गुरुत्वाकर्षण बल)। घर्षण सतहों की अनियमितताओं से उत्पन्न होता है और गति का विरोध करता है; गुरुत्वाकर्षण बल सदैव आकर्षी होता है और इसी से वस्तुओं का भार न्यूटन में मापा जाता है।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 10 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1: स्तंभ A (बल के प्रकार) को स्तंभ B (उदाहरण) से मिलाइए — पेशीय बल, चुंबकीय बल, घर्षण बल, गुरुत्वीय बल, स्थिरवैद्युत बल।
हल: पेशीय बल → बच्चे का स्कूल बैग उठाना; चुंबकीय बल → दिक्सूचक की सुई का उत्तर दिशा में इंगित करना; घर्षण बल → सीमा-रेखा से पहले क्रिकेट गेंद का रुक जाना; गुरुत्वीय बल → पेड़ से फल का गिरना; स्थिरवैद्युत बल → गुब्बारे का बालों को आकर्षित करना।
प्र. 2: सही/गलत बताइए — (i) गति की चाल या दिशा बदलने के लिए बल आवश्यक है। (ii) घर्षण गति की चाल को बढ़ाता है। (iii) आवेशित वस्तुओं के बीच बल केवल स्पर्श करने पर ही कार्य करता है।
हल: (i) सही — किसी वस्तु की चाल या दिशा में परिवर्तन के लिए बल की आवश्यकता होती है। (ii) गलत — घर्षण गति का विरोध करता है और चाल को घटाता है। (iii) गलत — स्थिरवैद्युत बल आवेशित वस्तुओं के बीच बिना स्पर्श किए, दूरी से भी कार्य कर सकता है।
प्र. 3: ऊन से रगड़े गए दो गुब्बारों को पास लाने पर क्या होगा और क्यों?
हल: दोनों गुब्बारे रगड़ने पर समान (ऋणात्मक) आवेश प्राप्त कर लेते हैं। चूँकि समान आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित (repel) करते हैं, इसलिए दोनों गुब्बारे एक-दूसरे से दूर हट जाते हैं।
प्र. 4: पानी में सिक्का क्यों डूब जाता है जबकि लकड़ी का टुकड़ा तैरता रहता है?
हल: सिक्के पर लगने वाला गुरुत्वीय बल (भार) उत्प्लावन बल से अधिक होता है, इसलिए वह डूब जाता है। लकड़ी के मामले में उत्प्लावन बल उसके भार के बराबर या अधिक होता है, इसलिए वह तैरती रहती है — यह वस्तु के घनत्व पर निर्भर करता है कि वह डूबेगी या तैरेगी।
प्र. 5: ऊपर फेंकी गई गेंद पर ऊपर जाते समय, नीचे आते समय और सबसे ऊँचे बिंदु पर कौन-सा बल कार्य करता है, नाम बताइए।
हल: ऊपर जाते समय — गुरुत्वीय बल नीचे की ओर कार्य करता है, जिससे गेंद की गति धीमी होती है; नीचे आते समय — गुरुत्वीय बल नीचे की ओर कार्य करता है, जिससे गेंद तेज़ होती जाती है; सबसे ऊँचे बिंदु पर — गुरुत्व बल तब भी नीचे की ओर कार्य करता रहता है, जबकि उस क्षण गेंद का वेग शून्य होता है।
प्र. 6: एक झुके हुए तल पर लुढ़कती गेंद को बिंदु A से पहले रोकने या बिंदु A के आगे तक ले जाने के लिए क्या किया जा सकता है?
हल: बिंदु A से पहले रोकने के लिए — बिंदु A से पहले सतह का घर्षण बढ़ाना (जैसे खुरदरी सतह बनाना)। बिंदु A के आगे ले जाने के लिए — सतह को चिकना बनाकर, तेल लगाकर या पॉलिश करके घर्षण घटाना।
प्र. 7: बर्फ या पॉलिश किए फर्श जैसी चिकनी सतहों पर हम कभी-कभी क्यों फिसल जाते हैं?
हल: चिकनी सतहों पर घर्षण लगभग नगण्य होता है और पैर सतह पर पर्याप्त पकड़ (grip) नहीं बना पाते, जिससे हम फिसल जाते हैं।
प्र. 8: क्या असमान (non-uniform) गति में किसी वस्तु पर कोई बल कार्य कर रहा होता है?
हल: हाँ। जिन वस्तुओं की चाल या दिशा बदलती रहती है, उन पर कोई-न-कोई बल (जैसे इंजन का बल, ब्रेक का बल, स्टीयरिंग का बल) अवश्य कार्य कर रहा होता है।
प्र. 9: चंद्रमा पर भार पृथ्वी से भिन्न क्यों होता है? क्या द्रव्यमान (mass) भी घटकर छठा भाग हो जाता है?
हल: चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का लगभग छठा भाग है, इसलिए वहाँ भार भी लगभग छठा भाग रह जाता है। परंतु द्रव्यमान सर्वत्र समान रहता है — द्रव्यमान वस्तु में पदार्थ की मात्रा दर्शाता है, जो स्थान बदलने से नहीं बदलता।
प्र. 10: पानी में डूबी तीन भिन्न वस्तुएँ भिन्न-भिन्न गहराई तक जाती हैं। इनके भारों (W₁, W₂, W₃) की तुलना कीजिए।
हल: सही विकल्प — W₁ > W₂ > W₃, अर्थात जो वस्तु सबसे अधिक गहराई तक डूबती है, वह सबसे भारी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: संतुलित और असंतुलित बल में क्या अंतर है?
उत्तर: जब किसी वस्तु पर लगने वाले सभी बलों का परिणामी प्रभाव शून्य होता है, तो उन्हें संतुलित बल कहते हैं (वस्तु की गति में कोई परिवर्तन नहीं होता); जब परिणामी बल शून्य नहीं होता, तो उन्हें असंतुलित बल कहते हैं (वस्तु की गति या आकार में परिवर्तन होता है)।
प्रश्न 2: घर्षण बल के दो लाभ और दो हानियाँ बताइए।
उत्तर: लाभ — चलने और वस्तुओं को पकड़ने में मदद करता है, वाहनों के ब्रेक को कार्यशील बनाता है। हानि — मशीनों के पुर्जों को घिसता है और ऊर्जा की हानि (ऊष्मा के रूप में) करता है, जिससे मशीन की दक्षता कम होती है।
प्रश्न 3: संपर्क बल और असंपर्क बल में क्या फर्क है?
उत्तर: संपर्क बल (जैसे पेशीय बल, घर्षण) बल लगाने वाली और बल पाने वाली वस्तु के बीच भौतिक संपर्क होने पर ही लगता है; असंपर्क बल (चुंबकीय, स्थिरवैद्युत, गुरुत्वाकर्षण) संपर्क में आए बिना भी कार्य करता है।
प्रश्न 4: भार कैसे मापा जाता है?
उत्तर: भार की माप कमानीदार तुला (स्प्रिंग बैलेंस) से की जाती है, जिसमें वस्तु को लटकाने पर स्प्रिंग की लंबाई में होने वाली वृद्धि पृथ्वी द्वारा लगाए जा रहे गुरुत्वाकर्षण बल के अनुरूप होती है; भार की इकाई न्यूटन (N) है।
अध्याय 6: दाब, पवन, झंझावात एवं चक्रवात
आपने अवश्य देखा होगा कि तेज़ हवा चलने पर पेड़ों की पत्तियां भूमि पर गिरकर हवा में घूमने या उड़ने लगती हैं, और तीव्र हवा में पेड़ भी झुकने या हिलने लगते हैं। मेघा और उसका भाई पवन भी एक बार अपने भ्रमण पर निकले तो उन्होंने अपने कंधों पर बस्ते लटका रखे थे — रास्ते में पवन को अपने बस्ते के कारण कंधों में पीड़ा महसूस हुई जबकि मेघा को वैसी कोई तकलीफ़ नहीं हुई, यद्यपि दोनों के बस्ते वज़न में लगभग बराबर थे। यह अंतर आखिर किस कारण से था? इसी जिज्ञासा से अध्याय 6 दाब (pressure), वायु के दाब, पवन के बनने और झंझावात-चक्रवात जैसी शक्तिशाली प्राकृतिक घटनाओं की खोज आरंभ करता है।
6.1 दाब — मेघा और पवन के बस्ते तथा तालिका 6.1
प्रश्न: मेघा और पवन के बस्तों के उदाहरण (चित्र 6.1) से दाब की अवधारणा कैसे स्पष्ट होती है, और इसका सूत्र क्या है?
हल: यात्रा के दौरान मेघा को बस्ते से पीड़ा नहीं हुई जबकि पवन को हुई, यद्यपि दोनों के बस्ते वज़न में लगभग बराबर थे — कारण था बस्तों की पट्टियों की चौड़ाई का अंतर। पवन के बस्ते की पट्टियां संकरी थीं जबकि मेघा के बस्ते की पट्टियां चौड़ी थीं। संकरी पट्टी वाले बस्ते का भार कम क्षेत्रफल पर कार्य करता है जबकि चौड़ी पट्टी वाले बस्ते का भार अधिक क्षेत्रफल पर फैलकर कार्य करता है, इसीलिए चौड़ी पट्टियां अधिक सुविधाजनक लगती हैं। एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को दाब कहा जाता है: दाब = बल/क्षेत्रफल। दाब का SI मात्रक न्यूटन प्रति मीटर² (N/m²) है जिसे पास्कल (Pa) भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि 2 मीटर² क्षेत्रफल के गत्ते पर 100 न्यूटन का बल लगाया जाए, तो दाब = 100N ÷ 2m² = 50 N/m² होगा।
प्रश्न: तालिका 6.1 में दिए गए क्रियाकलापों में से लोहे की कील ठोकने के उदाहरण से दाब के बारे में क्या पता चलता है?
हल: लोहे की कील को हमेशा उसके नुकीले सिरे की ओर से ठोका जाता है, न कि शीर्ष (कुंद) की ओर से — क्योंकि नुकीला सिरा बहुत कम क्षेत्रफल पर बल लगाता है जिससे वहां दाब बहुत अधिक हो जाता है और कील आसानी से लकड़ी में धंस जाती है। इसी प्रकार चाकू की तीक्ष्ण धार से सेब को काटना अधिक सुविधाजनक होता है, क्योंकि जब बल कम क्षेत्रफल पर लगाया जाता है तो परिणामी दाब अधिक होता है।
6.1.1 द्रव भी दाब डालता है — बाँध और जल की टंकी का उदाहरण
प्रश्न: जल से भरी बोतल के पार्श्व छिद्रों से जल बाहर की ओर बहने के अवलोकन से द्रव के दाब के बारे में क्या निष्कर्ष निकलता है?
हल: जब जल से भरी बोतल में पार्श्व (साइड) में छिद्र किए जाते हैं, तो जल केवल नीचे की ओर से ही नहीं अपितु बगल के छिद्रों से भी बाहर बहता है — यह इंगित करता है कि द्रव केवल पात्र के तल पर ही दाब नहीं डालता, अपितु दीवारों पर भी दाब डालता है; वस्तुतः द्रव सभी दिशाओं में दाब डालता है। इसी कारण बाँध की दीवार का आधार उसके ओर से अधिक चौड़ा बनाया जाता है (चित्र 6.8) — क्योंकि जल का दाब गहराई के साथ बढ़ता है, इसलिए बाँध के तल पर दाब सबसे अधिक होता है, और चौड़ा आधार इस अधिक दाब को सुरक्षित रूप से सहन कर पाता है। इसी सिद्धांत के अनुसार घरों की छतों पर रखी जाने वाली जल की टंकियों को सदैव उंचाई पर रखा जाता है ताकि भूतल पर पर्याप्त दाब से जल प्राप्त हो सके।
6.2 वायु द्वारा आरोपित दाब — क्रियाकलाप 6.3 और 6.4
प्रश्न: क्रियाकलाप 6.3 में तह किए गए चार्ट पत्रक और बिना तह किए चार्ट पत्रक से ढकी कागज की प्लेट (चित्र 6.9) को छड़ द्वारा उठाने में अंतर क्यों आता है?
हल: जब कागज की प्लेट को तह किए गए (मुड़े हुए, कम क्षेत्रफल वाले) चार्ट पत्रक से ढका जाता है, तो उसे छड़ द्वारा उठाने में बिना तह किए (अधिक क्षेत्रफल वाले) पत्रक की तुलना में अधिक बल लगाना पड़ता है। एसा इसलिए होता है क्योंकि ढकने वाले पत्रक का क्षेत्रफल जितना अधिक होता है, वायु द्वारा उस पर उतना ही अधिक दाब आरोपित किया जाता है (क्योंकि वायु प्रत्येक वस्तु पर दाब डालती है) — इसी दाब को हम वायुमंडलीय दाब कहते हैं।
प्रश्न: क्रियाकलाप 6.4 में रबड़ के चूषक (चित्र 6.11) को चिकने पृष्ठ पर दबाने पर वह उससे चिपक क्यों जाता है, और वायुमंडलीय दाब वास्तव में कितना अधिक होता है?
हल: जब रबड़ के चूषक को किसी समतल चिकने पृष्ठ पर दबाया जाता है, तो चूषक और पृष्ठ के बीच की अधिकतम वायु बाहर निकल जाती है जिससे भीतर का दाब कम हो जाता है; चूषक के चारों ओर वायु द्वारा डाले गए दाब के भीतर के कम दाब से अधिक होने के कारण चूषक पृष्ठ से चिपक जाता है। वायुमंडलीय दाब वस्तुतः बहुत अधिक होता है — 15 सेमी × 15 सेमी क्षेत्रफल पर वायु स्तंभ द्वारा लगने वाला बल लगभग 225 किलोग्राम द्रव्यमान (2250 N) के भार के तुल्य होता है, फिर भी हम इसके नीचे नहीं दबते क्योंकि हमारे शरीर के भीतर का दाब भी वायुमंडलीय दाब के लगभग बराबर होता है और यह बाहरी दाब को संतुलित कर देता है।
6.3 पवन का बनना — क्रियाकलाप 6.5
प्रश्न: क्रियाकलाप 6.5 में नलिका से जुड़े दो गुब्बारों (एक फूला हुआ, एक बिना फूला) में हवा किस दिशा में प्रवाहित होती है (चित्र 6.12), और इससे पवन के बनने के बारे में क्या पता चलता है?
हल: जब फूले हुए गुब्बारे और बिना फूले गुब्बारे को एक नलिका से जोड़ा जाता है, तो फूले हुए गुब्बारे से हवा बिना फूले गुब्बारे की ओर प्रवाहित होने लगती है, जिससे दोनों गुब्बारों का आकार लगभग समान हो जाता है — क्योंकि फूले हुए गुब्बारे में वायुदाब बिना फूले गुब्बारे की तुलना में अधिक होता है, और वायु सदैव उच्च दाब वाले क्षेत्र से निम्न दाब वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है। वायु के इसी प्रवाह को पवन (wind) कहते हैं। दिन में स्थल समुद्र की अपेक्षा तेज़ी से गर्म होता है जिससे स्थल के ऊपर की वायु गर्म होकर ऊपर उठती है और वहां निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है; परिणामस्वरूप समुद्र के ओपर के उच्च दाब क्षेत्र से स्थल की ओर वायु प्रवाहित होती है, जिसे समुद्र समीर कहा जाता है। रात में इसका उलटा होने पर स्थल समीर उत्पन्न होती है।
6.4 तीव्रगामी पवन से वायुदाब घट जाता है — क्रियाकलाप 6.6
प्रश्न: क्रियाकलाप 6.6 में दो लटके हुए गुब्बारों के बीच फूँक मारने पर वे पास क्यों आ जाते हैं (चित्र 6.13), और इससे घरों की छतें झंझावात में क्यों उड़ जाती हैं?
हल: जब दो गुब्बारों को पास-पास लटकाकर उनके बीच के संकरे स्थान में तेज़ी से फूँक मारी जाती है, तो गुब्बारे एक-दूसरे की ओर आने का प्रयास करते हैं, अर्थात वे दूर जाने की बजाय पास आ जाते हैं। एसा इसलिए होता है क्योंकि तीव्रगामी वायु के क्षेत्र में वायुदाब घट जाता है, जिससे गुब्बारों के बीच का दाब बाहरी दाब से कम हो जाता है और बाहरी (अधिक) दाब उन्हें भीतर की ओर धकेल देता है। इसी सिद्धांत के कारण जब झंझावात के दौरान तीव्रगामी पवन घरों की छतों के ओपर से गुज़रती है, तो छत के ओपर वायुदाब घर के भीतर के वायुदाब से कम हो जाता है; यदि यह दाब-अंतर अधिक हो जाए तो छतें उड़ सकती हैं (चित्र 6.14 क) — इसीलिए झंझावात के समय घरों के दरवाज़े और खिड़कियां खुली रखना सुरक्षित माना जाता है, ताकि घर के भीतर और बाहर के वायुदाब में अत्यधिक अंतर न बन सके (चित्र 6.14 ख)।
6.5 झंझावात, तड़ितझंझा और तड़ित
प्रश्न: बादलों के भीतर विद्युत आवेश कैसे उत्पन्न होता है, और तड़ित तथा गर्जन किस प्रकार बनते हैं?
हल: जब स्थल तीव्रता से गर्म होता है, तो गर्म व आर्द्र वायु ऊपर उठती है और ठंड़ी होकर बादल बनाती है; इस ऊर्ध्वगामी और अधोगामी तीव्र वायु के बीच होने वाले घर्षण से बादलों में विद्युत आवेश उत्पन्न हो जाता है — हल्के धनावेशित कण (जैसे बर्फ़ के कण) बादल के उपरी भाग में तथा भारी ऋणावेशित बूँदें बादल के निचले भाग में एकत्रित हो जाती हैं। जब यह आवेश पर्याप्त मात्रा में बढ़ जाता है, तो बादल के भीतर, दो बादलों के बीच, अथवा बादल और धरातल के बीच विपरीत आवेशों के मिलने से क्षणदीप्त प्रकाश उत्पन्न होता है जिसे हम तड़ित कहते हैं; तड़ित के कारण आस-पास की वायु तीव्रता से गर्म होकर फैलती है जिससे तीव्र ध्वनि उत्पन्न होती है जिसे हम गर्जन कहते हैं। तड़ित और गर्जन के साथ जब कोई झंझावात आता है तो उसे तड़ित-झंझावात कहा जाता है।
प्रश्न: तड़ित चालक (चित्र 6.18) भवनों की तड़ित से सुरक्षा किस प्रकार करता है, और भारत में तड़ितझंझा को अलग-अलग क्षेत्रों में किन नामों से जाना जाता है?
हल: तड़ित चालक एक धातु की छड़ है जिसे भवन निर्माण के समय दीवारों के सहारे स्थापित किया जाता है — इसका एक नुकीला सिरा भवन के सबसे ऊँचे बिंदु पर रखा जाता है जबकि दूसरा सिरा भूमि में गहराई तक दबाया जाता है, जिससे यह तड़ित के विद्युत आवेशों को सुरक्षित रूप से भूमि में स्थानांतरित करने का सरल मार्ग प्रदान करता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में तड़ितझंझा को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे पश्चिम बंगाल, बिहार एवं झारखंड में इसे ‘कालबैशाखी’ तथा असम में ‘बोर्डोइसिला’ कहा जाता है; यह प्रायः मानसून-पूर्व आती है एवं खरीफ़ फ़सलों को उगाने में सहायक होती है। केरल, कर्नाटक एवं तमिलनाडु में इसे ‘आम्र वर्षा’ कहा जाता है क्योंकि यह आम के पकने में सहायक होती है।
6.6 चक्रवात
प्रश्न: चक्रवात किस प्रकार बनता है, और चक्रवात अक्षि (चित्र 6.19) क्या है?
हल: चक्रवात महासागर के गरम जल के ऊपर बनने वाले बड़े झंझावात होते हैं। जब महासागरीय जल गर्म होता है, तो गर्म और आर्द्र वायु ऊपर उठती है और ठंड़ी होकर जलवाष्प संघनित होकर वर्षा की बूँदें बनाती है, जिससे वायुमंडल में ऊष्मा मुक्त होती है; इस ऊष्मा के कारण से ऊपरी वायु और अधिक गर्म होकर ऊपर उठती रहती है और वहां निम्न दाब का क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। आस-पास के उच्च दाब क्षेत्रों से वायु इस निम्न दाब क्षेत्र की ओर तीव्र गति से आती है, और पृथ्वी के घूर्णन के कारण यह वायु चक्रण करने लगती है — इसी चक्रण की पुनरावृत्ति से चक्रवात अत्यधिक विशाल हो जाता है। एक चक्रवात में सबसे अधिक निम्न दाब का क्षेत्र केंद्र में होता है जिसे चक्रवात अक्षि कहा जाता है; अक्षि वाले क्षेत्र में वायु अपेक्षाकृत शांत होती है जबकि इसके पास वाले क्षेत्र में अत्यंत तीव्र वायु चलती है और भारी वर्षा होती है।
प्रश्न: चक्रवात कितने विनाशकारी हो सकते हैं, और इनसे सुरक्षा के लिए क्या उपाय अपनाए जाते हैं?
हल: चक्रवात अत्यंत विनाशकारी हो सकते हैं — उदाहरण के लिए वर्ष 2020 में आए अम्फ़ान चक्रवात की उच्चतम गति लगभग 270 किमी/घंटा थी। चक्रवात के समय उत्पन्न तीव्र वायु महासागरीय जल को तटों की ओर धकेलती है जिससे 3 से 12 मीटर तक ऊँची जल की दीवार जैसी स्थिति (तूफ़ानी लहर) बन सकती है, जो तटीय क्षेत्रों में बाढ़, फ़सलों की क्षति, पेयजल स्रोतों के प्रदूषण एवं भूस्खलन का कारण बन सकती है। चक्रवात के समय सुरक्षित रहने के लिए भारतीय मौसम विभाग (IMD) द्वारा जारी चेतावनियों से अवगत रहना आवश्यक है; मौसम निगरानी उपग्रह चक्रवात के आगमन की पूर्व सूचना देने में सहायक होते हैं। चक्रवाद-संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को आवश्यक सामग्री सहित आपातकालीन किट अवश्य रखनी चाहिए तथा चेतावनी मिलने पर तुरंत निकटवर्ती चक्रवाद सुरक्षा गृहों में चले जाना चाहिए।
अध्याय का सार और महत्त्व
अध्याय 6 यह दर्शाता है कि दाब (एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाला बल, SI मात्रक N/m² या पास्कल) केवल ठोस वस्तुओं द्वारा ही नहीं अपितु द्रव और वायु द्वारा भी सभी दिशाओं में डाला जाता है। वायुदाब में अंतर के कारण ही पवन प्रवाहित होती है — वायु सदैव उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहती है, और तीव्रगामी वायु के क्षेत्र में वायुदाब घट जाता है (जिससे छतें उड़ सकती हैं)। स्थल के असमान तापन से स्थल व समुद्र समीर तथा झंझावात उत्पन्न होते हैं; बादलों में आवेश पृथक्करण से तड़ित एवं गर्जन बनते हैं, और महासागर के गरम जल के ऊपर बनने वाले तीव्र झंझावात चक्रवात कहलाते हैं जो अत्यंत विनाशकारी हो सकते हैं। इसीलिए वायुदाब, पवन एवं इनसे जुड़ी घटनाओं को समझना मौसम पूर्वानुमान एवं आपदा प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 13 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1(i): वेसल R (जो P व Q से जुड़ा है) में पानी डालने पर, डालना बंद करने के बाद तीनों वेसलों में जल-स्तर कैसा होगा?
हल: तीनों वेसलों में जल-स्तर बराबर हो जाएगा, क्योंकि जुड़े हुए पात्रों में द्रव स्वतः अपना स्तर संतुलित कर लेता है (संचारी नलिकाओं का सिद्धांत)।
प्र. 1(ii): समान रबर सकर को समतल सतह व खुरदरी सतह पर दबाने पर कौन-सा चिपकेगा?
हल: समतल सतह पर लगा सकर M चिपकेगा, क्योंकि निर्वात (vacuum) बन जाता है; खुरदरी सतह पर सकर N नहीं चिपकेगा, क्योंकि हवा अंदर रिस आती है, जिससे निर्वात नहीं बन पाता।
प्र. 1(iii): भूतल पर जल का दाब बढ़ाने के लिए क्या समायोजन आवश्यक है?
हल: टंकी जिस ऊँचाई ‘H’ पर रखी है, उसे बढ़ाना चाहिए, क्योंकि टंकी की ऊँचाई बढ़ने के साथ जल का दाब भी बढ़ता है।
प्र. 1(iv): समान जल-स्तर परंतु भिन्न आधार-चौड़ाई वाले दो पात्रों में दाब व बल की तुलना कीजिए।
हल: दोनों में दाब बराबर है (PA = PB, क्योंकि दाब जल-स्तंभ की ऊँचाई पर निर्भर करता है), परंतु पात्र B का आधार अधिक चौड़ा होने से उस पर लगने वाला कुल बल अधिक होगा (FA < FB)।
प्र. 2: सही/गलत बताइए — (i) वायु उच्च दाब से निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहती है। (ii) द्रव केवल पात्र के तल पर ही दाब डालता है। (iii) चक्रवात की ‘आँख’ में मौसम तूफानी होता है। (iv) आँधी-तूफान के दौरान कार में बैठना सुरक्षित है।
हल: (i) सही; (ii) गलत — द्रव सभी दिशाओं में दाब डालता है; (iii) गलत — चक्रवात की आँख में मौसम शांत होता है; (iv) सही — धातु की कार विद्युत आवेश को अपनी बाहरी सतह के चारों ओर से गुज़ार देती है।
प्र. 3: क्या रेत में लेटा हुआ लड़का खड़े होने की तुलना में अधिक धँसता है?
हल: खड़े होने पर अधिक धँसता है, क्योंकि खड़े होने पर उसका भार एक छोटे क्षेत्रफल पर केंद्रित होता है। लेटने पर भार बड़े क्षेत्रफल पर फैल जाता है, जिससे दाब कम हो जाता है।
प्र. 4: एक हाथी का भार 20,000 न्यूटन है और उसके चार पैरों में प्रत्येक का क्षेत्रफल 0.25 वर्ग मीटर है। हाथी द्वारा ज़मीन पर लगाया गया दाब ज्ञात कीजिए।
हल: कुल क्षेत्रफल = 4 × 0.25 = 1 वर्ग मीटर। दाब = बल / क्षेत्रफल = 20,000 न्यूटन / 1 वर्ग मीटर = 20,000 न्यूटन/वर्ग मीटर।
प्र. 5: दो नावों की तुलना कीजिए — नाव A (आधार क्षेत्रफल 7 वर्ग मीटर, 5 व्यक्ति) और नाव B (आधार क्षेत्रफल 3.5 वर्ग मीटर, 3 व्यक्ति); प्रत्येक व्यक्ति का भार 700 न्यूटन है।
हल: नाव A पर दाब = (5×700)/7 = 3500/7 = 500 न्यूटन/वर्ग मीटर। नाव B पर दाब = (3×700)/3.5 = 2100/3.5 = 600 न्यूटन/वर्ग मीटर। नाव B पर नाव A से 100 न्यूटन/वर्ग मीटर अधिक दाब पड़ेगा।
प्र. 6: यदि वायु और बादल दोनों अच्छे विद्युत चालक होते, तो क्या तड़ित (लाइटनिंग) उत्पन्न होती?
हल: नहीं। यदि वायु और बादल दोनों अच्छे चालक होते, तो आवेश आसानी से गति कर पाता और आवेशों का कोई बड़ा असंतुलन नहीं बनता, जिससे तड़ित उत्पन्न ही नहीं होती।
प्र. 7: दो समान गुब्बारों से जुड़ी बोतल में पानी भरने पर क्या दोनों गुब्बारे समान रूप से फूलेंगे?
हल: हाँ, दोनों गुब्बारे समान रूप से फूलेंगे, क्योंकि दोनों पर बराबर मात्रा में वायु-दाब कार्य कर रहा होता है।
प्र. 8: तूफान (storm) चक्रवात (cyclone) में कैसे परिवर्तित होता है, समझाइए।
हल: समुद्र की सतह से उठने वाली गरम व नम हवा निम्न-दाब क्षेत्र बनाती है। आस-पास की हवा भी गरम होकर ऊपर उठती है, जिससे एक चक्र बन जाता है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण (कोरिऑलिस प्रभाव) यह तंत्र घूमने लगता है और तीव्र होकर चक्रवात का रूप ले लेता है।
प्र. 9: पेड़ दाईं ओर से बाईं ओर झुके हुए दिखते हैं — बताइए A और B में से कौन-सा भूमि है और कौन-सा समुद्र?
हल: A स्थल (भूमि) है और B समुद्र है। गर्मी की दोपहर में भूमि तेज़ी से गरम होकर निम्न-दाब क्षेत्र बनाती है; समुद्र से ठंडी हवा उसकी जगह लेने के लिए बहती है, जिससे समुद्र से स्थल की ओर ‘समुद्री समीर’ (sea breeze) बहती है।
प्र. 10: यह दर्शाने के लिए एक क्रियाकलाप बताइए कि वायु उच्च दाब से निम्न दाब की ओर बहती है।
हल: एक खाली बोतल के भीतर पिचका हुआ गुब्बारा रखकर उसे फुलाने की कोशिश करें — शुरू में यह कठिन होगा। अब बोतल के तल में एक छोटा छिद्र बनाकर पुनः गुब्बारे में हवा फूँकें — अब गुब्बारा आसानी से फूल जाएगा, क्योंकि छिद्र से बोतल के भीतर की उच्च-दाब हवा बाहर निकल पाती है।
प्र. 11: झंझावात (thunderstorm) की परिभाषा दीजिए और उसके बनने की प्रक्रिया समझाइए।
हल: झंझावात एक मौसमी स्थिति है जिसमें गर्जन (thunder), तड़ित (lightning), भारी वर्षा और तेज़ हवाएँ शामिल होती हैं। यह तब बनता है जब ज़मीन गरम होकर नम हवा को तेज़ी से ऊपर उठाती है; ऊपर जाकर यह हवा ठंडी होती है और संघनन (condensation) के दौरान ऊष्मा मुक्त होती है, जिससे हवा और तेज़ी से ऊपर उठती है।
प्र. 12: तड़ित (लाइटनिंग) उत्पन्न होने की प्रक्रिया समझाइए।
हल: तूफान के दौरान बादलों के भीतर तेज़ वायु-धाराएँ ऊपर की ओर तथा जल-बूँदें नीचे की ओर गति करती हैं, जिससे आवेशों का पृथक्करण होता है — बादल के ऊपरी भाग में धनात्मक तथा निचले भाग में ऋणात्मक आवेश एकत्रित हो जाता है। जब इन आवेशों के बीच का अंतर बहुत अधिक हो जाता है, तो ऋणात्मक आवेश अचानक स्थानांतरित होकर तड़ित के रूप में प्रकट होता है।
प्र. 13: होर्डिंग व बैनरों में छिद्र क्यों बनाए जाते हैं?
हल: होर्डिंग व बैनरों में छिद्र इसलिए बनाए जाते हैं ताकि हवा आसानी से उनके पार जा सके। बिना छिद्रों के बैनर एक ठोस दीवार की तरह व्यवहार करता है, जिससे उच्च वायु-दाब के कारण वह फट सकता है या गिर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: तड़ितझंझा और चक्रवाद में क्या अंतर है?
उत्तर: तड़ितझंझा स्थल के ऊपर तीव्र गर्माई और आर्द्रता के कारण अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर बनने वाला झंझावात है जिसमें तड़ित एवं गर्जन होता है, जबकि चक्रवाद महासागर के गरम जल के ऊपर बनने वाला बहुत बड़े आकार का, घूर्णन करता हुआ झंझावात है जो तटीय क्षेत्रों में भारी विनाश ला सकता है।
प्रश्न 2: क्या यह सत्य है कि द्रव केवल पात्र के तल पर ही दाब डालते हैं?
उत्तर: नहीं, यह असत्य है — द्रव पात्र के तल के साथ-साथ उसकी दीवारों पर भी और वस्तुतः सभी दिशाओं में दाब डालते हैं, जैसा कि जल से भरी बोतल के पार्श्व छिद्रों से जल के बाहर बहने के अवलोकन से स्पष्ट होता है।
प्रश्न 3: गर्मियों की दोपहर में समुद्र तट पर पेड़ किस दिशा में झुके हुए दिखाई देते हैं और क्यों?
उत्तर: दिन के समय स्थल समुद्र की अपेक्षा तेज़ी से गर्म होता है, जिससे स्थल के ऊपर निम्न दाब का क्षेत्र बनता है और समुद्र के ओपर के उच्च दाब क्षेत्र से समुद्र समीर प्रवाहित होती है — इसी कारण तट के पेड़ प्रायः समुद्र की दिशा से स्थल की दिशा 5की ओर झुके हुए प्रतीत होते हैं।
प्रश्न 4: प्रदर्शपट्ट (बैनर) और विज्ञापन पट्ट (होर्डिंग्स) में छिद्र क्यों बनाए जाते हैं?
उत्तर: बड़े बैनर या होर्डिंग्स में छिद्र इसलिए बनाए जाते हैं ताकि तेज़ हवा चलने पर वायु इन छिद्रों से होकर आसानी से गुज़र सके; यदि छिद्र न हों तो पूरे पट्ट पर वायु द्वारा एक बड़े क्षेत्रफल पर भारी दाब पड़ता है जिससे पट्ट के उखड़ने या टूटने का खतरा रहता है, जबकि छिद्र होने पर वायु का दाब कम हो जाता है और पट्ट सुरक्षित रहता है।
अध्याय 7: द्रव्य की कणीय प्रकृति
आपने अवश्य देखा होगा कि पत्थरों या रेत का ढेर लगाना संभव होता है परंतु जल जैसे किसी द्रव का ढेर नहीं लगाया जा सकता। इसी तरह जब अंजलि में जल भरा जाता है तो जल उसी आकार का हो जाता है, परंतु अंजलि से छोड़े जाने पर जल बह जाता है और अपना आकार बनाए नहीं रख पाता। नदी या समुद्र के किनारे रेत, कंकड़ और पत्थर एकत्रित करते समय क्या आपने कभी सोचा कि ये कहाँ से आते हैं? अपरदन के कारण पर्वतों की चट्टानें धीरे-धीरे टूटकर छोटे कंकड़ों, पत्थरों और रेत के कणों में बदल जाती हैं। तो क्या ये कण किसी चट्टान की सबसे छोटी इकाई हैं, या इन्हें और भी तोड़ा जा सकता है? इसी जिज्ञासा से अध्याय 7 द्रव्य की कणीय प्रकृति की खोज आरंभ करता है।
7.1 द्रव्य किससे बना होता है? — क्रियाकलाप 7.1
प्रश्न: क्रियाकलाप 7.1 में चॉक को तोड़ते-तोड़ते चूर्ण बनाकर आवर्धक लेंस से देखने पर क्या पता चलता है?
हल: चॉक के एक टुकड़े को तब तक तोड़ा जाता है जब तक हाथों से और तोड़ना कठिन न हो जाए, फिर इन छोटे टुकड़ों को ओखल-मूसल में पीसकर चूर्ण बनाया जाता है (चित्र 7.1)। इस महीन चूर्ण को आवर्धक लेंस से देखने पर भी प्रत्येक दिखाई देने वाला कण चॉक का ही कण होता है — चाहे इसे कितना भी तोड़ा या पीसा जाए, यह किसी और पदार्थ में परिवर्तित नहीं होता। इससे पता चलता है कि द्रव्य अत्यंत सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है जिन्हें घटक कण कहते हैं — ये वे मूल इकाइयाँ हैं जिनसे किसी पदार्थ का निर्माण होता है।
प्रश्न: क्रियाकलाप 7.2 में चीनी को जल में घोलकर स्वाद चखने पर, तथा यह देखने पर कि चीनी “गायब” होकर भी जल मीठा रहता है, इससे घटक कणों के बारे में क्या निष्कर्ष निकलता है?
हल: जब गिलास में जल भरकर उसमें चीनी डाली जाती है और जल को बिना विलोडित किए ऊपरी सतह से चखा जाता है तो जल शुरू में मीठा नहीं लगता, परंतु जल को तब तक विलोडित करने पर जब तक चीनी पूर्णतः घुल न जाए (चित्र 7.2), जल हर जगह से मीठा हो जाता है। चीनी के छोटे-छोटे कण परस्पर पृथक होकर जल के कणों के बीच उपलब्ध स्थानों — जिन्हें अंतराकणीय स्थान कहते हैं — में चले जाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि चीनी का प्रत्येक छोटा दाना भी लाखों घटक कणों से निर्मित होता है।
7.2 द्रव्य की विभिन्न अवस्थाएँ कैसे निर्धारित होती हैं?
प्रश्न: द्रव्य की भौतिक अवस्था (ठोस, द्रव या गैस) किस पर निर्भर करती है?
हल: द्रव्य के घटक कण आपस में अंतराकणीय आकर्षण बल द्वारा जुड़े हुए होते हैं। इन आकर्षण बलों की प्रबलता पदार्थ की प्रकृति एवं कणों के बीच की अंतराकणीय दूरी पर निर्भर करती है — कणों की दूरी में थोड़ी सी भी वृद्धि इन बलों को अत्यधिक कम कर देती है। इन बलों की प्रबलता ही अंततः पदार्थ की भौतिक अवस्था को निर्धारित करती है।
7.2.1 ठोस अवस्था — क्रियाकलाप 7.3
प्रश्न: क्रियाकलाप 7.3 में लोहे की कील, सेंधा नमक, पत्थर, लकड़ी का गुटका, चाबी और ऐलुमिनियम के टुकड़े (चित्र 7.3) को हथौड़े से पीटने पर क्या पता चलता है, और ठोस पदार्थों को गर्म करने पर क्या होता है?
हल: ये सभी वस्तुएँ ठोस हैं और इनकी निश्चित आकृति एवं आयतन होता है, क्योंकि इनमें कण दृढ़ता से संकुलित होते हैं और अंतराकणीय आकर्षण बल अत्यंत प्रबल होते हैं। ये प्रबल आकर्षण बल कणों को उनकी नियत स्थितियों पर रोके रखते हैं (चित्र 7.4 क) — कण केवल अपनी स्थिति पर कंपन कर सकते हैं परंतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति नहीं कर सकते। जब ठोस पदार्थों को गर्म किया जाता है तो कण अधिक तीव्रता से कंपन करते हैं (चित्र 7.4 ख); एक ऐसी स्थिति आती है जब कंपन इतने तीव्र हो जाते हैं कि कण अपना स्थान छोड़ने लगते हैं और ठोस द्रव अवस्था में परिवर्तित हो जाता है (चित्र 7.4 ग) — जिस तापमान पर यह होता है उसे उस ठोस का गलनांक कहते हैं। तालिका 7.1 के अनुसार बर्फ का गलनांक 0°C, यूरिया का 133°C तथा लोहे का 1538°C होता है।
7.2.2 द्रव अवस्था — क्रियाकलाप 7.4
प्रश्न: क्रियाकलाप 7.4 में तीन भिन्न आकृतियों के पात्रों (बोतल, जग, गिलास — चित्र 7.5) में 200 mL जल डालकर बारी-बारी से डालने पर क्या देखा जाता है, और इससे द्रवों की प्रकृति के बारे में क्या पता चलता है?
हल: जल जिस भी पात्र में डाला जाता है वह उसी पात्र की आकृति ग्रहण कर लेता है, परंतु तीनों पात्रों में जल का स्तर सदैव 200 mL पर ही रहता है — आयतन में कोई परिवर्तन नहीं होता। अतः द्रवों की निश्चित आकृति नहीं होती परंतु इनका आयतन निश्चित होता है, क्योंकि द्रव के कण स्वतंत्र रूप से गति करने में सक्षम तो होते हैं परंतु केवल सीमित स्थान के भीतर ही। जल में अँगुली सरलतापूर्वक घुमाई जा सकती है (ठोस के विपरीत) क्योंकि द्रवों में ठोस पदार्थों की अपेक्षा अंतराकणीय आकर्षण बल दुर्बल होते हैं, फिर भी इतने प्रबल होते हैं कि कणों को एक-दूसरे के निकट रखते हैं। द्रव को निरंतर गर्म करने पर वह जिस तापमान पर उबलने लगता है उसे क्वथनांक कहते हैं — इस पर कणों की गति इतनी तीव्र हो जाती है कि अंतराकणीय आकर्षण बल कम हो जाते हैं और कण द्रव अवस्था से मुक्त होकर वाष्प में परिवर्तित हो जाते हैं। यह क्वथन प्रक्रिया द्रव के भीतर भी होती है (बुलबुलों के रूप में), जबकि वाष्पन नामक धीमी प्रक्रिया केवल सतह पर तथा सभी तापमानों पर होती रहती है।
7.2.3 गैसीय अवस्था — क्रियाकलाप 7.5
प्रश्न: क्रियाकलाप 7.5 में अगरबत्ती के धुएँ को गैस जार ‘अ’ से जार ‘ब’ में फैलते हुए देखने से (चित्र 7.7) गैसों की प्रकृति के बारे में क्या निष्कर्ष निकलता है?
हल: जब गैस जार ‘अ’ में धुआँ एकत्रित कर उसे जार ‘ब’ के ऊपर रखकर बीच का काँच का ढक्कन हटाया जाता है, तो धुआँ जार ‘ब’ में उपलब्ध संपूर्ण स्थान को भर देता है — यह दर्शाता है कि गैसों का आयतन निश्चित नहीं होता और वे संपूर्ण उपलब्ध स्थान को घेर लेती हैं। गैसों में कण सभी दिशाओं में स्वतंत्र रूप से गति करते हैं क्योंकि इनमें अंतराकणीय आकर्षण बल नगण्य होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप गैसों की न कोई निश्चित आकृति होती है और न ही निश्चित आयतन। चूँकि द्रव और गैस दोनों ही प्रवाहित होते हैं और इनकी निश्चित आकृति नहीं होती, इन्हें तरल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
7.3 पदार्थ की तीनों अवस्थाओं में अंतराकणीय स्थान किस प्रकार भिन्न होते हैं? — क्रियाकलाप 7.6 और 7.7
प्रश्न: क्रियाकलाप 7.6 में बिना सुई की सिरिंज के प्लंजर को दबाने पर (चित्र 7.9) क्या देखा जाता है, और यह गैसों के अंतराकणीय स्थान के बारे में क्या दर्शाता है?
हल: सिरिंज के प्लंजर को बाहर की ओर पूर्ण विस्तारित स्थिति में खींचकर, खुले सिरे को अँगूठे से बंद कर, प्लंजर को धीरे-धीरे अंदर की ओर दबाने पर सिरिंज के भीतर वायु का आयतन कम हो जाता है। इससे प्रदर्शित होता है कि गैस-कणों की सामान्य अवस्था में उनके बीच बहुत अधिक रिक्त स्थान होता है, और बाहरी दाब लगाकर इस स्थान को कम किया जा सकता है — अर्थात गैसों को सरलता से संपीडित किया जा सकता है, जो ठोस और द्रव में संभव नहीं है।
प्रश्न: क्रियाकलाप 7.7 में चीनी को जल में घोलने पर जलस्तर में होने वाले परिवर्तन (चित्र 7.10) से, तथा इसकी तुलना रेत को जल में डालने से, अंतराकणीय स्थान के बारे में क्या पता चलता है?
हल: जब जल में चीनी घोली जाती है तो प्राप्त विलयन का आयतन जल और चीनी के अलग-अलग आयतनों के योग से थोड़ा कम होता है — यह इंगित करता है कि जल के कणों के बीच कुछ रिक्त स्थान होते हैं जिन्हें घुले हुए चीनी के कण घेर लेते हैं (चित्र 7.11)। इसके विपरीत, रेत जल में नहीं घुलती — रेत के कण जल में डालने पर पात्र में नीचे बैठकर अतिरिक्त स्थान घेर लेते हैं जिससे कुल आयतन में वृद्धि होती है, क्योंकि ठोस पदार्थों के कण प्रबल आकर्षण बल से जुड़े होने के कारण सुसंकुलित होते हैं और उनके बीच के अंतराकणीय स्थान बहुत ही न्यून होते हैं (चित्र 7.12 में तीनों अवस्थाओं के अंतराकणीय स्थान की तुलना दर्शाई गई है)।
विसरण के उदाहरण — पोटैशियम परमैंगनेट एवं अगरबत्ती
प्रश्न: जल में पोटैशियम परमैंगनेट का एक दाना डालने पर गुलाबी रंग की धारियाँ फैलकर संपूर्ण जल को एकसमान बैंगनी रंग का कैसे बना देती हैं (चित्र 7.13), और अगरबत्ती की सुगंध पूरे कक्ष में कैसे फैल जाती है (चित्र 7.14)?
हल: जल के कण पोटैशियम परमैंगनेट के दाने से उसके कणों को खींचते हैं, तत्पश्चात इन कणों से टकराकर उन्हें पूरे द्रव में फैला देते हैं, जिससे कुछ समय पश्चात संपूर्ण जल एकसमान बैंगनी रंग का हो जाता है। इसी प्रकार जब अगरबत्ती को कक्ष के किसी कोने में जलाया जाता है तो प्रारंभ में सुगंध केवल उसके आस-पास ही अनुभव होती है, परंतु शीघ्र ही यह पूरे कक्ष में फैल जाती है — क्योंकि वायु के कण निरंतर गति करते रहते हैं और सुगंध के कणों को कक्ष में सभी दिशाओं में फैला देते हैं। कणों के इस स्वतः मिश्रित होकर फैलने की प्रक्रिया को विसरण कहते हैं, जो द्रव और गैस दोनों अवस्थाओं में होता है परंतु ठोस पदार्थों में नहीं होता क्योंकि उनके कण गति करने के लिए स्वतंत्र नहीं होते।
ऊष्मीय ऊर्जा और भौतिक अवस्था का संबंध
प्रश्न: द्रव्य की भौतिक अवस्था का निर्धारण अंततः किस कारक द्वारा होता है?
हल: कणों के बीच अंतराकणीय आकर्षण बल की प्रबलता उनके बीच की दूरी पर निर्भर करती है, और यह दूरी कणों की ऊष्मीय ऊर्जा पर निर्भर करती है — अतः यह कणों की ऊष्मीय ऊर्जा ही है जो द्रव्य की भौतिक अवस्था को निर्धारित करती है। ठोस अवस्था में कणों की ऊष्मीय ऊर्जा निम्न होती है जिससे वे एक-दूसरे के निकट रहकर प्रबल अंतराकणीय आकर्षण बल का अनुभव करते हैं और केवल लघु कंपनों तक सीमित रहते हैं। गलनांक पर पर्याप्त ऊष्मीय ऊर्जा मिलने से कण अपनी नियत स्थितियों से दूर गति कर सकते हैं जिससे अंतराकणीय दूरी में मामूली वृद्धि होती है और आकर्षण बल इतने कम हो जाते हैं कि पदार्थ द्रव अवस्था में परिवर्तित हो जाता है; गैसीय अवस्था में कणों को इतनी ऊष्मीय ऊर्जा प्राप्त होती है कि आकर्षण बल लगभग पूर्णतः अप्रभावी हो जाते हैं और कण सभी दिशाओं में पूर्णतः स्वतंत्र रूप से गति करने लगते हैं।
अध्याय का सार और महत्त्व
अध्याय 7 यह दर्शाता है कि समस्त द्रव्य अत्यंत सूक्ष्म घटक कणों से मिलकर बना होता है, और ये कण अंतराकणीय आकर्षण बलों द्वारा परस्पर जुड़े रहते हैं। यह आकर्षण बल ठोस में सबसे प्रबल, द्रव में मध्यम तथा गैस में नगण्य होता है — जिसके कारण ठोस की निश्चित आकृति व आयतन, द्रव की निश्चित आयतन परंतु अनिश्चित आकृति, और गैस की न आकृति न आयतन निश्चित होती है। कणों के बीच की अंतराकणीय दूरी और उनकी ऊष्मीय ऊर्जा ही अंततः पदार्थ की भौतिक अवस्था तय करती है, और विसरण की प्रक्रिया से यह सिद्ध होता है कि द्रव व गैस के कण निरंतर गतिशील रहते हैं।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 10 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1: ठोस व द्रव के अवयवी कणों में मुख्य अंतर क्या है — सही विकल्प चुनिए।
हल: ठोस में कण एक-दूसरे से कसकर बंधे (closely packed) रहते हैं और अपने स्थान पर केवल कंपन करते हैं, जबकि द्रव में कण एक-दूसरे के ऊपर से खिसक सकते हैं (move past each other) — यही कारण है कि द्रव प्रवाहित हो सकता है जबकि ठोस नहीं।
प्र. 2: निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत — गलत कथनों को सुधारिए। (i) बर्फ का पिघलकर पानी बनना ठोस से द्रव अवस्था-परिवर्तन है। (ii) पिघलने के दौरान अंतराअणुक आकर्षण बल घटता है। (iii) ठोस का निश्चित आकार व आयतन होता है। (iv) ठोस में प्रबल अंतराअणुक बल व कम रिक्त स्थान होता है। (v) कपूर ठोस से सीधे द्रव में बदल जाता है। (vi) पदार्थ की गंध ऊर्जा-मुक्ति के कारण आती है।
हल: (i) सही। (ii) सही। (iii) सही। (iv) सही। (v) गलत — कपूर ऊर्ध्वपातन (sublimation) द्वारा ठोस से सीधे गैस अवस्था में बदलता है, द्रव में नहीं। (vi) गलत — गंध वाष्पीकृत हुए कणों के नाक तक पहुँचने से आती है, ऊर्जा-मुक्ति से नहीं।
प्र. 3: यदि किसी कुर्सी के सभी अवयवी कण हटा दिए जाएं, तो क्या शेष रहेगा?
हल: कुर्सी का कुछ भी शेष नहीं रहेगा — क्योंकि कोई भी वस्तु अपने अवयवी कणों से मिलकर ही बनी होती है; कणों के हटते ही वस्तु का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
प्र. 4: गैसें आसानी से क्यों मिल जाती हैं, जबकि ठोस नहीं?
हल: गैसों के कण सभी दिशाओं में स्वतंत्र रूप से गति करते हैं और उनके बीच रिक्त स्थान अधिक तथा आकर्षण बल नगण्य होता है, इसलिए वे आसानी से मिल जाती हैं। ठोस में कण कसकर बंधे रहते हैं और प्रबल अंतराअणुक बल के कारण उनकी संरचना दृढ़ बनी रहती है, इसलिए ठोस आसानी से नहीं मिलते।
प्र. 5: मेज़ पर गिरने पर दूध बह जाता है परंतु काँच का गिलास अपना आकार बनाए रखता है — इसका औचित्य बताइए।
हल: दूध (द्रव) के कण ढीले ढंग से बंधे होते हैं और एक-दूसरे पर से खिसक सकते हैं, इसलिए वह बह जाता है। काँच का गिलास (ठोस) के कण कसकर बंधे व स्थिर होते हैं, इसलिए वह अपना निश्चित आकार बनाए रखता है।
प्र. 6: बर्फ के पिघलकर जल-वाष्प में बदलने के दौरान कणों की व्यवस्था में होने वाले परिवर्तन को चित्र द्वारा दर्शाइए।
हल: ठोस (बर्फ) में कण नियमित रूप से कसकर व्यवस्थित रहते हैं; द्रव (जल) बनने पर कण कुछ ढीले व अनियमित रूप से पास-पास रहते हैं परंतु फिर भी संपर्क में रहते हैं; गैस (जल-वाष्प) बनने पर कण एक-दूसरे से बहुत दूर और अव्यवस्थित रूप से तेज़ी से गति करने लगते हैं।
प्र. 7: (i) ऐलुमिनियम फॉइल (ii) ग्लिसरीन (iii) मीथेन गैस में कणों की व्यवस्था दर्शाने वाला चित्र बनाइए।
हल: ऐलुमिनियम फॉइल (ठोस) — कण नियमित व सुव्यवस्थित पैटर्न में कसकर बंधे; ग्लिसरीन (द्रव) — कण अनियमित परंतु पास-पास व्यवस्थित; मीथेन गैस (गैस) — कण अनियमित रूप से एक-दूसरे से दूर-दूर बिखरे हुए।
प्र. 8: जलती हुई मोमबत्ती के चित्र को देखकर मोम (ठोस, द्रव, वाष्प) की विभिन्न अवस्थाओं को कणों की व्यवस्था से मिलाइए।
हल: ठोस मोम — बिना पिघला हुआ मोमबत्ती का भाग; द्रव मोम — बत्ती (wick) के पास पिघला हुआ मोम; वाष्प मोम — ज्वाला (flame) के पास वाष्पीकृत मोम।
प्र. 9: समुद्र का पानी खारा (नमकीन) स्वाद देता है, भले ही उसमें नमक दिखाई न दे — एसा क्यों?
हल: नमक पानी में घुलकर अत्यंत सूक्ष्म कणों (आयनों) के रूप में बिखर जाता है, जो नंगी आँखों से दिखाई नहीं देते, परंतु पूरे पानी में मौजूद रहकर उसे खारा स्वाद देते हैं।
प्र. 10: चावल के दाने और चावल का आटा दोनों पात्र का आकार ले लेते हैं — क्या ये ठोस हैं या द्रव?
हल: दोनों ठोस हैं — इनके अपने-अपने निश्चित आकार व आयतन होते हैं (प्रत्येक दाना/कण स्वयं ठोस है), परंतु छोटे आकार व ढीली व्यवस्था के कारण ये पात्र में डालने पर बहते या फैलते हुए प्रतीत होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: गैसें आसानी से क्यों मिश्रित हो जाती हैं जबकि ठोस पदार्थ नहीं मिलते?
उत्तर: गैसों में कणों के बीच अंतराकणीय आकर्षण बल नगण्य होते हैं और कण सभी दिशाओं में स्वतंत्र रूप से तीव्रता से गति करते हैं, जिससे विभिन्न गैसों के कण सरलता से आपस में विसरित होकर मिश्रित हो जाते हैं। जबकि ठोस पदार्थों में कण प्रबल आकर्षण बल से बंधे होकर केवल अपनी स्थिति पर कंपन कर सकते हैं, इसलिए ठोस पदार्थ आसानी से मिश्रित नहीं होते।
प्रश्न 2: यदि किसी कुर्सी से उसके सभी घटक कण हटा दिए जाएँ तो क्या होगा?
उत्तर: कुर्सी का निर्माण ही उसके घटक कणों से हुआ है, अतः यदि सभी घटक कण हटा दिए जाएँ तो कुर्सी का कुछ भी शेष नहीं बचेगा — क्योंकि द्रव्य स्वयं इन्हीं सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है।
प्रश्न 3: दूध काँच के गिलास से छलककर मेज पर फैल जाता है परंतु गिलास अपनी आकृति बनाए रखता है — इसका क्या कारण है?
उत्तर: दूध एक द्रव है, अतः इसके कण स्वतंत्र रूप से गति कर सकते हैं और यह जिस सतह पर गिरता है उसका आकार ग्रहण कर बहकर फैल जाता है, हालाँकि इसका आयतन नहीं बदलता। काँच का गिलास एक ठोस है जिसमें कण प्रबल अंतराकणीय आकर्षण बल से जुड़े होकर नियत स्थितियों पर रहते हैं, इसलिए इसकी आकृति स्थिर रहती है।
प्रश्न 4: बर्फ के पिघलकर जल बनने और फिर जल के वाष्प में बदलने के दौरान कणों की व्यवस्था में क्या परिवर्तन होता है?
उत्तर: बर्फ (ठोस) में कण दृढ़ता से संकुलित होकर नियत स्थितियों पर केवल कंपन करते हैं; गलनांक पर ऊष्मीय ऊर्जा मिलने से कण अपनी स्थिति से दूर गति करने लगते हैं और अंतराकणीय दूरी बढ़ने से जल (द्रव) बनता है जिसमें कण सीमित स्थान के भीतर स्वतंत्र रूप से गति करते हैं; क्वथनांक पर और अधिक ऊष्मीय ऊर्जा मिलने से आकर्षण बल लगभग समाप्त हो जाते हैं और कण जल वाष्प (गैस) के रूप में सभी दिशाओं में पूर्णतः स्वतंत्र होकर फैल जाते हैं, जिससे अंतराकणीय स्थान अधिकतम हो जाता है।
अध्याय 8: द्रव्य की प्रकृति — तत्व, यौगिक और मिश्रण
अपने चारों ओर देखिए — आप जिन सीढ़ियों का उपयोग करते हैं, जिस वायु में श्वास लेते हैं, आपकी बोतल में जल, आपके खाने के डिब्बे में भोजन, आप जो कपड़े और जूते पहनते हैं, ये सभी द्रव्य के उदाहरण हैं। परंतु क्या ये सभी पदार्थ एक ही प्रकार के हैं? क्या स्टेनलेस स्टील और सोना समान हैं? क्या वायु और शुद्ध जल एक जैसे व्यवहार करते हैं? इसी जिज्ञासा से अध्याय 8 द्रव्य की प्रकृति — तत्वों, यौगिकों और मिश्रणों की खोज आरंभ करता है।
8.1 मिश्रण क्या हैं?
प्रश्न: पोहे और अंकुरित सलाद जैसे व्यंजन बहुत भिन्न लग सकते हैं, फिर भी इनमें एक समानता क्या है?
हल: पोहा और अंकुरित सलाद दोनों ही अनेक सामग्रियों को मिश्रित करके बनाए जाते हैं। जब दो या दो से अधिक पदार्थों को इस प्रकार मिलाया जाता है कि प्रत्येक पदार्थ अपने मूल गुणधर्म बनाए रखे और उन्हें किसी सरल भौतिक विधि (जैसे छानना, चुनना) से पृथक किया जा सके, तो इसे मिश्रण कहते हैं। सामान्य प्रयोग में ‘मिश्रण’ शब्द दो या दो से अधिक घटकों को मिश्रित करने की ओर संकेत करता है — ये घटक स्वयं मिश्रण हो सकते हैं (जैसे पोहा और अंकुरित सलाद) अथवा शुद्ध पदार्थ भी हो सकते हैं (जैसे जल में घुली हुई चीनी या साधारण नमक)।
8.1.1 क्या वायु एक मिश्रण है? — क्रियाकलाप
प्रश्न: कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड का विलयन (चूने का जल) बनाकर उसे कुछ घंटों के लिए खुली पेट्री डिश में छोड़ने पर वह दूधिया क्यों हो जाता है?
हल: जब रंगहीन चूने का जल वायु के संपर्क में आता है तो वह दूधिया हो जाता है, क्योंकि वायु में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड के साथ अभिक्रिया करके कैल्सियम कार्बोनेट (अघुलनशील सूक्ष्म सफेद कण) और जल बनाती है — कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड + कार्बन डाइऑक्साइड → कैल्सियम कार्बोनेट + जल। चूँकि यह क्रियाकलाप वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की उपस्थिति को दर्शाता है, और वायु में इसके अतिरिक्त ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, जलवाष्प तथा धूल कण जैसे अन्य घटक भी विद्यमान रहते हैं, अतः वायु एक समरूप मिश्रण है।
8.1.2 मिश्रण के प्रकार — तालिका 8.1
प्रश्न: मिश्रण अपने घटकों की भौतिक अवस्था के आधार पर किन-किन प्रकार के हो सकते हैं?
हल: तालिका 8.1 के अनुसार मिश्रण कई प्रकार के होते हैं — गैस और गैस का मिश्रण (जैसे वायु, जो समरूप है), गैस और द्रव का मिश्रण (जैसे वातित जल अर्थात सोडा जल, या जल में घुली ऑक्सीजन), ठोस और गैस का मिश्रण (जैसे वायु में उपस्थित धूल कण), द्रव और द्रव का मिश्रण (जैसे जल में ऐसीटिक अम्ल से बना सिरका, अथवा तेल और जल), ठोस और द्रव का मिश्रण (जैसे रेत और जल, या समुद्री जल), तथा ठोस और ठोस का मिश्रण (जैसे बेकिंग सोडा और टार्टरिक अम्ल से बना बेकिंग पाउडर, अथवा मिश्रधातु)। इन सभी उदाहरणों में घटक पदार्थ अपने मूल गुणधर्म बनाए रखते हैं और उन्हें भौतिक विधियों से पृथक किया जा सकता है।
प्रश्न: मिश्रधातु किसे कहते हैं और इसके क्या उदाहरण हैं?
हल: दो या दो से अधिक धातुओं के मिश्रण को मिश्रधातु कहते हैं, जिसका गुणधर्म इसके घटक धातुओं के गुणधर्मों से भिन्न होता है। स्टेनलेस स्टील एक मिश्रधातु है जिसमें लोहा, निकल, क्रोमियम और अल्प मात्रा में कार्बन होता है — ये इतनी एकरूपता से मिश्रित होते हैं कि कोई भी इनके पदार्थों को अलग-अलग नहीं देख सकता। ताँबे (कॉपर) और जस्ते (जिंक) का मिश्रण पीतल है तथा ताँबे (कॉपर) और टिन का मिश्रण काँसा है। प्राचीन भारतीय ग्रंथ जैसे चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, रसरत्नसमुच्चय और रसजलनिधि औषधीय प्रयोजनों के लिए मिश्रधातुओं के उपयोग का उल्लेख करते हैं — उदाहरण के लिए काँसा (काँस्य) ताँबा (ताम्र, 4 भाग) और टिन (वंग, 1 भाग) से बनी एक मिश्रधातु है जिसका उपयोग पाचन को सुधारने और प्रतिरक्षा वर्धन के लिए किया जाता था।
8.3.1 तत्व — जल के विद्युत-अपघटन का क्रियाकलाप
प्रश्न: जल में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर दोनों टर्मिनलों पर एकत्रित गैसों के आयतन और उनकी पहचान के बारे में क्या पता चलता है?
हल: जब जल से भरी परखनलियों को 9V बैटरी के टर्मिनलों पर रखकर 10-15 मिनट तक विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो दोनों टर्मिनलों पर गैस के बुलबुले बनते हुए दिखाई देते हैं, परंतु दोनों परखनलियों में एकत्रित गैसों के आयतन समान नहीं होते — एक परखनली में दूसरे की तुलना में दोगुनी गैस एकत्रित होती है। जलती हुई मोमबत्ती से परीक्षण करने पर पता चलता है कि अधिक आयतन वाली गैस हाइड्रोजन है (जो ‘फट्’ की ध्वनि के साथ जलती है) और कम आयतन वाली गैस ऑक्सीजन है (जो जलती हुई तीली की लौ को तेज कर देती है)। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जल दो भिन्न घटकों — हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बना है। क्रियाकलाप में बने ये दोनों पदार्थ हाइड्रोजन और ऑक्सीजन शुद्ध पदार्थ हैं और इन्हें तत्व कहा जाता है। प्रत्येक तत्व समान कणों से निर्मित होता है जिन्हें परमाणु कहते हैं, और ये कण किसी भी अन्य तत्व के कणों से भिन्न होते हैं। तत्व ऐसे पदार्थ होते हैं जिन्हें और अधिक सरल पदार्थों में विभाजित नहीं किया जा सकता — ये सभी पदार्थों के निर्माण खंड होते हैं। तत्वों के कुछ अन्य उदाहरण सोना, चाँदी, सल्फर और कार्बन हैं।
8.3.2 यौगिक
प्रश्न: जल में उपस्थित हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को भौतिक साधनों द्वारा पृथक क्यों नहीं किया जा सकता, और इससे यौगिक की परिभाषा कैसे बनती है?
हल: जल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के कण एक-दूसरे से इतनी प्रबलता से जुड़े होते हैं कि भौतिक विधियों के उपयोग द्वारा इन्हें पृथक करना सामान्यतः असंभव होता है। अतः जल एक यौगिक है। विभिन्न तत्व एक निश्चित अनुपात में संयोजित होकर पूर्णतया नया पदार्थ बनाते हैं जिसे यौगिक कहते हैं। यौगिक के गुणधर्म उस यौगिक को बनाने वाले तत्वों के गुणधर्मों से पूर्णतः भिन्न हो सकते हैं। मोबाइल फोन के उत्पादन में भी 45 से अधिक विभिन्न तत्व, जैसे ऐलुमिनियम, ताँबा, सिलिकॉन, कोबाल्ट, लीथियम, सोना और चाँदी का उपयोग किया जाता है, जो इसकी स्क्रीन, बैटरी और अन्य घटकों में सम्मिलित हैं।
प्रश्न: चीनी को गरम करने पर वह पहले भूरे रंग की और फिर काली क्यों हो जाती है, तथा परखनली के मुँह के समीप जल की बूँदें कहाँ से आती हैं?
हल: चीनी को गरम करने पर वह विघटित हो जाती है — पहले भूरे रंग की होकर तत्पश्चात जलना आरंभ कर काली हो जाती है। परखनली के खुले सिरे के समीप दिखाई देने वाली जल की छोटी-छोटी बूँदें शुष्क चीनी से ही आती हैं, न कि वायु की जलवाष्प के संघनन से, क्योंकि हम परखनली को गरम कर रहे थे। कार्बन परखनली में शेष रह जाता है, जिसे वाच-ग्लास में निकालकर देखा जा सकता है कि क्या वह कोयले की तरह जलता है। इस प्रकार चीनी गरम करने पर कार्बन और जल में विघटित हो जाती है, जो सिद्ध करता है कि चीनी भी एक यौगिक है जिसके घटक कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तत्व हैं।
लोहा और सल्फर का मिश्रण बनाम यौगिक — क्रियाकलाप
प्रश्न: लोहे के चूर्ण और सल्फर के चूर्ण को मिश्रित करके बनाए गए प्रतिदर्श ‘अ’ पर चुंबक लाने और तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल मिलाने पर क्या देखा जाता है?
हल: प्रतिदर्श ‘अ’ दो तत्वों — लोहे (आयरन) एवं सल्फर का मिश्रण है। इसके घटक अपने गुणधर्म बनाए रखते हैं और उसमें काले और पीले रंग के कण अलग-अलग देखे जा सकते हैं। प्रतिदर्श ‘अ’ के पास चुंबक लाने पर लौह चूर्ण चुंबक की ओर आकर्षित हो जाता है, जिससे सिद्ध होता है कि लोहे और सल्फर को पृथक किया जा सकता है। जब प्रतिदर्श ‘अ’ में तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल मिलाया जाता है, तो उसमें उपस्थित लोहा अम्ल के साथ अभिक्रिया करके आयरन क्लोराइड और हाइड्रोजन गैस बनाता है — यह गैस रंगहीन होती है, इसकी कोई गंध नहीं होती और यह ‘फट्’ की ध्वनि के साथ जलती है।
प्रश्न: लोहे और सल्फर के मिश्रण को धीरे-धीरे गरम करके बनाए गए काले पदार्थ (प्रतिदर्श ‘ब’) में चुंबक और तनु अम्ल से क्या भिन्न परिणाम प्राप्त होते हैं, और इससे क्या निष्कर्ष निकलता है?
हल: प्रतिदर्श ‘अ’ को चीनी मिट्टी के पात्र में तब तक गरम किया जाता है जब तक वह एक काले रंग का पदार्थ (प्रतिदर्श ‘ब’) न बन जाए। प्रतिदर्श ‘ब’ के पास चुंबक लाने पर वह चुंबकीय गुण प्रदर्शित नहीं करता, जिससे पता चलता है कि उसमें अब पृथक लोहा उपस्थित नहीं है। प्रतिदर्श ‘ब’ में तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल मिलाने पर एक भिन्न गैस निकलती है जिसकी गंध सड़े अंडे जैसी होती है (हाइड्रोजन सल्फाइड गैस)। इससे स्पष्ट होता है कि गरम करने पर लोहा और सल्फर आपस में रासायनिक रूप से संयोजित होकर आयरन सल्फाइड नामक एक पूर्णतः नया यौगिक बनाते हैं, जिसके गुणधर्म न तो लोहे से मिलते हैं और न ही सल्फर से — जबकि मिश्रण (प्रतिदर्श ‘अ’) में दोनों घटक अपने मूल गुणधर्म बनाए रखते हुए पृथक-पृथक बने रहते हैं।
दैनिक जीवन में तत्व, यौगिक और मिश्रण के अनुप्रयोग
प्रश्न: तत्वों, यौगिकों और मिश्रणों की समझ वैज्ञानिकों, अभियंताओं और पारंपरिक शिल्पकारों के लिए किस प्रकार उपयोगी सिद्ध होती है?
हल: रसायनज्ञ यह अध्ययन करते हैं कि अनेक तत्व आपस में मिलकर यौगिक कैसे बनाते हैं, जिससे वे बीमारियों से लड़ने के लिए जीवन रक्षक दवाओं और वैक्सीन का आविष्कार कर पाते हैं तथा उर्वरकों के निर्माण में भी सहायता मिलती है। अभियंता और वैज्ञानिक पदार्थ, यौगिकों और मिश्रणों के विषय में अपनी समझ के आधार पर अद्वितीय गुणधर्मों वाले पदार्थों का निर्माण करते हैं — उदाहरण के लिए उन्होंने स्टेनलेस स्टील जैसी मिश्रधातु निर्मित की जो शुद्ध लोहे से भी अधिक सुदृढ़ और टिकाऊ होती है। भवन निर्माण सामग्री के रूप में प्रयुक्त लकड़ी, स्टील और कंक्रीट सभी मिश्रण होते हैं। बिहार और ओडिशा की एक प्राचीन आदिवासी कला ढोकरा में भी विभिन्न धातुओं (जैसे पीतल या काँसे) का उपयोग कर प्रकृति से प्रेरित सुंदर आकृतियाँ बनाई जाती हैं — यह प्रक्रिया मोम से एक साँचा बनाने से आरंभ होकर, मृदा का लेप करने, मोम को पिघलाकर बाहर निकालने और उस खोखले स्थान को पिघले हुए पीतल या काँसे से भरने से पूर्ण होती है।
अध्याय का सार और महत्त्व
अध्याय 8 यह स्पष्ट करता है कि हमारे चारों ओर का द्रव्य मुख्यतः तीन रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है — तत्व, यौगिक और मिश्रण। तत्व वे शुद्ध पदार्थ हैं जिन्हें और सरल पदार्थों में विभाजित नहीं किया जा सकता, यौगिक दो या अधिक तत्वों के निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोजन से बनते हैं और उनके गुणधर्म घटक तत्वों से पूर्णतः भिन्न होते हैं, जबकि मिश्रण में घटक पदार्थ अपने मूल गुणधर्म बनाए रखते हुए भौतिक विधियों से पृथक किए जा सकते हैं। लोहे और सल्फर के प्रयोग से यह प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित होता है कि मिश्रण और यौगिक में मौलिक अंतर होता है, और यह समझ चिकित्सा, निर्माण तथा पारंपरिक शिल्पकला जैसे अनेक क्षेत्रों में व्यावहारिक अनुप्रयोग रखती है।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 12 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1: दो पदार्थ A व B मिलकर पदार्थ C बनाते हैं, जबकि A और B को रासायनिक रूप से और नहीं तोड़ा जा सकता — A, B व C क्रमशः क्या हैं?
हल: A और B तत्व (elements) हैं और C एक यौगिक (compound) है जिसका निश्चित संघटन (fixed composition) होता है।
प्र. 2: कथन: वायु एक मिश्रण है, क्योंकि दो या अधिक पदार्थ बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के मिल जाते हैं — अभिकथन व तर्क दोनों सही हैं क्या?
हल: हाँ, अभिकथन और तर्क दोनों सही हैं, और तर्क अभिकथन की सही व्याख्या करता है — वायु के घटक (नाइट्रोजन, ऑक्सीजन आदि) बिना रासायनिक परिवर्तन के मिश्रित रहते हैं, इसलिए वायु एक मिश्रण है, यौगिक नहीं।
प्र. 3: जल के गुण हाइड्रोजन व ऑक्सीजन से भिन्न क्यों होते हैं, स्पष्ट कीजिए।
हल: जल हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के रासायनिक बंधन (chemical bonding) से बनता है, जिससे पूर्णतः नए गुण उत्पन्न होते हैं — जैसे जल द्रव अवस्था में पाया जाता है, जबकि हाइड्रोजन व ऑक्सीजन दोनों सामान्यतः गैस अवस्था में होते हैं।
प्र. 4: कार्बन डाइऑक्साइड, लोहा, ऑक्सीजन और चीनी को उपयुक्त वर्ग (तत्व/मिश्रण/शुद्ध पदार्थ/असमांगी मिश्रण) में वर्गीकृत कीजिए।
हल: कार्बन डाइऑक्साइड, लोहा, ऑक्सीजन और चीनी — ये सभी शुद्ध पदार्थ (pure substances) हैं (इनमें से लोहा व ऑक्सीजन तत्व हैं, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड व चीनी यौगिक हैं, परंतु चारों ही निश्चित संघटन वाले शुद्ध पदार्थ की श्रेणी में आते हैं)।
प्र. 5: नम वायु में लोहे की अभिक्रिया तथा ऑक्सीजन में मैग्नीशियम के जलने की दो अभिक्रियाओं में शामिल पदार्थों को वर्गीकृत कीजिए।
हल: लोहा व मैग्नीशियम तत्व हैं; इनकी अभिक्रिया से बनने वाले आयरन ऑक्साइड (जंग) व मैग्नीशियम ऑक्साइड यौगिक हैं, जो रासायनिक अभिक्रिया द्वारा नए गुणों के साथ बनते हैं।
प्र. 6: दी गई 19 वस्तुओं को तत्व, यौगिक व मिश्रण में वर्गीकृत करने वाली तालिका पूर्ण कीजिए।
हल: तत्व — एलुमिनियम, सोना, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, गंधक (सल्फर), हाइड्रोजन। यौगिक — जल, ग्लूकोज़, कार्बन डाइऑक्साइड, सोडियम क्लोराइड (नमक), बेकिंग सोडा, मैग्नीशियम ऑक्साइड, जंग (आयरन ऑक्साइड), आयरन सल्फाइड। मिश्रण — रेत, समुद्री जल, कीचड़युक्त पानी, वायु, फलों का रस।
प्र. 7: लोहे के बुरादे व गंधक को गरम करने पर क्या होता है, और यह मूल मिश्रण से किस प्रकार भिन्न है?
हल: गरम करने पर लोहे का बुरादा व गंधक रासायनिक रूप से संयोग कर आयरन सल्फाइड (एक नया यौगिक) बनाते हैं। यह मूल मिश्रण से भिन्न है क्योंकि इसमें नए गुण उत्पन्न होते हैं (जैसे अब यह चुंबक से आकर्षित नहीं होता) और इसे मूल पदार्थों में सरल भौतिक विधि से पृथक नहीं किया जा सकता।
प्र. 8: क्या कोई पदार्थ एक साथ तत्व और यौगिक दोनों हो सकता है?
हल: नहीं — तत्वों में केवल एक ही प्रकार के परमाणु होते हैं, जबकि यौगिकों में दो या अधिक तत्वों के परमाणु रासायनिक रूप से संयोजित होते हैं। ये पदार्थ की दो पृथक श्रेणियाँ हैं, अतः कोई पदार्थ एक साथ दोनों नहीं हो सकता।
प्र. 9: यदि जल एक यौगिक के बजाय मिश्रण होता, तो जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता?
हल: यदि जल मिश्रण होता, तो उसके क्वथनांक/हिमांक जैसे निश्चित गुण नहीं होते और उसका संघटन स्थान-स्थान पर बदलता रहता, जिससे वह पीने के लिए असुरक्षित हो सकता था — क्योंकि तब हाइड्रोजन व ऑक्सीजन का प्राकृतिक व स्थिर संयोजन सुनिश्चित नहीं रहता।
प्र. 10: धातु व अम्ल की अभिक्रिया दर्शाने वाले चित्र में परखनली से निकलने वाली गैस A कौन-सी है?
हल: गैस A हाइड्रोजन है — जस्ता तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से अभिक्रिया कर ज़िंक क्लोराइड व हाइड्रोजन गैस उत्पन्न करता है।
प्र. 11: केवल अधातुओं से बने दो यौगिकों के उदाहरण दीजिए, साथ में उनके उपयोग भी बताइए।
हल: कार्बन डाइऑक्साइड — अग्निशामक यंत्रों (fire extinguishers) व कार्बोनेटेड पेयों में उपयोग होती है। सल्फर डाइऑक्साइड — खाद्य परिरक्षक (food preservative) व कीटाणुनाशक (disinfectant) के रूप में उपयोग होती है।
प्र. 12: सोना खनिज (mineral) व धातु (metal) दोनों की श्रेणी में कैसे आता है, समझाइए।
हल: सोना प्राकृतिक रूप से चट्टानों में खनिज के रूप में पाया जाता है; निष्कर्षण व शुद्धिकरण के पश्चात यह परिष्कृत धातु बन जाता है, जिसका उपयोग आभूषण व इलेक्ट्रॉनिक्स में किया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: तत्व और यौगिक में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: तत्व वह शुद्ध पदार्थ है जो एक ही प्रकार के परमाणुओं से बना होता है और जिसे किसी भी भौतिक या साधारण रासायनिक प्रक्रिया द्वारा सरल पदार्थों में विभाजित नहीं किया जा सकता, जैसे सोना, सल्फर या ऑक्सीजन। यौगिक दो या दो से अधिक तत्वों के एक निश्चित अनुपात में रासायनिक रूप से संयोजित होने से बनता है और उसके गुणधर्म उसके घटक तत्वों से पूर्णतः भिन्न होते हैं, जैसे जल (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बना) या आयरन सल्फाइड (लोहा और सल्फर से बना)।
प्रश्न 2: मिश्रण और यौगिक में क्या अंतर है?
उत्तर: मिश्रण में घटक पदार्थ अपने मूल गुणधर्म बनाए रखते हैं और उन्हें छानने, चुंबक के उपयोग जैसी सरल भौतिक विधियों से पृथक किया जा सकता है, जैसे लोहे और सल्फर का मिश्रण। यौगिक में घटक तत्व रासायनिक रूप से एक निश्चित अनुपात में इतनी प्रबलता से जुड़े होते हैं कि उन्हें भौतिक विधियों से पृथक नहीं किया जा सकता, और नए पदार्थ के गुणधर्म मूल तत्वों से भिन्न होते हैं, जैसे आयरन सल्फाइड।
प्रश्न 3: क्या वायु एक तत्व है, यौगिक है या मिश्रण?
उत्तर: वायु एक मिश्रण है, क्योंकि इसमें नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प और धूल कण जैसे कई भिन्न घटक बिना किसी निश्चित अनुपात के आपस में मिले होते हैं तथा प्रत्येक घटक अपने मूल गुणधर्म बनाए रखता है — जैसा कि चूने के जल के दूधिया होने के क्रियाकलाप से भी सिद्ध होता है।
प्रश्न 4: मिश्रधातु (जैसे स्टेनलेस स्टील या पीतल) को मिश्रण क्यों माना जाता है, यौगिक क्यों नहीं?
उत्तर: मिश्रधातु दो या अधिक धातुओं (या धातु व अधातु) को उपयुक्त अनुपात में मिश्रित करके बनाई जाती है, जिसमें घटक धातुएँ अपनी मौलिक पहचान बनाए रखती हैं और सामान्यतः इन्हें उपयुक्त भौतिक विधियों से पुनः पृथक किया जा सकता है, इसलिए मिश्रधातु को मिश्रण की श्रेणी में रखा जाता है — भले ही यह अत्यंत एकरूप दिखाई दे और इसके गुणधर्म (जैसे स्टेनलेस स्टील की मजबूती और जंगरोधी क्षमता) शुद्ध लोहे से भिन्न व बेहतर हों।
अध्याय 9: विलेयों, विलायकों और विलयनों का अद्भुत संसार
ओ.आर.एस. (ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन) के हर घूँट का स्वाद एक जैसा क्यों होता है, चाहे आप उसे कितना भी सेवन करें? तेल जल में क्यों नहीं घुलता जबकि चीनी और नमक घुल जाते हैं? बर्फ जल पर क्यों तैरती है जबकि चट्टान डूब जाता है? इसी जिज्ञासा से अध्याय 9 विलेयों, विलायकों, विलयनों और घनत्व की खोज आरंभ करता है।
9.1 विलेय, विलायक और विलयन क्या हैं?
प्रश्न: ओ.आर.एस. में चीनी और नमक को जल में मिलाया जाता है, फिर भी हर घूँट का स्वाद एक जैसा क्यों होता है?
हल: जब जल में चीनी और नमक मिलाए जाते हैं तो वे एक एसा मिश्रण बनाते हैं जिसमें घटक पूर्णतया समान रूप से वितरित होते हैं — इसे समरूप मिश्रण कहते हैं। इस कारण घोल का हर घूँट एक सी स्वाद देता है। इसके विपरीत, चॉक के चूर्ण को जल के साथ मिलाने पर वह समरूप मिश्रण नहीं बनाता, क्योंकि चॉक जल में घुलता नहीं है। आम तौर पर घोल में किसी ठोस घटक को विलेय और द्रव घटक को विलायक कहा जाता है। गुलाब जामुन की चाशनी बनाने में अधिक मात्रा में चीनी (ठोस) को जल (द्रव) की थोड़ी-सी मात्रा में घोला जाता है, फिर भी जल को विलायक और चीनी को विलेय माना जाता है, क्योंकि विलायक उस घटक को कहते हैं जो अधिक मात्रा में उपस्थित हो।
9.2 विलायक की एक निश्चित मात्रा विलेय की कितनी मात्रा घोल सकती है? — क्रियाकलाप 9.1
प्रश्न: जब जल में लगातार नमक मिलाया जाए, तो एक समय एसा क्यों आता है जब नमक घुलना बंद कर देता है?
हल: प्रारंभ में नमक जल में पूर्णतया घुलकर विलयन बनाता है, परंतु एक अवस्था ऐसी आती है जब डाला गया नमक अघुलनशील रहकर तली पर बैठ जाता है, क्योंकि जल की नमक घोलने की क्षमता समाप्त हो चुकी होती है। वह विलयन जिसमें दिए गए किसी तापमान पर और अधिक विलेय घोला जा सकता है, असंतृप्त विलयन कहलाता है। जब विलेय घुलना बंद कर देता है और तली पर बैठना आरंभ हो जाता है, तब उस विशिष्ट तापमान पर वह विलयन एक संतृप्त विलयन कहलाता है। किसी विलयन की निश्चित मात्रा में उपस्थित विलेय की मात्रा को उसकी सांद्रता कहते हैं। टेम्प्रचर बढ़ने पर सामान्यतः ठोस पदार्थों की घुलनशीलता बढ़ती है।
9.3 गैसों की विलेयता
प्रश्न: क्या गैसें भी जल में घुलती हैं, और इसका जलीय जीवन से क्या संबंध है?
हल: ऑक्सीजन सहित अनेक गैसें जल में घुलती हैं, परंतु ऑक्सीजन गैस जल में सीमित मात्रा में ही घुलती है। यद्यपि जल में यह अल्प मात्रा में ही विद्यमान होती है, तब भी यही घुली हुई ऑक्सीजन पौधों, मछलियों और अन्य जीवों सहित समस्त जलीय जीवन को बनाए रखती है। जल में गैसों का यह मिश्रण एक समरूप मिश्रण है, क्योंकि गैसें जल में समान रूप से वितरित हो जाती हैं।
9.4 वस्तुएँ जल में तैरती या डूबती क्यों हैं?
प्रश्न: लकड़ी की एक छड़ी और लोहे की एक एकसमान आकार की छड़ी को जल में डालने पर क्या होता है?
हल: लकड़ी की छड़ी जल पर तैरती है जबकि लोहे की छड़ी डूब जाती है, भले ही दोनों का आकार एकसमान हो। इसका कारण घनत्व है — लोहा, लकड़ी से भारी होता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि जो वस्तुएँ किसी द्रव में हल्की होती हैं वे तैरती हैं और जो भारी होती हैं वे डूब जाती हैं, परंतु केवल घनत्व ही यह निर्धारित नहीं करता कि कोई वस्तु किसी विशिष्ट द्रव में तैरेगी या डूबेगी।
9.5 घनत्व क्या है?
प्रश्न: घनत्व को सरल उदाहरणों (भीड़ भरी बस और सघन वन) से कैसे समझा जा सकता है, और इसका वैज्ञानिक सूत्र क्या है?
हल: भीड़ से भरी बस में बहुत से व्यक्ति एक सीमित स्थान में मौजूद होते हैं, यह उच्च घनत्व का उदाहरण है; इसी तरह जहाँ वृक्ष एक-दूसरे के समीप उगते हैं उसे सघन वन कहा जाता है। वैज्ञानिक रूप से, हमने सीखा कि पदार्थ वह होता है जिसका कोई द्रव्यमान होता है और जो स्थान (आयतन) घेरता है। किसी पदार्थ के एकाइ आयतन में विद्यमान द्रव्यमान को घनत्व कहा जाता है (घनत्व = द्रव्यमान/आयतन)।
प्रश्न: घनत्व के SI मात्रक क्या हैं, और इन्हें आपस में कैसे बदला जाता है?
हल: घनत्व का SI मात्रक किलोग्राम प्रति घन मीटर (kg/m³) है। द्रवों के संदर्भ में सुविधा के लिए घनत्व को ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर (g/cm³) या ग्राम प्रति मिलीलीटर (g/mL) में भी व्यक्त किया जाता है। रूपांतरण संबंध है — 1 kg/m³ = 1000 g/cm³। कक्षा के तापमान पर जल के 1 mL का द्रव्यमान लगभग 1 g होता है। उदाहरण के लिए, यदि एलुमिनियम के किसी टुकड़े का द्रव्यमान 27 g है और आयतन 10 cm³ है, तो उसका घनत्व 2.7 g/cm³ होगा। किसी पदार्थ का जल के सापेक्ष घनत्व (आपेक्षिक घनत्व) उस पदार्थ के घनत्व और जल के घनत्व के अनुपात के बराबर होता है, जिसका कोई मात्रक नहीं होता।
9.5.1 घनत्व का निर्धारण कैसे करें? — क्रियाकलाप 9.3 से 9.7
प्रश्न: द्रव्यमान और आयतन को मापने के लिए क्रियाकलापों में कौन से उपकरण उपयोग में लाए गए, और नमूने के रूप में क्या मापा गया?
हल: द्रव्यमान मापने के लिए अंकीय भार तुला (डिजिटल बैलेंस) का उपयोग किया गया — पहले तुला शून्य पर लाई गई, फिर एक पत्थर या सूखी वस्तु (जैसे पत्थर) रखकर उसपर ऊन वस्तु (पत्थर) रखी गई, जिससे तुला ने घ्र्यमान अंकित किया (जैसे 16.400 g)। आयतन मापने के लिए मापक सिलिंडर (मेजरिंग सिलिंडर) का उपयोग हुआ, जो विभिन्न क्षमताओं (5 mL से 250 mL तक) में उपलब्ध होता है। रंगहीन द्रव का पाठ्यांक नवचंद्रक (मेनिस्कस) के निचले बिंदु से आंखों को समतल रखकर पढ़ा जाता है। अनियमित आकार की वस्तु (जैसे पत्थर) का आयतन जल विस्थापन विधि से मापा जाता है — पत्थर को धागे से बाँधकर मापक सिलिंडर में लटकाने पर जलस्तर जितना ऊपर चढ़ता है, वही पत्थर का आयतन है। नियमित आकार की घनाभ 0वाकृतियों का आयतन लंबाई × चौड़ाई × ऊंचाई सूत्र से प्राप्त किया जाता है, जैसे 25 cm × 18 cm × 2 cm की एक नोटबुक का आयतन 900 cm³।
पृथ्वी की परतों में घनत्व का बदलाव
प्रश्न: पृथ्वी की विभिन्न परतों (भू-पर्पटी से आंतरिक क्रोड तक) में घनत्व किस प्रकार बदलता है?
हल: पृथ्वी भू-पर्पटी, ऊपरी प्रावार, अधः प्रावार, बाहरी क्रोड और आंतरिक क्रोड जैसी अनेक परतों से बनी है, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट घनत्व है। सबसे बाह्य परत भू-पर्पटी कहलाती है और यह सबसे हल्की होती है। जैसे-जैसे हम केंद्र की ओर बढ़ते हैं वैसे-वैसे विभिन्न परतों के घनत्व में वृद्धि होती जाती है, क्योंकि गहराई में जाने पर दाब और तापमान दोनों बढ़ते हैं। बाँस से बनी चाटी (राफ्ट) का उपयोग प्राचीन समय में नदियों और समुद्रों की यात्रा के लिए होता था, क्योंकि बाँस हल्का और खोखला होता है और जल पर सरलतापूर्वक तैरता है।
9.5.2 घनत्व पर तापमान और दाब का प्रभाव — बर्फ पानी पर क्यों तैरती है?
प्रश्न: जल को गरम या ठंडा करने पर उसके घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है, और बर्फ पानी पर क्यों तैरती है?
हल: सामान्यतः किसी पदार्थ को गरम करने पर उसके घनत्व में कमी आती है और ठंडा करने पर उसमें वृद्धि होती है। परंतु जल का विशेष गुणधर्म यह है कि इसका घनत्व 4°C पर सबसे अधिक होता है। जैसे-जैसे तापमान और कम होता है वैसे-वैसे जल 0°C पर बर्फ में परिवर्तित हो जाता है, जिसकी संरचना में परिवर्तन होने से जल के कण अधिक स्थान घेरते हैं (विस्तारण)। समान मात्रा का जल अब अधिक आयतन घेरता है, इसलिए उसका घनत्व घट जाता है। परिणामस्वरूप द्रवित जल की अपेक्षा बर्फ हल्की होती है और सतह पर तैरने लगती है। यह झीलों और महासागरों में रहने वाले जीवों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बर्फ सतह पर एक परत बनाती है जिससे नीचे का जल थोड़ा गरम रहता है और मछलियाँ अत्यधिक ठंड में भी जीवित रह पाती हैं।
प्रश्न: घनत्व पर दाब का क्या प्रभाव पड़ता है?
हल: गैसीय अवस्था में दाब बढ़ने से कण एक-दूसरे के निकट आ जाते हैं, जिससे आयतन घटता है और घनत्व बढ़ जाता है। द्रवों में दाब का प्रभाव कम होता है क्योंकि वे लगभग असंपीड्य होते हैं, और ठोस पदार्थ द्रवों की अपेक्षा दाब से कम प्रभावित होते हैं और उनके घनत्व में परिवर्तन सामान्यतः नगण्य होते हैं।
बर्फ जल पर क्यों तैरती है?
प्रश्न: बर्फ जल से हल्की क्यों होती है, जबकि दोनों एक ही पदार्थ (H₂O) से बने हैं?
हल: जल का घनत्व 4°C पर सबसे अधिक होता है। जैसे-जैसे तापमान 4°C से नीचे जाकर 0°C तक पहुंचता है, जल के कण स्वयं को इस प्रकार व्यवस्थित कर लेते हैं कि वे अधिक स्थान घेरते हैं — परिणामस्वरूप समान मात्रा का जल अब अधिक आयतन घेरता है और उसका घनत्व घट जाता है। परिणामस्वरूप द्रवित जल की अपेक्षा बर्फ हल्की होती है और सतह पर तैरने लगती है। झीलों और महासागरों में जब सतह पर बर्फ जम जाती है, तो वह एक परत बनाती है जो नीचे के जल को ठंड से बचाती है, जिससे अत्यधिक ठंडे मौसम में भी जलीय जीव जीवित रह पाते हैं।
अध्याय का सार और महत्त्व
अध्याय 9 यह समझाता है कि जब दो या अधिक पदार्थ मिलकर एक समरूप मिश्रण बनाते हैं तो उसे विलयन कहते हैं, जिसमें अधिक मात्रा वाला घटक विलायक और कम मात्रा वाला घटक विलेय कहलाता है। आगे वे किसी विलयन में घुल सकता है या नहीं, यह संतृप्त/असंतृप्त विलयन, तापमान और घुलनशीलता पर निर्भर करता है। कोई वस्तु जल में तैरेगी या डूबेगी, यह उसके घनत्व (द्रव्यमान और आयतन का अनुपात) पर निर्भर करता है। घनत्व तापमान और दाब से भी प्रभावित होता है, और जल का 4°C पर अधिकतम घनत्व होना ही वह कारण है जिससे बर्फ जल पर तैरती है और जलीय जीवन ठंडे मौसम में भी सुरक्षित रहता है।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 12 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1: सही/गलत बताइए — (i) ऑक्सीजन गैस गरम पानी में अधिक घुलनशील होती है। (ii) रेत व पानी का मिश्रण एक विलयन है। (iii) आयतन व द्रव्यमान एक ही राशि हैं। (iv) असंतृप्त विलयन में संतृप्त विलयन से अधिक विलेय होता है। (v) वायु एक गैसीय विलयन है।
हल: (i) गलत — ऑक्सीजन गैस ठंडे पानी में अधिक घुलनशील होती है, गरम पानी में कम। (ii) गलत — रेत पानी में घुलती नहीं, यह एक असमांगी (non-uniform) मिश्रण है। (iii) गलत — आयतन घेरे गए स्थान को दर्शाता है, द्रव्यमान नहीं। (iv) गलत — असंतृप्त विलयन में संतृप्त विलयन से कम विलेय होता है। (v) सही — वायु एक गैसीय विलयन है, जिसमें नाइट्रोजन विलायक की भाँति है।
प्र. 2: रिक्त स्थान भरिए — (i) आयतन मापने के लिए वस्तु को पानी में ______ किया जाता है और जल-स्तर में ______ नोट किया जाता है। (ii) विलेयता किसी निश्चित तापमान पर विलायक में घुले ______ की मात्रा है। (iii) गैसों की विलेयता तापमान बड़ने पर ______ है। (iv) जब कोई विलयन अधिक विलेय ग्रहण नहीं कर सकता तो उसे ______ कहते हैं।
हल: (i) डुबोया, वृद्धि; (ii) विलेय; (iii) घटती है; (iv) ग्लूकोज़ का संतृप्त विलयन।
प्र. 3: पानी पर तेल का तैरना क्या दर्शाता है?
हल: यह दर्शाता है कि पानी तेल से सघन (denser) है — इसीलिए कम घनत्व वाला तेल पानी की सतह पर तैरता है।
प्र. 4: एक पत्थर की मूर्ति का द्रव्यमान 225 ग्राम और आयतन 90 घन सेंटीमीटर है — इसका घनत्व ज्ञात कीजिए और बताइए कि यह पानी में डूबेगी या तैरेगी।
हल: घनत्व = द्रव्यमान/आयतन = 225/90 = 2.5 ग्राम/घन सेंटीमीटर। चूँकि यह पानी के घनत्व (1 ग्राम/घन सेंटीमीटर) से अधिक सघन है, अतः यह मूर्ति पानी में डूब जाएगी।
प्र. 5: संतृप्त विलयन के लिए सबसे उपयुक्त कथन कौन-सा है?
हल: “किसी निश्चित तापमान पर संतृप्त विलयन में और अधिक विलेय नहीं घोला जा सकता” — यही संतृप्त विलयन को सर्वोत्तम रूप से परिभाषित करता है।
प्र. 6: 2 लीटर (2000 मिली) की बोतल में 500 मिली पानी डाला गया — बोतल में कितनी और क्षमता शेष है?
हल: शेष क्षमता = 2000 − 500 = 1500 मिली (अर्थात 1.5 लीटर)।
प्र. 7: एक वस्तु का द्रव्यमान 400 ग्राम और आयतन 40 घन सेंटीमीटर है — उसका घनत्व ज्ञात कीजिए।
हल: घनत्व = द्रव्यमान/आयतन = 400/40 = 10 ग्राम/घन सेंटीमीटर।
प्र. 8: बिना छिला संतरा पानी में तैरता है जबकि छिला हुआ संतरा डूब जाता है — क्यों?
हल: बिना छिले संतरे के बाहरी छिलके में हवा के छोटे-छोटे कोष्ठक (air pockets) होते हैं, जिससे उसका औसत घनत्व कम रहता है और वह तैरता है। छिलका हटाने पर हवा के ये कोष्ठक भी हट जाते हैं, जिससे घनत्व बड़ जाता है और संतरा डूब जाता है।
प्र. 9: दो वस्तुओं A (द्रव्यमान 200 ग्राम, आयतन 40 घन सेमी) व B (द्रव्यमान 240 ग्राम, आयतन 60 घन सेमी) के घनत्वों की तुलना कीजिए।
हल: वस्तु A का घनत्व = 200/40 = 5 ग्राम/घन सेंटीमीटर। वस्तु B का घनत्व = 240/60 = 4 ग्राम/घन सेंटीमीटर। अतः वस्तु A, वस्तु B से अधिक सघन है।
प्र. 10: मिट्टी के एक घन (क्यूब) को पतली चादर के आकार में ढालने पर घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
हल: घनत्व अपरिवर्तित रहेगा, क्योंकि आकार बदलने पर भी मिट्टी का द्रव्यमान और आयतन दोनों समान रहते हैं — केवल आकृति बदलती है, घनत्व नहीं।
प्र. 11: लोहे के एक ब्लॉक का द्रव्यमान 600 ग्राम है और घनत्व 7.9 ग्राम/घन सेंटीमीटर है — इसका आयतन ज्ञात कीजिए।
हल: आयतन = द्रव्यमान/घनत्व = 600/7.9 ≈ 76 घन सेंटीमीटर।
प्र. 12: गरम पानी में परखनली रखने के प्रयोग में घनत्व पर क्या प्रभाव देखा जाता है?
हल: गरम करने पर द्रव्यमान समान रहते हुए आयतन बड़ जाता है (प्रसार के कारण), जिससे घनत्व घट जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: संतृप्त और असंतृप्त विलयन में क्या अंतर है?
उत्तर: संतृप्त विलयन वह है जिसमें विलेय की अधिकतम मात्रा घुली हुई हो और उस तापमान पर और अधिक विलेय न घुल सके, जबकि असंतृप्त विलयन में उसी तापमान पर और अधिक विलेय घुलाया जा सकता है।
प्रश्न 2: घनत्व की गणना कैसे की जाती है?
उत्तर: घनत्व = द्रव्यमान – आयतन। उदाहरण के लिए, यदि किसी पत्थर की मूर्ति का द्रव्यमान 225 g है और आयतन 90 cm³ है, तो उसका घनत्व 225 ÷ 90 = 2.5 g/cm³ होगा। चूँकि यह घनत्व जल के घनत्व (1 g/cm³) से अधिक है, अतः यह मूर्ति जल में डूब जाएगी।
प्रश्न 3: बिना छिला संतरा जल में तैरता है परंतु छिला हुआ संतरा डूब जाता है — ऐसा क्यों होता है?
उत्तर: छिलके (रिंड) में वायु की मात्रा अधिक होती है जो उसके समग्र घनत्व को घटा देती है, इसलिए वह जल से हल्का रहकर तैरता है। छिलका हटाने पर यह हवा वाला स्थान नहीं रहता और संतरे का सस्ता घनत्व बढ़ जाता है, जिससे वह जल से अधिक घना होकर डूब जाता है।
प्रश्न 4: पृथ्वी के केंद्र की ओर जाते हुए पदार्थ ज्यादा घने क्यों होते जाते हैं?
उत्तर: पृथ्वी की गहराई में जाने पर दाब और तापमान दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इस उच्च दाब से पदार्थ के कण एक-दूसरे के निकट आ जाते हैं और आयतन घट जाता है, जिससे घनत्व बढ़ जाता है — यही कारण है कि भू-पर्पटी से आंतरिक क्रोड की ओर जाते हुए परतों का घनत्व लगातार बढ़ता जाता है।
अध्याय 10: प्रकाश — दर्पण एवं लेंस
कल्पना कीजिए आप विज्ञान केंद्र में ऐसे वक्रित दर्पणों के सामने खड़े हैं जिनमें आपका प्रतिबिंब कभी बहुत बड़ा तो कभी ऊंधा-सीधा दिखाई देता है। एक समतल दर्पण में आपका प्रतिबिंब हमेशा सीधा और आपके समान आमाप का होता है, परंतु चम्मच की वक्रित सतह या चश्मे की दुकान की बाहरी सतह में प्रतिबिंब विकृत क्यों हो जाता है? लेंस हमें छोटे अक्षरों को बड़ा करके कैसे दिखा देते हैं? इसी जिज्ञासा से अध्याय 10 प्रकाश — दर्पण एवं लेंस की खोज आरंभ करता है।
10.1 गोलीय दर्पण क्या हैं? — क्रियाकलाप 10.1
प्रश्न: धातु की एक चमकदार चम्मच के वक्रित पृष्ठ को चेहरे के पास लाने पर क्या प्रतिबिंब दिखाई देता है, और क्या यह समतल दर्पण से भिन्न होता है?
हल: चम्मच के वक्रित पृष्ठ में प्रतिबिंब देखा जा सकता है, परंतु यह समतल दर्पण में बने प्रतिबिंब से भिन्न होता है। चम्मच के भीतरी ओर के वक्रित पृष्ठ पर प्रतिबिंब एक प्रकार का होता है और बाहरी ओर के वक्रित पृष्ठ पर दूसरे प्रकार का। चम्मच को उलटा करके देखने पर प्रतिबिंब पुनः बदल जाता है, जो दर्शाता है कि आकार व्यवहार चम्मच के समतल दर्पण की भाँति करता है। जब गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ भीतर की ओर वक्रित होता है तो उसे अवतल दर्पण कहते हैं, और जब परावर्तक पृष्ठ बाहर की ओर वक्रित होता है तो उसे उत्तल दर्पण कहते हैं। दोनों दर्पणों की आकृति काँच के खोखले गोले के एक खंड जैसी होती है, जिसपर एलुमिनियम जैसी परावर्तक परत चढ़ाकर इसे दर्पण बनाया जाता है।
10.2 गोलीय दर्पणों द्वारा बनाए गए प्रतिबिंबों के अभिलक्षण — क्रियाकलाप 10.3
प्रश्न: जब किसी वस्तु को अवतल दर्पण के पास रखकर धीरे-धीरे दूर ले जाया जाए तो उसके प्रतिबिंब में क्या परिवर्तन आता है, और उत्तल दर्पण का व्यवहार इससे कैसे भिन्न है?
हल: जब वस्तु अवतल दर्पण के समीप रखी होती है तो प्रतिबिंब सीधा और आमाप में वस्तु से बड़ा अर्थात आवर्धित होता है, परंतु जब वस्तु को दर्पण से दूर ले जाया जाता है तो प्रतिबिंब उल्टा हो जाता है। इसके विपरीत, उत्तल दर्पण सदैव वस्तु से छोटा अर्थात लघुकृत और सीधा प्रतिबिंब बनाता है, चाहे वस्तु कितनी भी दूर या पास हो।
गोलीय दर्पणों के दैनिक जीवन में उपयोग
प्रश्न: टॉर्च, कारों और स्कूटरों की अग्रदीपों (हेडलाइट्स) में किस प्रकार का दर्पण लगा होता है, और दंत चिकित्सक क्या दर्पण उपयोग करते हैं?
हल: टॉर्च लाइटों, कारों एवं स्कूटरों की हेडलाइट्स में परावर्तक अवतल आकार के होते हैं, जिससे बल्ब से चलने वाला प्रकाश समांतर प्रकाश किरणों के रूप में परिवर्तित होकर दूर तक प्रकाशित होता है। दंत चिकित्सक द्वारा दाँतों की जांच के लिए उपयोग में लाया जाने वाला दर्पण भी अवतल होता है, जिसे मुख के निकट रखने पर दाँतों का एक आवर्धित प्रतिबिंब बनता है। आधुनिक दूरदर्शक यंत्रों में भी अधिकांशत: वक्रित दर्पण उपयोग में लाए जाते हैं, जिनमें मुख्य दर्पण बड़ा अवतल दर्पण होता है।
प्रश्न: मोटरसाइकिलों और कारों में लगे पार्श्व दृश्य दर्पणों पर चेतावनी लिखी होती है कि “वस्तुएँ दर्पण में दिखाई देने वाली दूरी से कम होती है”, ऐसा क्यों होता है?
हल: ये दर्पण उत्तल दर्पण होते हैं, जो सदैव सीधा और लघुकृत प्रतिबिंब बनाते हैं, इसीलिए वस्तुएँ वास्तव दूरी से अधिक पास दिखाई देती हैं। उत्तल दर्पण का बड़ा लाभ यह है कि यह समतल दर्पण की तुलना में अधिक विस्तृत क्षेत्र का प्रतिबिंब दिखा सकता है, इसीलिए इन्हें सड़क के तीख्ष्ण मोड़ों और भंडार-गृहों (चौकसी दर्पण) में भी लगाया जाता है।
10.3 परावर्तन के नियम क्या हैं? — क्रियाकलाप 10.4 से 10.5
प्रश्न: समतल दर्पण पर प्रकाश की किरण के पड़ने और परावर्तित होने पर आपतन कोण (कोण i) और परावर्तन कोण (कोण r) में क्या संबंध होता है?
हल: दर्पण पर पड़ने वाली प्रकाश किरण को आपतित किरण और दर्पण से टकराकर वापस लौटने वाली किरण को परावर्तित किरण कहते हैं। आपतन बिंदु पर परावर्तक सतह पर 90° का कोण बनाती हुई रेखा अभिलंब कहलाती है। अभिलंब और आपतित किरण के बीच का कोण आपतन कोण (i) और अभिलंब और परावर्तित किरण के बीच का कोण परावर्तन कोण (r) कहलाता है। प्रयोगों से पता चलता है कि आपतन कोण सदैव परावर्तन कोण के बराबर होता है — यही परावर्तन का पहला नियम है। जब आपतन कोण 40° होता है तो परावर्तन कोण भी 40° ही होता है।
प्रश्न: परावर्तन का दूसरा नियम क्या है?
हल: आपतित किरण, दर्पण के आपतन बिंदु पर अभिलंब तथा परावर्तित किरण, ये सभी एक ही तल में अवस्थित होते हैं — यह परावर्तन का दूसरा नियम है। ये दोनों नियम समतल और गोलीय — दोनों प्रकार के दर्पणों पर समान रूप से लागू होते हैं। जब प्रकाश की अनेक समांतर किरणें अवतल दर्पण पर आपतित होती हैं तो परावर्तन के पश्चात वे एक बिंदु पर पास आती हैं अर्थात ये अभिसरित होती हैं, जबकि उत्तल दर्पण पर आपतित समांतर किरणें परावर्तन के पश्चात फैल जाती हैं अर्थात अपसरित हो जाती हैं।
सूर्य के प्रकाश को अवतल दर्पण से संकेंद्रित करना — क्रियाकलाप 10.7
प्रश्न: जब अवतल दर्पण द्वारा सूर्य के प्रकाश को एक कागज पर अभिसरित किया जाता है तो कुछ समय बाद कागज पर चमकदार धब्बा बनकर क्या होता है?
हल: कागज पर चमकदार धब्बा बनने के पश्चात कागज जलने लगता है और इससे धुआँ उठने लगता है। यह इसलिए होता है क्योंकि सूर्य से आने वाला प्रकाश अवतल दर्पण से परावर्तन के पश्चात एक बहुत छोटे बिंदु पर संकेंद्रित हो जाता है। इससे उस बिंदु पर इतनी ऊष्मा उत्पन्न होती है जो कागज को जलाने के लिए पर्याप्त होती है। (सुरक्षा संबंधी चेतावनी: सूर्य की ओर या दर्पण में सूर्य के प्रतिबिंब की ओर सीधे नहीं देखना चाहिए।)
10.4 लेंस क्या होता है? — क्रियाकलाप 10.8 से 10.10
प्रश्न: जल की एक बूंद को किसी पठ्ट सामग्री के ऊपर रखकर नीचे के अक्षरों को देखने पर वे कैसे दिखाई देते हैं?
हल: जल की बूंद का पृष्ठ बाहर की ओर उभरा हुआ (उत्तल) होता है, जिससे नीचे के अक्षर आस-पास के अक्षरों की तुलना में बड़े दिखाई पड़ते हैं। इसलिए क्योंकि बूंद के वक्रित पृष्ठ ने पाठ्यसामग्री के आमाप में वृद्धि कर दी है — जल की यह वक्रित बूंद एक साधारण लेंस की भाँति व्यवहार करती है, इसी सिद्धांत पर आधारित आवर्धक लेंस (मैग्निफाईंग ग्लास) काम करता है।
प्रश्न: उत्तल और अवतल लेंस में संरचनात्मक अंतर क्या है, और ये प्रकाश को कैसे प्रभावित करते हैं?
हल: एसा लेंस जो बीच में मोटा और किनारों पर पतला होता है, उत्तल लेंस कहलाता है, और जो लेंस किनारों पर मोटा और बीच में पतला होता है, अवतल लेंस कहलाता है। जब प्रकाश के समांतर किरणपुंज उत्तल लेंस पर आपतित होते हैं तो लेंस उन्हें अभिसरित कर देता है, इसीलिए उत्तल लेंस को अभिसारी लेंस भी कहा जाता है। इसके विपरीत, अवतल लेंस पर आपतित समांतर किरणपुंज लेंस से पार होकर अपसरित हो जाता है, इसीलिए अवतल लेंस को अपसारी लेंस भी कहा जाता है।
अध्याय का सार और महत्त्व
अध्याय 10 गोलीय दर्पणों — अवतल दर्पण और उत्तल दर्पण — तथा लेंसों — उत्तल और अवतल — के बनने वाले प्रतिबिंबों की प्रकृति समझाता है। परावर्तन के दो नियम — आपतन कोण बराबर परावर्तन कोण, और आपतित किरण, अभिलंब एवं परावर्तित किरण का एक ही तल में होना — समतल और गोलीय दोनों प्रकार के दर्पणों पर लागू होते हैं। अवतल दर्पण प्रकाश को अभिसरित करता है और दूरी-निकटी के आधार पर सीधा या उल्टा प्रतिबिंब बनाता है, जबकि उत्तल दर्पण प्रकाश को अपसरित करके सदैव सीधा-लघुकृत प्रतिबिंब बनाता है। लेंस भी इसी सिद्धांत पर काम करते हैं, बस प्रकाश परावर्तित होने की बजाय अपवर्तित होकर पार होता है।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 12 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1: एक प्रकाश-किरण दर्पण पर आपतित होकर परावर्तित होती है। दर्पण के अभिलंब से आपतन कोण 40° है — परावर्तित किरण दर्पण से कितना कोण बनाएगी?
हल: आपतन कोण = परावर्तन कोण = 40° (दोनों अभिलंब से मापे जाते हैं)। अतः परावर्तित किरण दर्पण की सतह से 90° − 40° = 50° का कोण बनाएगी।
प्र. 2: तीन स्थितियों में — अभिलंब के अनुदिश आपतन, झुके दर्पण पर अभिलंब के अनुदिश आपतन, और झुके दर्पण पर अभिलंब से 20° पर आपतन — परावर्तित किरणें खींचकर परावर्तन कोण बताइए।
हल: स्थिति (i): आपतन कोण = 0°, परावर्तन कोण = 0°। स्थिति (ii): आपतन कोण = 0°, परावर्तन कोण = 0° (दर्पण झुका होने पर भी अभिलंब के अनुदिश किरण उसी मार्ग पर वापस लौटती है)। स्थिति (iii): आपतन कोण = 20°, परावर्तन कोण = 20°।
प्र. 3: तीन प्रकार के दर्पणों के सामने रखे स्केच पेन के ढक्कन के प्रतिबिंबों को सही दर्पण से मिलाइए।
हल: प्रतिबिंब (i) — उत्तल दर्पण (छोटा, सीधा प्रतिबिंब); प्रतिबिंब (ii) — अवतल दर्पण (बड़ा या उलटा प्रतिबिंब, दूरी अनुसार); प्रतिबिंब (iii) — समतल दर्पण (समान आकार, सीधा प्रतिबिंब)।
प्र. 4: उत्तल लेंस, अवतल लेंस व समतल काँच के पीछे रखे स्केच पेन के ढक्कन के प्रतिबिंबों को सही प्रकार से मिलाइए।
हल: प्रतिबिंब (i) — उत्तल लेंस (बड़ा प्रतिबिंब); प्रतिबिंब (ii) — अवतल लेंस (छोटा, सीधा प्रतिबिंब); प्रतिबिंब (iii) — समतल पारदर्शी काँच का टुकड़ा (बिना आवर्धन के)।
प्र. 5: जब प्रकाश दर्पण पर अभिलंब के अनुदिश आपतित होता है, तो कौन-सा कथन सही है?
हल: आपतन कोण 0° होता है — आपतित किरण दर्पण की सतह के लंबवत होती है।
प्र. 6: ग्राफ-शीट के प्रतिबिंबों के आधार पर समतल, अवतल व उत्तल दर्पण पहचानिए।
हल: समान आकार की ग्रिड — समतल दर्पण; छोटी व अधिक चौड़ी ग्रिड — उत्तल दर्पण; बड़ी या विकृत (distorted) ग्रिड — अवतल दर्पण।
प्र. 7: एक स्त्री संग्रहालय में एक बड़े उत्तल दर्पण की ओर चलती है — वह क्या अवलोकन करेगी?
हल: उसका सीधा (erect) प्रतिबिंब आकार में लगातार घटता जाएगा — उत्तल दर्पण हमेशा छोटा, सीधा प्रतिबिंब बनाते हैं जो दर्पण के निकट आने पर और छोटा होता जाता है।
प्र. 8: आवर्धक लेंस (magnifying glass) को लेख के ऊपर रखकर आवर्धन देखिए, फिर उसे दूर हटाकर अवलोकन कीजिए — लेंस के प्रकार की पहचान कीजिए।
हल: आवर्धक लेंस एक उत्तल लेंस होता है, जो निश्चित दूरी तक वस्तु से रखे जाने पर बड़ा व सीधा प्रतिबिंब बनाता है।
प्र. 9: स्तंभ I (दर्पण/लेंस के गुण) को स्तंभ II से मिलाइए — अवतल दर्पण, उत्तल दर्पण, उत्तल लेंस, अवतल लेंस।
हल: अवतल दर्पण → भीतर की ओर वक्र परावर्तक सतह वाला गोलीय दर्पण; उत्तल दर्पण → हमेशा सीधा, छोटा प्रतिबिंब बनाता है; उत्तल लेंस → कुछ दूरी पर वस्तु उलटी भी दिखाई दे सकती है; अवतल लेंस → वस्तु हमेशा छोटी (diminished) दिखाई देती है।
प्र. 10: अभिकथन: यातायात अवलोकन के लिए उत्तल दर्पण पसंद किए जाते हैं। तर्क: उत्तल दर्पण समतल दर्पण से अधिक बड़ा दृश्य-क्षेत्र प्रदान करते हैं। सही विकल्प चुनिए।
हल: अभिकथन व तर्क दोनों सही हैं, और तर्क अभिकथन की सही व्याख्या करता है।
प्र. 11: वस्तु O, दर्पण M व प्रतिबिंब I दर्शाने वाले चित्रों के आधार पर दर्पण के प्रकार के विषय में सही कथन चुनिए।
हल: चित्र (a) उत्तल दर्पण को दर्शाता है और चित्र (b) अवतल दर्पण को दर्शाता है।
प्र. 12: एक पारदर्शी काँच के गिलास के पीछे पेंसिल रखकर गिलास को आधा पानी से भरिए — पेंसिल कैसी दिखाई देती है और उसका आकार बदला हुआ क्यों प्रतीत होता है?
हल: पेंसिल पानी की सतह पर मुड़ी या टूटी हुई प्रतीत होती है। यह प्रकाश के अपवर्तन (refraction) के कारण होता है — जल से वायु में जाते समय प्रकाश-किरणें दोनों माध्यमों के भिन्न घनत्व के कारण अपनी दिशा बदल लेती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: अवतल दर्पण और उत्तल दर्पण में क्या अंतर है?
उत्तर: अवतल दर्पण का परावर्तक पृष्ठ भीतर की ओर वक्रित होता है और वस्तु की दूरी के आधार पर सीधा/आवर्धित या उल्टा प्रतिबिंब बनाता है; उत्तल दर्पण का परावर्तक पृष्ठ बाहर की ओर वक्रित होता है और सदैव सीधा एवं लघुकृत प्रतिबिंब बनाता है।
प्रश्न 2: आपतन कोण और परावर्तन कोण में क्या संबंध है?
उत्तर: परावर्तन के पहले नियम के अनुसार आपतन कोण हमेशा परावर्तन कोण के बराबर होता है (i = r), आर यह समतल और गोलीय दोनों प्रकार के दर्पणों पर लागू होता है।
प्रश्न 3: उत्तल दर्पण का उपयोग वाहनों के पार्श्व दृश्य दर्पण के रूप में क्यों किया जाता है?
उत्तर: उत्तल दर्पण हमेशा सीधा एवं वस्तु से छोटा प्रतिबिंब बनाता है तथा समतल दर्पण की तुलना में अधिक विस्तृत क्षेत्र का प्रतिबिंब दिखाता है, जिससे वाहन चालक को सड़क पर अपने पीछे का बड़ा क्षेत्र देखने में मदद मिलती है।
प्रश्न 4: उत्तल लेंस और अवतल लेंस में क्या अंतर है?
उत्तर: उत्तल लेंस बीच में मोटा और किनारों पर पतला होता है और प्रकाश को अभिसरित (अभिसारी लेंस) करता है; अवतल लेंस किनारों पर मोटा और बीच में पतला होता है और प्रकाश को अपसरित (अपसारी लेंस) करता है।
अध्याय 11: आकाशीय परिघटनाएँ और काल-निर्धारण
मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाते समय दिन के आकाश में चमकते चंद्रमा को देखकर आपको भी आश्चर्य होता होगा कि भला चंद्रमा तो रात में ही दिखता है, फिर दिन में क्यों दिखाई देता है? चंद्रमा हर रात एक जैसा गोल क्यों नहीं दिखता, बल्कि उसका आकार हर रात बदलता क्यों रहता है? हमारे दिन और वर्ष कैसे निर्धारित होते हैं? इसी जिज्ञासा से अध्याय 11 आकाशीय परिघटनाओं और काल-निर्धारण की खोज आरंभ करता है।
11.1 चंद्रमा के रूप में परिवर्तन कैसे और क्यों होता है? — तालिका 11.1
प्रश्न: चंद्रमा के आकार में प्रत्येक रात परिवर्तन क्यों दिखाई देता है, जबकि चंद्रमा स्वयं गोलाकार है?
हल: चंद्रमा का आकार कभी परिवर्तित नहीं होता, परंतु पृथ्वी से हमें उसका जो दीप्त (प्रकाशित) भाग दिखता है वह हर दिन बदलता रहता है। चंद्रमा स्वयं का प्रकाश उत्सर्जित नहीं करता, बल्कि अपने पृष्ठ पर आपतित सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने के कारण चमकता है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है तथा उसका केवल आधा भाग ही सर्वदा पृथ्वी के सामने रहता है, परंतु उस आधे भाग का दीप्त अंश हर दिन एक समान नहीं होता, इसी कारण चंद्रमा का रूप भिन्न-भिन्न दिनों में भिन्न दिखाई देता है। जिस काल में चमकीला भाग बढ़ता है उसे वर्धमान काल (शुक्ल पक्ष) और जिस काल में घटता है उसे क्षीयमाण काल (कृष्ण पक्ष) कहा जाता है। एक पूर्ण चंद्रमा से अगले पूर्ण चंद्रमा तक के इस समपूर्ण चक्र की अवधि — चंद्रमा की कलाएं — लगभग एक माह होती है।
11.1.1 चंद्रमा का स्थान निर्धारण
प्रश्न: सूर्योदय के समय क्रमागत दिनों में चंद्रमा का अवलोकन करने पर उसकी स्थिति आकाश के भिन्न-भिन्न भागों में क्यों पाई जाती है?
हल: पूर्ण चंद्रमा के दिन चंद्रमा सूर्य के लगभग विपरीत दिशा में होता है। जब सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है तो चंद्रमा लगभग पश्चिम दिशा में अस्त हो रहा होता है। परवर्ती दिनों में जैसे-जैसे चंद्रमा का चमकीला भाग घटता जाता है, वह आकाश में सूर्य के समीप आता प्रतीत होता है।
11.1.3 अपने अवलोकनों से निष्कर्ष निकालना — दीप्त और अदीप्त भाग
प्रश्न: चंद्रमा स्वयं प्रकाश प्रसारित नहीं करता, पर फिर भी वह चमकता हुआ क्यों दिखाई देता है?
हल: चंद्रमा का वह आधा भाग जो सूर्य के सामने होता है उस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है और वह भाग दीप्त हो जाता है, जबकि चंद्रमा का सूर्य से परे वाला भाग अदीप्त रहता है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है, इसलिए पृथ्वी से हमें चंद्रमा के दीप्त भाग का अलग-अलग अंश दिखाई देता है — कभी पूरा दीप्त भाग, कभी उसका केवल एक अंश। नवचंद्र के दिन पृथ्वी की ओर पूर्णतः अदीप्त भाग होता है, इसीलिए चंद्रमा उस दिन दिखाई नहीं देता।
चंद्रमा के उदय-समय में प्रत्येक दिन बदलाव — लगभग 50 मिनट का अंतर — चित्र 11.6
प्रश्न: चंद्रमा प्रत्येक दिन आकाश में लगभग 50 मिनट देर से उदित होता हुआ क्यों दिखाई देता है?
हल: पृथ्वी 24 घंटे में अपनी अक्ष के परितः एक घूर्णन पूर्ण करती है, उतने ही समय में चंद्रमा अपनी परिक्रमण कक्षा में थोड़ा आगे बढ़ जाता है। इसी कारण चंद्रमा को आकाश में उसी स्थान पर वापस आने में पृथ्वी को एक घूर्णन से कुछ अधिक (लगभग 50 मिनट) घूर्णन करना पड़ता है।
11.2 समय का निर्धारण कैसे किया जाता है? — सौर दिवस तथा तालिका 11.2
प्रश्न: लघुतम छाया की विधि 22-24 मार्च 2025 के अवलोकनों में प्रत्येक दिन की अवधि लगभग 24 घंटे क्यों मिली?
हल: सूर्य की सबसे लघुतम छाया का समय प्रत्येक दिन लगभग एक ही घड़ी (स्थानीय दोपहर) के आस-पास होता है, क्योंकि पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग एक समान गति से घूमती है। 22 से 23 मार्च 2025 के अवलोकन में लघुतम छाया 12:20 पर थी और दिन की अवधि 24:00 (पूरे 24 घंटे) रही; 23 से 24 मार्च के बीच लघुतम छाया का समय थोड़ा बदलकर 12:19 हो गया और दिन की अवधि 23:59 रही — ये छोटे-छोटे अंतर दिखाते हैं कि दिन की अवधि का माध्य मान लगभग 24 घंटे के बराबर होता है।
11.2.2 सौर कालदर्शक
प्रश्न: सौर कालदर्शकों में हर चार वर्ष में एक अतिरिक्त दिन (अधिवर्ष/लीप वर्ष) क्यों जोड़ा जाता है?
हल: पृथ्वी को सूर्य के परितः एक परिक्रमा पूर्ण करने में 365 दिन से लगभग एक चौथाई दिन का अतिरिक्त समय लगता है। ये अतिरिक्त घंटे प्रत्येक चार वर्ष में जुड़कर लगभग एक दिन के बराबर हो जाते हैं। इसे समायोजित करने हेतु प्रत्येक चार वर्ष में एक अतिरिक्त दिन जोड़ा जाता है, और यह वर्ष — जिसमें फरवरी में 29 दिन होते हैं — अधिवर्ष (लीप वर्ष) कहलाता है। जो वर्ष चार से विभाज्य होता है वह ग्रेगोरी कालदर्शक में अधिवर्ष होता है।
हमारी वैज्ञानिक परंपरा — विषुव और अयनांत
प्रश्न: सूर्य सदैव ठीक पूर्व दिशा में क्यों नहीं उदित होता, और अयनांत क्या हैं?
हल: ग्रीष्मकाल में सूर्य पूर्व दिशा के थोड़ा उत्तर में और शीतकाल में पूर्व दिशा के थोड़ा दक्षिण में उदित होता है। सूर्य के उदय बिंदु का यह प्रत्येक वर्ष 21 जून एवं 21 दिसंबर के आस-पास परिवर्तन अयनांत पर होता है। दिसंबर से जून तक सूर्य की उत्तर की ओर दृश्यमान गति को उत्तरायण कहा जाता है। बीच में साल में दो बार (लगभग 21 मार्च और 23 सितंबर) सूर्य ठीक पूर्व में उदित और ठीक पश्चिम में अस्त होता है — इन दिनों को विषुव कहा जाता है। प्राचीन भारतीय लोगों ने आधुनिक उपकरणों के बिना ही आकाश के सावधानीपूर्वक अवलोकन से यह जाना था कि वर्ष की अवधि लगभग 365 दिन होती है।
चंद्र-सौर कालदर्शक
प्रश्न: भारत में चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ जैसे महीनों के नाम वाले कालदर्शक किस सिद्धांत पर आधारित होते हैं?
हल: ये चंद्र-सौर कालदर्शक हैं, जिनमें सौर और चंद्र दोनों कालदर्शकों की मूल विशेषताएँ सम्मिलित होती हैं। चूँकि चंद्रमा की कलाओं का चक्र (लगभग 29.5 दिन) सौर वर्ष से छोटा होता है, इसलिए कुछ वर्षों बाद एक अतिरिक्त माह (अधिक मास या अंतर्वेशी मास) जोड़ा जाता है ताकि सौर वर्ष और चंद्र चक्र में सामंजस्य बना रहे। कुछ समुदाय नए महीने का आरंभ अमावस्या के बाद करते हैं (अमांत कालदर्शक), जबकि अन्य पूर्णिमा के अगले दिन से (पूर्णिमांत कालदर्शक)।
11.4 हम अंतरिक्ष में कृत्रिम उपग्रहों का प्रमोचन क्यों करते हैं?
प्रश्न: चंद्रमा के अलावा जो मानव निर्मित उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं, वे कितनी ऊंचाई पर होते हैं और एक परिक्रमा पूर्ण करने में कितना समय लेते हैं?
हल: चंद्रमा पृथ्वी का एक प्राकृतिक उपग्रह है, जबकि विभिन्न देशों द्वारा भेजे गए मानव निर्मित उपग्रह कृत्रिम उपग्रह कहलाते हैं। इनमें से अधिकांश पृथ्वी की सतह से लगभग 800 किलोमीटर ऊपर आकाश में परिक्रमा करते हैं और एक परिक्रमा पूर्ण करने में लगभग 100 मिनट का समय लेते हैं। ये उपग्रह संचार, यान संचालन (नेविगेशन), मौसम-अनुवीक्षण, आपदा प्रबंधन और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे अनेक प्रक्रमों में सहायता करते हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इन प्रक्रमों को सशक्त बनाने के लिए कई उपग्रहों का प्रमोचन किया है।
प्रश्न: अंतरिक्ष में भेजे गए रॉकेट और पुराने उपग्रहों से बनने वाला कचरा क्या समस्या पैदा करता है?
हल: एसे रॉकेटों के अवयव तथा उपयोग की अवधि पूर्ण कर चुके उपग्रह अंतरिक्ष में कचरे की भाँति एकत्रित हो रहे हैं, जिससे इनकी कार्यकारी उपग्रहों से टकराने की संभावना बनी रहती है। छोटा-मोटा कचरा जब पृथ्वी की ओर गिरता है तो वायु के साथ घर्षण के कारण जल जाता है, जबकि बड़े टुकड़े पृथ्वी पर आ गिरते हैं। विश्व के देश अब मिलजुल कर इस घातक कचरे के निपटान के लिए कार्य कर रहे हैं।
अध्याय का सार और महत्त्व
अध्याय 11 चंद्रमा की कलाओं, समय-निर्धारण की विधियों और कृत्रिम उपग्रहों के महत्व को समझाता है। चंद्रमा स्वयं का प्रकाश नहीं करता, बल्कि सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है, और पृथ्वी के चारों ओर घूमने के कारण हमें उसके दीप्त भाग का बदलता हुआ अंश (कलाएँ) दिखाई देता है। सौर दिवस और चांद की कलाओं के चक्र ने मिलकर सौर, चांद्र और चंद्र-सौर — एसे तीन प्रकार के कालदर्शक विकसित किए, जिनमें से भारतीय राष्ट्रीय कालदर्शक भी एक है। चंद्रमा के साथ ही विश्वभर में भेजे गए कृत्रिम उपग्रह संचार, मौसम और नेविगेशन जैसे क्षेत्रों में मानव जीवन को सरल बनाते हैं, परंतु इनसे उत्पन्न अंतरिक्ष कचरे का निपटान एक नई वैज्ञानिक चुनौती बन गया है।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 12 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1: सही/गलत बताइए — (i) हम चंद्रमा का केवल वही भाग देख सकते हैं जो सूर्य के प्रकाश को हमारी ओर परावर्तित करता है। (ii) पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर सूर्य के प्रकाश को रोकने से कलाएं बनती हैं। (iii) कैलेंडर विभिन्न खगोलीय चक्रों पर आधारित हैं जो नियमित रूप से दोहराते हैं। (iv) चंद्रमा केवल रात में ही देखा जा सकता है।
हल: (i) सही। (ii) गलत — चंद्रमा की कलाएँ पृथ्वी-चंद्रमा-सूर्य की सापेक्ष स्थितियों में परिवर्तन से बनती हैं, पृथ्वी की छाया से नहीं (वह तो चंद्रग्रहण में होता है)। (iii) सही। (iv) गलत — चंद्रमा दिन में भी कई बार दिखाई देता है।
प्र. 2: अमोल का जन्म 6 मई को पूर्णिमा के दिन हुआ था — क्या उसका जन्मदिन हर वर्ष पूर्णिमा के दिन ही पड़ेगा?
हल: नहीं, क्योंकि चंद्र-चक्र (लगभग 29.5 दिन का) सौर कैलेंडर के महीनों से मेल नहीं खाता, इसलिए हर वर्ष पूर्णिमा की तिथि बदलती रहती है।
प्र. 3: दिए गए चित्र में चंद्रमा से संबंधित दो गलत बातें बताइए।
हल: चित्र में तारे चंद्रमा के बहुत निकट दिखाए गए हैं (जो केवल रात में ही दिखने चाहिए); और चंद्रमा पर छाया गलत स्थिति में दिखाई गई है, जो वास्तविक कला-चक्र से मेल नहीं खाती।
प्र. 4: चंद्रमा के चित्रों को देखकर सही पैनल-संख्या को उसकी संगत कला से मिलाइए।
हल: विभिन्न कलाएँ क्रमशः पैनल C, E, F, A, B से मेल खाती हैं; पैनल B (जो चंद्रमा का सदैव पृथ्वी से अदृश्य रहने वाला दूरस्थ भाग दर्शाता है) पृथ्वी से कभी नहीं देखा जा सकता।
प्र. 5: मालिनी ने सूर्यास्त के समय चंद्रमा को सिर के ठीक ऊपर आकाश में देखा — यह कौन-सी कला थी?
हल: यह प्रथम चतुर्थांश (first quarter) कला थी, जिसमें चंद्रमा अर्ध-चंद्र (half-moon) के रूप में दिखता है और वर्धमान (waxing) अवस्था में होता है।
प्र. 6: रवि ने कहा “मैंने कृष्ण/अर्ध कृष्णपक्षीय चंद्रमा देखा…”; कौशल्या ने कहा “मैंने एक बार उभयोत्तल (gibbous) चंद्रमा देखा…” — कौन सत्य कह रहा है?
हल: कौशल्या सत्य कह रही है; रवि का वर्णित अवलोकन भौतिक रूप से संभव नहीं है क्योंकि वह चंद्र-कलाओं के क्रम से मेल नहीं खाता।
प्र. 7: वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि चंद्रमा धीरे-धीरे पृथ्वी से दूर हो रहा है और उसकी परिक्रमा धीमी हो रही है — इसका अधिमास (intercalary month) की आवश्यकता पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
हल: चंद्र-मास लंबे होते जाने से सौर वर्ष के साथ अंतर घटता जाएगा, इसलिए भविष्य में अधिमास जोड़ने की आवश्यकता कम बार पड़ेगी।
प्र. 8: सौर कैलेंडर के 3 वर्षों (36 महीनों) में कुल 37 पूर्णिमाएँ होती हैं — इसका क्या अर्थ है?
हल: इसका अर्थ है कि 3 वर्षों में कम-से-कम एक महीने में दो पूर्णिमाएँ आती हैं (जिसे ‘ब्लू मून’ कहा जाता है), क्योंकि 36 महीनों में सामान्यतः 36 पूर्णिमाएँ होनी चाहिए थीं।
प्र. 9: वैशाली ने एक विशेष रात को सूर्यास्त से सूर्योदय तक आकाश में चंद्रमा को देखा — यह कौन-सी कला थी?
हल: यह पूर्णिमा (full moon) थी, जो सूर्यास्त से सूर्योदय तक — पूरी रात आकाश में दिखाई देती है।
प्र. 10: यदि अधिवर्ष (लीप ईयर) होना बंद हो जाए, तो लगभग कितने वर्षों में स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) सर्दियों में पड़ने लगेगा?
हल: लगभग 500–600 वर्षों में, क्योंकि प्रत्येक वर्ष लगभग एक-चौथाई दिन का अंतर संचित होते-होते इतने वर्षों में कैलेंडर पर्याप्त रूप से खिसक जाएगा।
प्र. 11: कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपित करने का उद्देश्य क्या है?
हल: संचार, नौवहन (नेविगेशन), मौसम-निगरानी, आपदा-प्रबंधन और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपित किए जाते हैं।
प्र. 12: निम्नलिखित समय-मापों में से प्रत्येक किस आवर्ती (periodic) खगोलीय परिघटना पर आधारित है — दिन, महीना, वर्ष?
हल: दिन — पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन (rotation); महीना — पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमा (revolution); वर्ष — सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में क्या अंतर है?
उत्तर: शुक्ल पक्ष (वर्धमान काल) में चंद्रमा का चमकीला भाग अमावस्या से पूर्णिमा तक बढ़ता जाता है, जबकि कृष्ण पक्ष (क्षीयमाण काल) में पूर्णिमा से अमावस्या तक घटता जाता है।
प्रश्न 2: अधिवर्ष (लीप वर्ष) की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
उत्तर: पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूर्ण करने में 365 दिन से कुछ अधिक समय लगता है। यह अतिरिक्त समय प्रत्येक चार वर्ष में जुड़कर लगभग एक पूरे दिन के बराबर हो जाता है, इसे समायोजित करने के लिए ही फरवरी में एक अतिरिक्त दिन जोड़ा जाता है।
प्रश्न 3: प्राकृतिक और कृत्रिम उपग्रह में क्या अंतर है?
उत्तर: चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है; कृत्रिम उपग्रह विभिन्न देशों द्वारा मानव निर्मित कर अंतरिक्ष में भेजे जाते हैं, जो संचार, मौसम-अनुवीक्षण और नेविगेशन जैसे कामों में सहायक होते हैं।
प्रश्न 4: अमांत और पूर्णिमांत कालदर्शक में क्या अंतर है?
उत्तर: अमांत कालदर्शक में नया महीना अमावस्या के पश्चात आरंभ होकर अगली अमावस्या के दिन समाप्त होता है; पूर्णिमांत कालदर्शक में नया महीना पूर्णिमा के अगले दिन से आरंभ होकर अगली पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है।
अध्याय 12: प्रकृति कैसे सामंजस्य में कार्य करती है
ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में हाथी अक्सर खेतों और गांवों में प्रवेश कर जाते हैं। इसका मुख्य कारण है उनके वन पर्यावास का सिकुड़ना — वनों की कटाई से उनके भोजन, जल और आवास की कमी हो जाती है, जिससे वे खेतों में घुस आते हैं और कभी-कभी फसलों और लोगों को हानि पहुंचाते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए वन्यजीव पारिस्थितिकीविदों ने वन्यजीव गलियारे (wildlife corridors) चिह्नित किए हैं, जो जीवों को मानव बस्तियों से टकराए बिना सुरक्षित रूप से एक आवास खंड से दूसरे आवास खंड तक जाने में मदद करते हैं। इस अध्याय में हम यह समझेंगे कि प्रकृति में जीव और उनका पर्यावरण मिलकर किस प्रकार सामंजस्य में कार्य करते हैं।
12.1 हम किस प्रकार अपने परिवेश का अनुभव करते और उसे समझते हैं?
प्रश्न: किसी पर्यावास में जैविक घटक और अजैविक घटक क्या होते हैं?
हल: एक तालाब और एक वन के पर्यावास की तुलना करने पर पता चलता है कि प्रत्येक पर्यावास में दो प्रकार के घटक पाए जाते हैं। जैविक घटक (biotic components) वे होते हैं जो सजीव हैं — जैसे तालाब में मछली, और वन में घास, वृक्ष और पक्षी। अजैविक घटक (abiotic components) वे होते हैं जो निर्जीव हैं — जैसे जल, मृदा, वायु, सूर्य का प्रकाश और तापमान। इस प्रकार हर पर्यावास जैविक और अजैविक घटकों के सम्मिलन से बनता है।
12.2 प्रकृति में कौन-कौन से जीव एक साथ रहते हैं?
प्रश्न: समष्टि (population) और समुदाय (community) में क्या अंतर है?
हल: एक ही पर्यावास में एक ही जाति के जीवों के समूह को उस जाति की “समष्टि” कहा जाता है — जैसे किसी तालाब में एक प्रजाति की मछलियों का समूह। एक ही पर्यावास को साझा करने वाली विभिन्न समष्टियों से मिलकर एक “समुदाय” बनता है। पर्यावास के जैविक घटक — पादप, जंतु और सूक्ष्मजीव — मिलकर समुदाय बनाते हैं। ये जीव परस्पर क्रिया करते हैं और उत्तरजीविता के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
12.3 क्या किसी समुदाय में प्रत्येक जीव महत्त्वपूर्ण होता है?
प्रश्न: मछली युक्त तालाब और मछली रहित तालाब में व्याधपतंग, मधुमक्खी और पुष्पीय पादपों की संख्या में क्या अंतर पाया गया?
हल: अवलोकन दर्शाते हैं कि मछली युक्त तालाब में व्याधपतंग (मछलियां इनके लार्वा खाती हैं) की संख्या कम पाई गई, जबकि व्याधपतंग सामान्यतः मक्खियां, मधुमक्खियां और तितलियां खाते हैं। व्याधपतंग कम होने से मधुमक्खियां और तितलियां अधिक संख्या में पाई गईं, और ये परागण करके पादपों को बीज बनाने में सहायता करती हैं। अत: मछली युक्त तालाब के समीप उगने वाले पुष्प मछली रहित तालाब की अपेक्षा अधिक बीज उत्पन्न कर सकते हैं। यह दर्शाता है कि जैविक घटक (मछली, व्याधपतंग, परागणकारी, पादप) और अजैविक घटक (तापमान, जल, पोषक तत्व) किस प्रकार परस्पर क्रिया करते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
12.4 पारितंत्र (Ecosystem) किसे कहते हैं?
प्रश्न: किसी प्रदेश में जैविक और अजैविक घटक किस प्रकार समिलकर एक पारितंत्र बनाते हैं?
हल: एक पर्यावास में जैविक घटक (पादप, जंतु और सूक्ष्मजीव) और अजैविक घटक (वायु, जल, मृदा, सूर्य का प्रकाश और तापमान) एक-दूसरे के साथ परस्पर क्रिया करके एक पारितंत्र या पारिस्थितिक तंत्र बनाते हैं। प्रकृति में दो मुख्य प्रकार के पारितंत्र होते हैं — एक जलीय पारितंत्र (जिसमें तालाब, नदियां और झीलें सम्मिलित हैं) और दूसरा स्थलीय पारितंत्र (जिसमें वन, खेत और बड़े वृक्ष सम्मिलित हैं)। पारितंत्र बड़े या छोटे हो सकते हैं और अक्सर एक-दूसरे से अतिव्यापी (overlap) भी होते हैं।
12.5 आहार शृंखला और आहार जाल क्या हैं?
प्रश्न: घास के एक मैदान के पारितंत्र में घास, टिड़ा, मेंढक, साँप और उकाब जैसे जीवों से एक आहार शृंखला किस प्रकार बनती है?
हल: आहार शृंखला वह क्रम है जिसमें एक जीव दूसरे को खाकर ऊर्जा प्राप्त करता है। घास के मैदान का एक उदाहरण: घास → टिड़ा → मेंढक → साँप → उकाब। इसी पारितंत्र में घास → शशक → तेंदुआ जैसी दूसरी आहार शृंखलाएं भी बन सकती हैं। जब एक पारितंत्र में कई आहार शृंखलाएँ आपस में जुड़ती हैं तो एक जटिल संरचना बनती है, जिसे आहार जाल (food web) कहते हैं। आहार शृंखला में हर जीव की स्थिति एक “पोषी स्तर” (trophic level) कहलाती है — पादप (उत्पादक) पिरामिड के आधार पर, शाकाहारी जंतु (जैसे खरगोश और हिरण) दूसरे स्तर पर, छोटे मांसाहारी (जैसे मेंढक) तीसरे स्तर पर, और बड़े मांसाहारी जंतु (जैसे बाघ या गिद्ध) अगले स्तर पर। इसे एक पिरामिड के रूप में भी दर्शाया जा सकता है।
12.6 अपघटक (Decomposers) किसे कहते हैं?
प्रश्न: क्या प्रकृति में सचमुच कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता? इसमें अपघटकों की क्या भूमिका है?
हल: मृत पादपों और जंतुओं को विघटित करके पोषक तत्वों को पुनर्चक्रित कर पर्यावरण को लौटाने वाले जीवों को अपघटक या मृतजीवी कहते हैं (जैसे जीवाणु और कवक)। इस प्रक्रिया को अपघटन कहते हैं। पादप मृदा में उगते हैं और मृदा में कई पोषक तत्व अपघटन प्रक्रिया से ही आते हैं। इस प्रकार पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में अपघटक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी कारण प्रवासी पक्षी (jasmine आदि), परागणकारी और परभक्षी भी पारितंत्र में संतुलन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
12.7 जीवों के बीच सहजीवी संबंध किस प्रकार के होते हैं?
प्रश्न: पारस्परिकता, सहभोजिता और परजीविता में क्या अंतर है, उदाहरण सहित समझाइए?
हल: पारितंत्र में कई जीव सहजीवी (symbiotic) संबंधों में रहते हैं। पारस्परिकता (mutualism) में दोनों जीवों को लाभ होता है — जैसे मधुमक्खी को मकरंद मिलता है और फूल परागित हो जाता है। सहभोजिता (commensalism) में एक जीव को लाभ होता है जबकि दूसरे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता — जैसे वृक्षों पर उगने वाले ऑर्किड (orchid) को सहारा मिलता है बिना वृक्ष को हानि पहुंचाए। परजीविता (parasitism) में एक जीव को लाभ होता है जबकि दूसरे को हानि पहुंचती है — जैसे कुत्तों के शरीर पर रहने वाली किलनियां (टिक) जो रक्त से पोषण लेती हैं और कुत्ते की त्वचा में खुजली पैदा करती हैं।
12.8 प्रकृति के वैज्ञानिक अध्येताओं का योगदान — ए.जे.टी. जॉनसिंह
प्रश्न: वन्यजीव पारितंत्रों को समझने में भारतीय वन्यजीव विज्ञानियों का क्या योगदान रहा है?
हल: असीर जवाहर थॉमस जॉनसिंह (ए.जे.टी. जॉनसिंह) एक प्रसिद्ध भारतीय वन्यजीव जीवविज्ञानी थे जिन्होंने वन पारितंत्र को जंतुओं की दृष्टि से समझने में हमारी सहायता की। उन्होंने आधुनिक अनुगमन प्रणाली (tracking systems) के माध्यम से वन्यजीवों के अध्ययन में अपनी विशेषज्ञता के लिए कार्यकिया । उनके जैसे वैज्ञानिकों का कार्य यह दर्शाता है कि किस प्रकार वैज्ञानिक अनुसंधान वन्यजीवों और उनके पारितंत्र की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
12.9 संकटग्रस्त पारितंत्र का एक उदाहरण — सुंदरबन
प्रश्न: सुंदरबन के मैंग्रोव वन पारितंत्र क्यों महत्त्वपूर्ण हैं और वे किन खतरों का सामना कर रहे हैं?
हल: सुंदरबन भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के संगम पर स्थित है और विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन है। 1987 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। ये मैंग्रोव वृक्ष चक्रवात और बाढ़ के समय तीव्र वायु और लहरों को मंद करके तटवर्ती क्षेत्रों की रक्षा करते हैं, वायु से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन निर्मुक्त करते हैं। तथापि ईंधन और कृषि के लिए मैंग्रोव के वृक्षों को काटा जा रहा है, अवैध शिकार हो रहा है, और नदियों में औद्योगिक अपशिष्ट और अनुपचारित वाहित मल का प्रदूषण भी सुंदरबन के पारितंत्र की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को बाधित कर रहा है।
12.10 मानव निर्मित पारितंत्र क्या होते हैं?
प्रश्न: क्या मनुष्य भी पारितंत्र बना सकता है?
हल: हां, मनुष्यों ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मछली के तालाब, खेत और उद्यान जैसे कृत्रिम (मानव निर्मित) पारितंत्रों का निर्माण किया है। भली-भाँति अभिकल्पित किए जाने पर ये प्रदूषण कम करने, जैव विविधता बढ़ाने और लोगों के लिए मनोरंजक स्थल प्रदान करने में सहायक हो सकते हैं। प्राकृतिक पारितंत्रों के विपरीत इन्हें मानव द्वारा देखभाल और प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
12.11 हरित क्रांति और कृषि पर उसका प्रभाव
प्रश्न: हरित क्रांति क्या थी और संश्लेषित उर्वरकों और पीड़कनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से पारितंत्र पर क्या प्रभाव पड़ा?
हल: 1950 से 1965 के बीच भारत को कम फसल उत्पादन के कारण खाद्य संकट का सामना करना पड़ा। 20वीं शताब्दी के मध्य में ट्रैक्टरों, मशीनों, संश्लेषित उर्वरकों और पीड़कनाशकों के प्रयोग से खाद्य उत्पादन बढ़ाने में सहायता मिली — इसे हरित क्रांति कहा जाता है। लेकिन संश्लेषित उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मृदा में ह्यूमस और हितेषी सूक्ष्मजीवों की संख्या कम हो सकती है, जिससे मृदा की उर्वरता घटती है। संश्लेषित उर्वरक प्राकृतिक परभक्षियों की संख्या को भी कम कर सकते हैं, जिससे अंततः पीड़कजीवों की समष्टि बढ़ जाती है। अत्यधिक सिंचाई और बार-बार जुताई से केंचुए और घोंघे जैसे महत्वपूर्ण मृदा जीव भी प्रभावित हो सकते हैं।
12.12 भारतीय बुलफ्रॉग का स्थिति जीवन — एक चेतावनी उदाहरण
प्रश्न: 1980 के दशक में मेंढक की टाँगों के निर्यात ने पारितंत्र पर क्या प्रभाव डाला?
हल: 1980 के दशक में भारत मेंढक की टाँगों — विशेष रूप से भारतीय बुलफ्रॉग (हॉप्लोबैट्राकस टाइगरिनस) — का एक महत्वपूर्ण निर्यातक था। व्यापक स्तर पर इनके निर्यात के कारण मेंढकों की जीव संख्या में कमी आई। चूंकि मेंढक कीट खाते हैं, इसलिए उनकी संख्या में कमी होने के कारण कृषि पीड़क जीवों की संख्या में वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप किसान अधिक संश्लेषित पीड़कनाशकों का उपयोग करने के लिए बाध्य हुए, इससे पर्यावरण, मृदा और जल की गुणवत्ता को हानि पहुंची तथा इसका समग्र पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। भारत सरकार ने इस पारिस्थितिकीय हानि को रोकने के लिए मेंढक की टाँगों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। यह उदाहरण दर्शाता है कि एक छोटी सी क्षति भी पूरे पारितंत्र में गंभीर बदलाव ला सकती है।
अध्याय का सार और महत्त्व
इस अध्याय में हमने सीखा कि प्रकृति में जैविक और अजैविक घटक किस प्रकार एक-दूसरे से जुड़कर पारितंत्र बनाते हैं। समष्टि, समुदाय, आहार शृंखला, आहार जाल, अपघटक और सहजीवी संबंध जैसी अवधारणाएं यह समझने में सहायक हैं कि प्रकृति कैसे संतुलित रहती है। भारतीय बुलफ्रॉग और सुंदरबन जैसे उदाहरण यह भी दर्शाते हैं कि मानवीय हस्तक्षेप — चाहे वह अत्यधिक निर्यात, वनों की कटाई या संश्लेषित रसायनों का अत्यधिक प्रयोग हो — पूरे पारितंत्र के संतुलन को बिगाड़ सकता है। इसीलिए वन्यजीव गलियारों, राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों जैसे प्रयासों के माध्यम से पारितंत्रों की रक्षा करना और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 9 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1: दिए गए चित्र को देखकर गलत कथन चुनिए — (i) समुदाय (community) समष्टि (population) से बड़ा होता है। (ii) समुदाय पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) से छोटा होता है। (iii) पारिस्थितिकी तंत्र, समुदाय का एक भाग है।
हल: कथन (iii) गलत है — पारिस्थितिकी तंत्र सबसे बड़ी इकाई है, वह समुदाय का भाग नहीं है; बल्कि समुदाय ही पारिस्थितिकी तंत्र का एक भाग होते हैं।
प्र. 2: समष्टि, समुदाय का एक भाग है। यदि किसी वन पारिस्थितिकी तंत्र से सभी अपघटक (decomposers) अचानक लुप्त हो जाएं, तो क्या परिवर्तन होंगे? अपघटक क्यों आवश्यक हैं, समझाइए।
हल: अपघटकों के बिना — मृत जीव बिना अपघटित हुए जमा होते जाएंगे; मिट्टी में पोषक तत्वों की पुनःपूर्ति नहीं होगी, जिससे उर्वरता घट जाएगी; समूचा पारिस्थितिकी तंत्र अस्थिर हो जाएगा, जिससे जीवों के जीवित रहने पर खतरा उत्पन्न होगा। अपघटक मृत कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर पोषक तत्व मिट्टी में वापस लौटाते हैं, इसलिए वे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अनिवार्य हैं।
प्र. 3: तमिलनाडु के कुड्डालोर ज़िले के सेलवम ने बताया कि 2004 की सुनामी में मैंग्रोव वनों के कारण उनका गाँव पड़ोसी गाँवों की तुलना में कम प्रभावित हुआ — इसका कारण समझाइए।
हल: मैंग्रोव वृक्षों की मोटी व घनी जड़ें तूफानों व सुनामी के दौरान तेज़ हवाओं व लहरों की गति को धीमा कर देती हैं। ये प्राकृतिक अवरोधक (natural barriers) की तरह कार्य करते हुए लहरों की गति व नुकसान को कम कर देते हैं।
प्र. 4: दिए गए खाद्य-श्रृंखला में यदि मेंढक इस पारिस्थितिकी तंत्र से लुप्त हो जाएं, तो टिड़्डों (grasshoppers) और साँपों की समष्टि पर क्या प्रभाव पड़ेगा, और क्यों?
हल: टिड़ों की समष्टि बड़ जाएगी (क्योंकि उन्हें खाने वाला मेंढक नहीं रहेगा); साँपों की समष्टि घट जाएगी (क्योंकि उनका भोजन-स्रोत मेंढक समाप्त हो जाएगा)। यह दर्शाता है कि खाद्य-श्रृंखला से किसी भी जीव के हटने से पूरी श्रृंखला बाधित होती है।
प्र. 5: विद्यालय के बगीचे में पिछले मौसम कम तितलियां दिखीं — संभावित कारण क्या हो सकते हैं? अधिक तितलियां लाने हेतु क्या कदम उठाए जा 20सकते हैं?
हल: संभावित कारण — मकरंद (nectar) देने वाले फूलों वाले पौधों की कमी, रासायनिक उर्वरकों से नुकसान, मौसम-परिवर्तन व प्रदूषण। समाधान — अधिक मकरंद-युक्त फूल लगाना, कैटरपिलर के लिए पोषक (host) पौधे उगाना, रासायनिक उर्वरकों का उपयोग घटाना और बगीचे की स्वच्छता बनाए रखना।
प्र. 6: केवल उत्पादकों (producers) से बना पारिस्थितिकी तंत्र, बिना उपभोक्ताओं (consumers) या अपघटकों (decomposers) के, संभव क्यों नहीं है?
हल: केवल उत्पादक किसी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए नहीं रख सकते — ऊर्जा के स्थानांतरण के लिए उपभोक्ता आवश्यक हैं, और मिट्टी में पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण (recycling) के लिए अपघटक आवश्यक हैं, जिनसे पौधों की वृद्धि सुनिश्चित होती है।
प्र. 7: अपने घर या विद्यालय के पास दो भिन्न स्थान (जैसे एक पार्क और एक सड़क किनारा) का अवलोकन कीजिए। वहाँ मौजूद सजीव व निर्जीव घटकों को सूचीबद्ध करें। दोनों पारिस्थितिकी तंत्र कैसे भिन्न हैं?
हल: पार्क में अधिक जैव-विविधता, पौधे व जंतु तथा ताज़ी हवा पाई जाती है। सड़क किनारे कम हरियाली, अधिक प्रदूषण, कम जीव और प्राकृतिक तत्वों की जगह कंक्रीट अधिक देखा जाता है।
प्र. 8: “कृषि क्षेत्र जैसे मानव-निर्मित पारिस्थितिकी तंत्र आवश्यक हैं, परंतु उन्हें टिकाऊ (sustainable) बनाया जाना चाहिए” — इस कथन पर टिप्पणी कीजिए।
हल: कृषि क्षेत्र आवश्यक भोजन उपलब्ध कराते हैं परंतु रासायनिक उर्वरकों जैसी अस्थिर पद्धतियों पर निर्भर रहते हैं। जैविक खेती (organic farming) व फसल-चक्र (crop rotation) जैसी टिकाऊ विधियाँ मिट्टी, जल व जैव-विविधता की रक्षा करती हैं।
प्र. 9: यदि किसी बीमारी के कारण भारतीय खरगोश की समष्टि घट जाए, तो अन्य जीवों की संख्या पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
हल: लोमड़ी (fox) की समष्टि घट जाएगी (क्योंकि उनका मुख्य भोजन-स्रोत समाप्त हो जाएगा); घास व अन्य पौधों की समष्टि बड़ जाएगी (क्योंकि उन्हें चरने वाले खरगोश कम हो जाएंगे)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: पारितंत्र में जैविक और अजैविक घटकों में क्या अंतर है?
उत्तर: जैविक घटक सजीव घटक हैं जैसे पादप, जंतु और सूक्ष्मजीव, जबकि अजैविक घटक निर्जीव घटक हैं जैसे वायु, जल, मृदा, सूर्य प्रकाश और तापमान। दोनों के बीच की परस्पर क्रिया से पारितंत्र बनता है।
प्रश्न 2: आहार शृंखला और आहार जाल में क्या अंतर है?
उत्तर: आहार शृंखला एक सीधी रेखा के रूप में भोजन संबंध दर्शाती है (जैसे घास → टिड़ा → मेंढक → साँप → उकाब), जबकि आहार जाल कई आहार शृंखलाओं के आपस में जुड़े होने से बनी एक जटिल संरचना है, जो वास्तविकता के अधिक ऩजदीक है।
प्रश्न 3: सहजीवी संबंधों के तीन मुख्य प्रकार कौन-से हैं?
उत्तर: पारस्परिकता (दोनों को लाभ), सहभोजिता (एक को लाभ, दूसरे पर कोई प्रभाव नहीं) और परजीविता (एक को लाभ, दूसरे को हानि)।
प्रश्न 4: हरित क्रांति के दीर्घकालिक दुष्प्रभाव क्या हैं?
उत्तर: संश्लेषित उर्वरकों और पीड़कनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से मृदा की उर्वरता घटती है, ह्यूमस और हितेषी सूक्ष्मजीव कम होते हैं, प्राकृतिक परभक्षियों की संख्या घटती है और पीड़कजीवों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं।
अध्याय 13: हमारा आवास— पृथ्वी एक अद्वितीय जीवनदायी ग्रह
हमें अपनी पृथ्वी की कई विशेषताएँ एकदम सामान्य मान लेते हैं, लेकिन ये विशेषताएँ हमारे लिए अत्यंत रोचक एवं महत्त्वपूर्ण होती हैं। जिस वायु में हम श्वास लेते हैं वह उड़कर अंतरिक्ष में नहीं जाती, हम गुरुत्व के कारण पृथ्वी पर खड़े रह पाते हैं, और हमारा हृदय रक्त को मस्तिष्क तक ऊपर पहुँचा पाता है। इस अध्याय में हम समझेंगे कि सौर मंडल में पृथ्वी की स्थिति, आकार और संरचना उसे जीवन के लिए किस प्रकार अनुकूल बनाती है।
13.1 सौर मंडल में पृथ्वी की स्थिति कैसी है?
प्रश्न: दूरी के क्रमानुसार सौर मंडल के ग्रह कौन-कौन-से हैं और इनमें पृथ्वी का स्थान क्या है?
हल: दूरी के क्रमानुसार सौर मंडल के आठ ग्रह हैं — बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस एवं नेपच्यून। इनमें से बुध, शुक्र, पृथ्वी एवं मंगल अपेक्षाकृत छोटे एवं चट्टानी ग्रह हैं जबकि बृहस्पति, शनि, यूरेनस एवं नेपच्यून बड़े ग्रह हैं जो मुख्य रूप से गैसों से बने हैं। पृथ्वी सूर्य से तीसरे स्थान पर स्थित है, जो इसे जीवन के लिए उपयुक्त तापमान प्रदान करता है।
13.2 हरितगृह प्रभाव पृथ्वी को गरम रखने में कैसे सहायक है?
प्रश्न: शुक्र ग्रह बुध ग्रह की अपेक्षा सूर्य से दूर होकर भी अधिक गरम क्यों है?
हल: इसे हरितगृह प्रभाव (ग्रीन हाउस प्रभाव) कहते हैं। शुक्र ग्रह के घने वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें सूर्य द्वारा गरम हुई सतह द्वारा उत्सर्जित विकिरण को अवशोषित करके ऊष्मा को रोक लेती हैं। पृथ्वी पर भी वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें सूर्य से गरम हुई पृथ्वी तथा उसके द्वारा उत्सर्जित विकिरण को अवशोषित करके ऊष्मा को रोक लेती हैं। इस प्रकार हरितगृह प्रभाव पृथ्वी का उपयुक्त तापमान बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वायुमंडल के अभाव में पृथ्वी की ऊष्मा अंतरिक्ष में निस्तारित हो जाती और पृथ्वी अत्यधिक ठंडी हो जाती।
13.3 वासयोग्य क्षेत्र (गोल्डीलॉक्स जोन) किसे कहते हैं?
प्रश्न: पृथ्वी पर जल द्रव अवस्था में क्यों पाया जाता है, जबकि यह जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?
हल: जीवन के विकास के लिए जल का द्रव अवस्था में होना आवश्यक है। सूर्य से वह दूरी जहाँ जल द्रव अवस्था में पाया जाता है, उसे वासयोग्य क्षेत्र अथवा कभी-कभी गोल्डीलॉक्स जोन भी कहा जाता है। पृथ्वी इसी वासयोग्य क्षेत्र में स्थित है इसलिए यहाँ जल अधिकतर द्रव अवस्था में बना रहता है, जो जीवन के सभी रूपों के विकास के लिए आवश्यक है। पृथ्वी की सतह का अधिकांश भाग जल से ढका हुआ है, इसी कारण अंतरिक्ष से देखने पर यह नीले रंग की दिखाई देती है और इसे नीला ग्रह भी कहा जाता है। मंगल ग्रह वासयोग्य क्षेत्र के सीमांत भाग पर स्थित है, इसीलिए वहाँ जीवन की संभावना पर वैज्ञानिक शोध जारी है।
13.4 पृथ्वी का उचित आकार वायुमंडल को बनाए रखने में कैसे सहायक है?
प्रश्न: यदि पृथ्वी आकार में बहुत छोटी होती तो क्या होता?
हल: पृथ्वी को रहने योग्य बनाने का एक कारण इसका उचित आकार भी है क्योंकि उचित आकार वायुमंडल को बनाए रखने में सहायक है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण वायुमंडल की गैसों को अपनी ओर खींचकर रखता है। यदि पृथ्वी आकार में बहुत छोटी होती और औसत घनत्व समान रहता तो इसका गुरुत्वाकर्षण इतना दुर्बल होता कि यह वायुमंडल की गैसों को रोक ही नहीं पाती एवं ये गैसें अंतरिक्ष में पलायन कर जातीं। उदाहरण के लिए मंगल ग्रह का वायुमंडल पृथ्वी की तुलना में लगभग 100 गुना कम सघन है एवं बुध ग्रह पर तो वायुमंडल है ही नहीं। यदि पृथ्वी का आकार अत्यंत बड़ा होता और गुरुत्वाकर्षण बल अधिक प्रबल होता तो पृथ्वी हमें इतनी प्रबलता से नीचे की ओर खींच लेती कि हमारी अस्थियाँ तक दबकर टूट सकती थीं। उचित आकार के कारण ही पृथ्वी वायुमंडल को रोककर जीवन को संभव बनाती है।
13.5 पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र किस प्रकार जीवन की रक्षा करता है?
प्रश्न: पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने में उसके चुंबकीय क्षेत्र की क्या भूमिका है?
हल: पृथ्वी स्वयं एक विशाल चुंबक के समान व्यवहार करती है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी के क्रोड में पिघले हुए लोहे की गति ही पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का कारण है। पृथ्वी पर निरंतर अंतरिक्ष से आने वाले सूक्ष्म एवं उच्च ऊर्जा वाले कण टकराते रहते हैं — कुछ कण दूर ब्रह्मांड से आते हैं जिन्हें कॉस्मिक किरणें कहते हैं, और कुछ अन्य कण सूर्य से आते हैं जिन्हें सौर पवन कहते हैं। ये कण हानिकारक हो सकते हैं क्योंकि ये वायुमंडल को क्षति पहुँचा सकते हैं एवं ओजोन परत का क्षय कर सकते हैं, जिसके फलस्वरूप हानिकारक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी तक पहुँचकर जीवन को प्रभावित कर सकती हैं। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है — यह अधिकांश हानिकारक कणों को पृथ्वी से दूर भेजता है जिससे हमारा वायुमंडल एवं जीवन पृथ्वी पर सुरक्षित रहता है।
13.6 जलमंडल, भूविविधता और जैवमंडल किसे कहते हैं?
प्रश्न: पृथ्वी पर जीवन के लिए जल, भू-आकृतियों और सजीवों की विविधता का क्या महत्त्व है?
हल: पृथ्वी की सतह का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से घिरा हुआ है — यह जल तालाबों, झीलों, नदियों, झरनों, समुद्रों, महासागरों एवं भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है। जल के सभी रूप मिलकर जलमंडल बनाते हैं। जल एक अच्छा विलायक है, यह पोषक तत्वों का संचरण मृदा से पौधों की पत्तियों तक करता है तथा जंतुओं में शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। पृथ्वी पर अनेक प्रकार की भू-आकृतियाँ, चट्टानें, मृदा इत्यादि विद्यमान हैं। इस विविधता एवं इन्हें आकार देने वाले प्रक्रम को भूविविधता कहा जाता है, जो अद्वितीय पर्यावासों के सर्जन में सहायता करती है जहाँ विभिन्न प्रकार के जीव पनप सकते हैं। वह स्थान जहाँ जीवित प्राणी रहते हैं, वे सभी मिलकर जैवमंडल बनाते हैं। जैवमंडल में पृथ्वी, जल एवं वायु सभी सम्मिलित होते हैं जहाँ जीवन अपने परिवेश के साथ पारस्परिक क्रिया करता है ताकि वह अपना अस्तित्व बनाकर वृद्धि कर सके।
13.7 आनुवंशिक पदार्थ (जीन) जीवों में विशिष्टता कैसे बनाए रखता है?
प्रश्न: संतान अपने माता-पिता के समान क्यों दिखाई देती है, फिर भी पूर्ण रूप से समान क्यों नहीं होती?
हल: माता-पिता अपने बच्चों को एकल कोशिका से विकसित होने के लिए आवश्यक आनुवंशिकी अनुदेश स्थानांतरित कर देते हैं। ये अनुदेश आनुवंशिक पदार्थ या जीन कहलाते हैं जो प्रत्येक जीवित कोशिका के भीतर संगृहित होते हैं। कुछ अनुदेश कोशिका को बताते हैं कि रक्त कैसे बनता है जबकि अन्य अनुदेश अस्थियों, माँसपेशियों या त्वचा के निर्माण के लिए मार्गदर्शन करते हैं। जनन का कार्य केवल एक-जैसे जीवों को जन्म देना नहीं है बल्कि यह माता-पिता से उनकी संतति में स्थानांतरित होने वाले अनुदेशों में छोटे-छोटे परिवर्तन करने की भी अनुमति देता है। कभी-कभी ये परिवर्तन पौधों या जंतुओं को नए वातावरण में अधिक उन्नत तरीके से जीवनयापन करने में सहायता करते हैं, जैसे— समय के साथ ऊँटों में चर्बी जमा होने से कूबड़ विकसित हो गया जिससे वे मरुस्थल में जीवित रह सकें। यहाँ तक कि अतिसूक्ष्म जीवाणुओं में भी कुछ जीवाणु प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर सकते हैं।
13.8 पौधों में अलैंगिक जनन किस प्रकार होता है?
प्रश्न: बाँस और गन्ने जैसे पौधे बिना बीज के नए पौधे किस प्रकार बनाते हैं?
हल: जब पौधे के किसी भी भाग, जैसे— तना, पत्ती या जड़ को मृदा में रोप दिया जाता है, तब पौधे जनन कर सकते हैं। इस प्रकार के जनन को कायिक प्रवर्धन कहते हैं। उदाहरण के लिए मनी प्लांट के तने की कर्तन, आलू की आँखें या अदरक का एक टुकड़ा मृदा में रोपकर नया पौधा उगाया जा सकता है। बाँस और गन्ना भी इसी विधि से अपने तने के भाग से नए पौधे बनाते हैं, इसीलिए इनके बीज सामान्यतः दिखाई नहीं देते।
13.9 जंतुओं में लैंगिक जनन किस प्रकार होता है?
प्रश्न: युग्मक क्या हैं और निषेचन की प्रक्रिया कैसे होती है?
हल: प्रत्येक जनक विशिष्ट जनन कोशिकाएँ बनाता है जिन्हें युग्मक कहते हैं। इन युग्मकों में जनक के आनुवंशिक पदार्थ का आधा भाग ही होता है। जब नर एवं मादा युग्मक मिलते हैं तो एक नई कोशिका बनाते हैं जिसमें प्रत्येक जनक से प्राप्त आधे-आधे अनुदेशों से एक पूरा सेट बनता है — इस प्रक्रिया को निषेचन कहते हैं। मानव सहित पक्षियों एवं स्तनधारियों में शुक्राणु मादा जननांग के भीतर एकत्रित होते हैं एवं जब ये शुक्राणु मादा के शरीर द्वारा उत्पादित अंडे से मिलते हैं तो निषेचन हो जाता है। पक्षियों में निषेचित अंडा मादा द्वारा दिया जाता है और सेने की प्रक्रिया के पश्चात इसमें भ्रूण का विकास होता है, जबकि अधिकांश स्तनधारियों में युग्मज का भ्रूण में विकास मादा के शरीर के भीतर ही होता है और माँ का शरीर बच्चे के जन्म होने तक पोषण एवं ऑक्सीजन प्रदान करता है। संतान पूर्ण रूप से अपने माता या पिता के समान नहीं दिखाई देती क्योंकि प्रत्येक बार युग्मकों के मिलने से अनुदेशों का संयोजन भिन्न-भिन्न विधियों से होता है, यही कारण है कि एक ही परिवार के भाई-बहन भी एक-दूसरे से भिन्न दिख सकते हैं।
13.10 मानवीय गतिविधियाँ पृथ्वी के संतुलन को कैसे प्रभावित करती हैं?
प्रश्न: प्रदूषण एवं आवास विनाश पृथ्वी पर जीवन को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
हल: जब प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाते हैं तो पौधे और जीव-जंतु लुप्त हो जाते हैं जिससे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है — उदाहरण के लिए यदि घास समाप्त हो जाए तो हिरण व टिड्डे, जिनका भोजन ही घास है, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करेंगे, और शाकाहारी जीवों के बिना शिकारी पशु, जैसे बाघ या लोमड़ी, को भी अपना भोजन प्राप्त नहीं होगा। कारखानों, वाहनों और ईंधन जलने से उत्पन्न होने वाला वायु प्रदूषण मानव और प्रकृति दोनों को क्षति पहुँचाता है, जिससे श्वास संबंधी समस्याएँ, फसलों का ह्रास, धूमकुहरा का बनना और अम्ल-वर्षा जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। जलवायु परिवर्तन फसलों की वृद्धि एवं जल आपूर्ति से लेकर वन्य जीवों के पर्यावास एवं मानव स्वास्थ्य तक को प्रभावित करता है।
13.11 पृथ्वी की रक्षा के लिए हम क्या कर सकते हैं?
प्रश्न: जलवायु एवं जैव विविधता संरक्षण में प्रत्येक व्यक्ति किस प्रकार योगदान दे सकता है?
हल: जलवायु संरक्षण से तात्पर्य है सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग कर हरितगृह गैसों के उत्सर्जन को कम करना, पर्यावरण के अनुकूल यातायात के साधनों का चयन करना और ऊर्जा के उत्कृष्ट उपयोग पर ध्यान देना। साथ ही जैव विविधता को सुरक्षित रखना भी नितांत आवश्यक है क्योंकि विविध पारिस्थितिकी तंत्र सुदृढ़ और संतुलित होते हैं। कपड़ा एवं प्लास्टिक जैसी वस्तुओं का पुनः उपयोग कर, सुधार कर और पुनर्चक्रण कर प्रदूषण एवं अपशिष्ट को कम किया जा सकता है। ऊर्जा और जल की बचत जैसी छोटी-छोटी पहल भी इसमें बड़ा योगदान दे सकती हैं। पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए स्थानीय समुदाय से लेकर वैश्विक नेताओं तक हम सभी को मिलकर उत्तरदायित्वपूर्ण जीवन का निर्वहन करते हुए इस अद्वितीय ग्रह पृथ्वी एवं इसके भविष्य को संरक्षित करना है।
अध्याय का सार और महत्त्व
इस अध्याय में हमने सीखा कि पृथ्वी अपनी सूर्य से उचित दूरी, उचित आकार, हरितगृह प्रभाव, चुंबकीय क्षेत्र, जलमंडल, भूविविधता और जैवमंडल के अद्वितीय संयोजन के कारण ही जीवन के लिए उपयुक्त है। आनुवंशिक पदार्थ जीवों में विशिष्टता बनाए रखते हुए पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन को आगे बढ़ाता है, चाहे वह पौधों में अलैंगिक जनन के माध्यम से हो या जंतुओं में लैंगिक जनन के माध्यम से। परंतु मानवीय गतिविधियाँ — प्रदूषण, आवास विनाश और जलवायु परिवर्तन — इस नाजुक संतुलन को बिगाड़ सकती हैं। इसीलिए स्थानीय समुदाय से लेकर वैश्विक नेताओं तक सभी को मिलकर जिम्मेदारीपूर्वक कार्य करना अत्यंत आवश्यक है ताकि हमारी पृथ्वी — यह अद्वितीय जीवनदायी ग्रह — भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।
अंतिम प्रश्नावली — सभी 12 प्रश्नों के पूर्ण हल (NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक से, बहु-स्रोत सत्यापित)
प्र. 1: मंगल ग्रह वर्तमान में पृथ्वी की तरह जीवन को सहारा क्यों नहीं दे सकता, इसका एक प्रमुख कारण बताइए।
हल: मंगल में सघन वायुमंडल व द्रव जल का अभाव है — इसका वायुमंडल पृथ्वी की तुलना में लगभग 100 गुना पतला है, जिससे यह ऊष्मा को बनाए नहीं रख पाता। साथ ही मंगल की सतह पर स्थिर द्रव जल नहीं है, जो जीवन के लिए आवश्यक है।
प्र. 2: भू-विविधता (geodiversity) का उदाहरण कौन-सा है?
हल: पर्वत, घाटियाँ व मरुस्थल जैसे भिन्न-भिन्न भू-आकृतियाँ (landforms) — भू-विविधता पृथ्वी की भौतिक विशेषताओं (भू-आकृतियों, चट्टानों, मिट्टी) में विविधता को दर्शाती है, जैविक विविधता को नहीं।
प्र. 3: यदि पृथ्वी समान घनत्व के साथ छोटी होती, तो उसके वायुमंडल का क्या होता?
हल: कमज़ोर गुरुत्वाकर्षण के कारण वायुमंडल अंतरिक्ष में विलीन हो जाता — छोटे आकार का अर्थ है कम गुरुत्वीय बल, जिससे ग्रह वायुमंडलीय गैसों को पकड़कर नहीं रख पाता।
प्र. 4: लैंगिक जनन में संतान अपने जनकों (माता-पिता) से भिन्न क्यों होती है?
हल: संतान को दोनों जनकों से मिश्रित अनुवांशिक निर्देश (जीन्स) प्राप्त होते हैं — युग्मकों के माध्यम से दोनों जनकों की आनुवंशिक जानकारी मिलकर संतानों में अद्वितीय संयोजन बनता है।
प्र. 5: वर्षा के बाद विद्यालय की दीवार की दरारों में छोटे हरे पौधे उगते देखे गए — बीज कहाँ से आए होंगे? कौन-सी परिस्थितियों ने इन पौधों को वहाँ उगने में सहायता की?
हल: बीज हवा, वर्षा या पक्षियों के माध्यम से वहाँ पहुँचे होंगे। वृद्धि कारक — मानसून की वर्षा से प्राप्त जल, प्रकाश-संश्लेषण हेतु पर्याप्त सूर्य-प्रकाश, दरारों में मिट्टी/कार्बनिक पदार्थ, तथा अंकुरण हेतु अनुकूल गरम तापमान।
प्र. 6: किसी नगर ने सड़कों व भवनों के निर्माण हेतु वन का एक बड़ा भाग काट डाला। इसके स्थानीय जलवायु व जैव-विविधता पर संभावित प्रभावों पर चर्चा कीजिए। इससे जल की उपलब्धता या गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
हल: वनों की कटाई से स्थानीय तापमान बड़ता है, वाष्पोत्सर्जन घटता है और वर्षा कम होती है। जैव-विविधता को नुकसान पहुँचता है क्योंकि जंतु आवास व खाद्य-श्रृंखला खो देते हैं। जल की उपलब्धता कम होती है (भूमि में जल-रिसाव घटने से) और गुणवत्ता गिरती है (वृक्षों द्वारा वर्षा-जल के प्राकृतिक फ़िल्टरीकरण के अभाव में)।
प्र. 7: एक मित्र कहता है, “पृथ्वी पर पहले भी जलवायु परिवर्तन होते रहे हैं, इसलिए आज का वैश्विक तापवृद्धि (global warming) कुछ नया नहीं है।” इस अध्याय व अन्य अध्यायों से सीखी बातों के आधार पर आप क्या उत्तर देंगे?
हल: ऐतिहासिक जलवायु-परिवर्तन हज़ारों वर्षों में धीरे-धीरे हुए, जबकि आज का तापवृद्धि मुख्यतः मानवीय गतिविधियों (जीवाश्म ईंधन जलाना, वनों की कटाई) के कारण अत्यंत तीव्र गति से हो रहा है। प्राकृतिक चक्रों के विपरीत, आज का परिवर्तन मानव-प्रेरित है और उत्सर्जन घटाकर व वनों की रक्षा कर इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
प्र. 8: यदि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र अचानक लुप्त हो जाए, तो जीवन के लिए किस प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?
हल: चुंबकीय क्षेत्र के बिना हानिकारक सौर विकिरण व कॉस्मिक किरणें सीधे पृथ्वी की सतह तक पहुँच सकती हैं, जिससे वायुमंडल भी धीरे-धीरे मंगल की भाँति क्षीण हो सकता है। बड़ी हुई पराबैंगनी किरणों से DNA को नुकसान व कैंसर का खतरा बड़ेगा; प्रवासी जंतु अपनी दिशा-ज्ञान क्षमता खो देंगे और तकनीकी अवसंरचना (उपग्रह, विद्युत ग्रिड) को नुकसान पहुँच सकता है।
प्र. 9: आपको मंगल पर मानव बस्ती के लिए एक नई योजना बनानी है। पृथ्वी से किन तीन चीज़ों को पुनः निर्मित करना आवश्यक होगा? इनमें से किसे दोहराना सबसे कठिन होगा, और क्यों?
हल: तीन आवश्यक चीज़ें — साँस लेने योग्य दाबयुक्त वायुमंडल; पीने व कृषि हेतु द्रव जल; विकिरण से सुरक्षा (चुंबकीय क्षेत्र या कृत्रिम कवच)। वायुमंडल को दोहराना सबसे कठिन है, क्योंकि स्थिर व टिकाऊ परिस्थितियाँ बनाए रखने हेतु उन्नत तकनीक व दीर्घकालिक संसाधनों की आवश्यकता होती है।
प्र. 10: एक गाँव में पिछले कुछ वर्षों में तापमान बड़ रहा है और वर्षा अनिश्चित हो गई है — इसका कारण क्या हो सकता है? गाँव इन नई परिस्थितियों के अनुकूल ढलने के लिए कौन-से दो उपाय अपना सकता है?
हल: कारण — ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, वनों की कटाई या प्रदूषण से प्रेरित जलवायु परिवर्तन। अनुकूलन उपाय — शुष्क मौसम हेतु वर्षा-जल संचयन (rainwater harvesting) प्रणाली अपनाना, तथा कम पानी की आवश्यकता वाली सूखा-प्रतिरोधी फसलें उगाना।
प्र. 11: यदि पृथ्वी पर वायुमंडल न होता, तो क्या इससे जीवन, तापमान व जल प्रभावित होते? समझाइए।
हल: बिना वायुमंडल के जीवन संभव नहीं हो सकता — साँस लेने हेतु ऑक्सीजन नहीं, विकिरण से कोई सुरक्षा नहीं, कोई मौसम-तंत्र नहीं बनता। दिन व रात के तापमान खतरनाक रूप से अत्यधिक बदलते रहते। वायुमंडलीय दाब के अभाव में जल तेज़ी से वाष्पित होकर अंतरिक्ष में उड़ जाएगा।
प्र. 12: कायिक प्रवर्धन (vegetative propagation) के पाँच उदाहरण बताइए।
हल: आलू (कंद की आँखों/buds से), अदरक (प्रकंद/rhizome से), मनी प्लांट (तने की कलम से), ब्रायोफिलम (पत्ती के किनारों पर बनने वाले नए पौधों से), और प्याज़ (बल्ब के विभाजन से) — ये सभी बिना बीज के, मूल पौधे के हूबहू क्लोन (समरूप संतान) उत्पन्न करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: पृथ्वी को “अद्वितीय जीवनदायी ग्रह” क्यों कहा जाता है?
उत्तर: पृथ्वी सौर मंडल के वासयोग्य क्षेत्र में स्थित है, जहाँ जल द्रव अवस्था में पाया जाता है, इसका आकार उचित वायुमंडल बनाए रखने के लिए पर्याप्त है, हरितगृह प्रभाव इसे उपयुक्त तापमान पर रखता है, और इसका चुंबकीय क्षेत्र हानिकारक विकिरणों से जीवन की रक्षा करता है — इन सभी विशेषताओं के संयोजन से पृथ्वी जीवन के लिए अद्वितीय रूप से अनुकूल बन जाती है।
प्रश्न 2: वासयोग्य क्षेत्र (गोल्डीलॉक्स जोन) किसे कहते हैं?
उत्तर: सूर्य से वह दूरी जहाँ किसी ग्रह पर जल द्रव अवस्था में पाया जा सकता है, उसे वासयोग्य क्षेत्र या गोल्डीलॉक्स जोन कहा जाता है। पृथ्वी इसी क्षेत्र में स्थित है, इसलिए यहाँ जीवन संभव हो सका है।
प्रश्न 3: कायिक प्रवर्धन और लैंगिक जनन में क्या अंतर है?
उत्तर: कायिक प्रवर्धन में पौधे के तने, पत्ती या जड़ जैसे भाग से बिना बीज के नया पौधा उगता है और संतान माता-पिता के समान होती है, जबकि लैंगिक जनन में नर एवं मादा युग्मकों के मिलने से नई कोशिका बनती है जिसमें दोनों जनकों के आनुवंशिक पदार्थ का मिश्रण होता है, इसलिए संतान माता-पिता से भिन्न विशेषताएँ प्रदर्शित करती है।
प्रश्न 4: पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का जीवन की रक्षा में क्या योगदान है?
उत्तर: पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र, जो इसके क्रोड में पिघले लोहे की गति से उत्पन्न होता है, कॉस्मिक किरणों और सौर पवन जैसे हानिकारक कणों को पृथ्वी से दूर मोड़ देता है। इस प्रकार यह एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करते हुए वायुमंडल, ओजोन परत और जीवन को हानिकारक विकिरण से बचाता है।

